मंत्रालयों के आधे से ज़्यादा वादे 'कोरे'

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लोकसभा के आंकड़ों के मुताबिक़ दो तिहाई केंद्रीय मंत्रालयों ने संसद में दिए 50 फ़ीसदी से ज़्यादा आश्वासनों को पूरा नहीं किया है.

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने 26 मई को दो साल पूरे कर लिए हैं.

इससे पहले 'इंडियास्पेंड' ने रिपोर्ट की थी कि 16वीं लोकसभा में दिए गए 80 फ़ीसदी आश्वासन लंबित थे जो अब 2016 में 58 फ़ीसदी हो गया है.

संसद में सरकार के दिए आश्वासन और वादे की समय सीमा की समाप्ति नहीं होती है.

एक संसदीय सत्र के दौरान सरकार प्रतिदिन सांसदों के 250 सवालों का जवाब देती है.

संसद में सवालों का जवाब देते वक़्त या बिल, प्रस्तावों पर चर्चा के दौरान मंत्रालय कुछ आश्वासन देते हैं, किसी मुद्दे पर विचार करने, कार्रवाई करने या बाद में जानकारी प्रदान करने का वादा करते हैं.

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यही आश्वासन संसदीय कार्य मंत्रालय और लोकसभा सचिवालय द्वारा संकलित कर सरकारी आश्वासनों के तौर पर संसदीय समिति के पास भेजा जाता है.

समिति को ये सुनिश्चित करना होता है कि इन आश्वासनों को तीन महीनों के अंदर लागू किया जाए.

मंत्रालयों के सचिवों को संसद में दिए गए आश्वासनों को हर हफ़्ते या 15 दिनों में समीक्षा करनी पड़ती है

जब लोकसभा को भंग किया जाता है, सभी आश्वासन अगली सरकार के ज़िम्मे चला जाता है.

प्रधानमंत्री कार्यालय ने 2014 में एक आश्वासन दिया था जो अब तक पूरा नहीं हुआ है.

आठ मंत्रालयों ने संसद में दिए गए 80 फीसदी आश्वासनों पर अब तक कार्रवाई नहीं की है.

तीन मंत्रालयों ने संसद में दिए गए 75 फीसदी से ज्यादा आश्वासनों को लागू कर दिया है.

प्रधानमंत्री कार्यालय ने आश्वासन दिया था कि वो 16वीं लोकसभा में 2013-14 के मंत्रालयों के प्रदर्शन और मूल्यांकन प्रणाली पर रिपोर्ट साझा करेगी, लेकिन 2014 से लेकर अब तक ऐसा नहीं हुआ है.

सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण, अल्पसंख्यक मामले, सड़क परिवहन और राजमार्ग भी पीछे नहीं हैं. इनके क्रमश: 83%, 82% और 75% आश्वासन लंबित हैं

संसद में गृह मंत्रालय के दिए गए 58 फीसदी आश्वासन लंबित हैं जिनमें से दो आश्वासनों को रद्द करने का अनुरोध भी किया गया है.

रद्द किए गए आश्वासनों में से एक तटीय पुलिस स्टेशनों की स्थापना करना है जिनके 26/11 मुंबई हमलों के बाद स्थापना करने का आश्वासन दिया गया था.

अगस्त 2014 में गृह मंत्रालय ने कहा था कि वो तटीय सुरक्षा योजना के दूसरे चरण को लागू करेगा.

नवंबर 2015 को मंत्रालय ने इस आश्वासन को पूरी तरह से रद्द करना की मांग की.

2014 से गृह मंत्रालय का एक आश्वासन लंबित पड़ा है जिसमें संविधान के आठवें अनुसूचि के लिए "आधिकारिक" भाषा का चयन करने के मापदंड का सवाल है.

इस वक्त 22 आधिकारिक भाषाओं की सूची में शामिल होने के लिए 38 भाषाओं को गृह मंत्रालय की मंज़ूरी का इंतज़ार है.

भारत, कोख किराए पर देने के मामले में एक अनुकूल गंतव्य के रूप में उभरा है. ये इंडस्ट्री सालाना 2500 करोड़ का बिज़नेस कर रही है.

सरकार का भारत में सेरोगेसी को क़ानूनी रूप से वैध करवाने का आश्वासन 2014 से लंबित पड़ा है.

भारत में बिजली परियोजनाओं के सुस्त कार्यान्वयन के कारण लगातार लागत में वृद्धि होती रही है.

एक सांसद ने जब सवाल पूछा कि क्या परमाणु परियोजनाओं को समय पर पूरा करने के लिए पर्याप्त पैसे दिए जा रहे थे, सरकार ने कहा कि परियोजनाओं को समय पर पूरा करने के लिए सभी प्रकार के प्रयास किए जा रहे हैं.

हालांकि लोकसभा वेबसाइट के मुताबिक़ इस आश्वासन को फ़रवरी 2016 में रद्द कर दिया गया है.

कानून मंत्रालय सबसे ज्यादा आश्वासन देती है, केवल 27 फ़ीसदी पूरा करती है.

न्याय और क़ानून मंत्रालय इस सूची में सबसे आगे है. 16वीं लोकसभा में उसने 146 आश्वासन दिए थे जिनमें से मात्र 27 फ़ीसदी ही मई 12, 2016 तक पूरे किए गए हैं

संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 129 आश्वासन किए जिनमें से 40 फ़ीसदी ही लागू हुआ.

वहीं वित्त मंत्रालय ने 121 आश्वासन दिए और 57.9 फ़ीसदी क्रियान्वयन किया.

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने 113 आश्वासन दिए जिनमें 35 फ़ीसदी का क्रियान्वयन हुआ.

रेल मंत्रालय ने 107 आश्वासन दिए जिनमें 44 फ़ीसदी को क्रियान्वित किया.

सरकारी आश्वासन पर समिति ने अपने रिपोर्ट में सरकार को कई आश्वासनों के सालों से लंबित पड़े रहने के लिए आड़े हाथों लिया है. इनमें से कुछ तो क़रीब एक दशक से लंबित है.

रिपोर्ट के मुताबिक़ मानव संसाधन विकास मंत्रालय के 17 आश्वासन कार्यान्वयन के लिए लंबित हैं.

ख़ास बात है कि इनमें से पहले दो आश्वासन करीब़ एक दशक से लंबित पड़ा है.

(अग्रवाल और सिब्बल, पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च के सदस्य हैं.)

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