'वे सोनोवाल को चैन से रहने नहीं देंगे'

  • 28 मई 2016
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मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने असम की सत्ता तो संभाल ली है लेकिन उनके सामने लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने की बड़ी चुनौती है.

लेकिन इससे भी ज़्यादा मेहनत उन्हें पार्टी और गठबंधन को एकजुट रखने के लिए करनी पड़ेगी. बहुमत के बावजूद सरकार की स्थिरता को लेकर खुसफुसाहटें थम नहीं रही हैं.

सरकार के गठन में हुई खींचतान से अंतर्कलह की अटकलों को नया आधार भी मिल गया है.

फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा मुख्यमंत्री सोनोवाल का चुनाव में सफलता के लिए हेमंत बिस्व सर्मा का शुक्रिया अदा न करना भी लोगों को इसीलिए खटक रहा है.

शीर्ष नेतृत्व की ओर से हेमंत अपनी इस उपेक्षा को चुपचाप पचा जाएंगे ऐसा कोई नहीं मानता. वे अति महत्वाकांक्षी व्यक्ति हैं. इस तरह की चीज़ों को दिल पर ले लेते हैं और मौक़े पर जवाब भी देते हैं.

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हालांकि विभागों के बंटवारे में उनके हिस्से कई बड़े मंत्रालय आए हैं. वित्त मंत्रालय उन्हें ही सौंपा गया है. मगर उन्हें उनकी पसंद का गृह एवं राजनीतिक मामलों का मंत्रालय नहीं दिया गया, जिसका रंज उन्हें ज़रूर होगा.

ये मंत्रालय सोनोवाल ने ख़ुद रख लिया है. उन्हें पता है कि हेमंत को अगर अभी से रोककर नहीं रखा गया तो वे उनके लिए कभी भी ख़तरा बन जाएंगे.

कई तरह के टकराव वाले इस प्रदेश में गृहमंत्री की अपनी अहमियत है. वह सत्ता समीकरणों को बदलने की हैसियत रखता है.

वैसे हेमंत तरुण गोगोई की सरकार में नंबर दो थे इसलिए उनके समर्थकों को उम्मीद थी कि उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया जाएगा. इसके लिए उन्होंने ज़ोर भी लगाया, मगर ऐसा नहीं हुआ. ज़ाहिर है वे इससे ख़ुश नहीं हैं.

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ख़ुद हेमंत इस बात से नाराज़ बताए जाते हैं कि उन्होंने तीन लोगों (प्रदान बरूआ, पल्लब लूचन दास और पीयूष हज़ारिका) को मंत्रिमंडल में शामिल करने की बात कही थी, मगर मंत्री बनाया गया केवल पल्लब को.

बीजेपी हाइकमान ने उन्हें नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस का संयोजक बनाकर ख़ुश करने की कोशिश की है. मगर हेमंत जानते हैं कि उन्हें झुनझुना थमा दिया गया है. उनका इतिहास बताता है कि वे इस सबसे संतुष्ट होने वाले नहीं हैं. हां, इसका इस्तेमाल वे अपने हक़ में ज़रूर कर सकते हैं.

हेमंत की महत्वाकांक्षा हमेशा से नंबर वन बनने की थी और इसीलिए उनकी पूर्व मुख्यमंत्री तरूण गोगोई से नहीं पटी थी. उस अधूरी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए ही वे बीजेपी में गए. ऐसे में माना जाता है कि वे चुप नहीं बैठेंगे और मौक़ा मिलते ही अपना दांव चलेंगे.

वैसे भी हेमंत के बारे में कहा जाता है कि वे हर उस शख़्स को धोखा देते हैं जो उन्हें आगे बढ़ाता है. पहले हितेश्वर सैकिया का दामन छोड़कर उन्होंने गोगोई का हाथ थामा और फिर वे बीजेपी में चले गए.

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हालांकि अभी कोई नहीं मानता कि निकट भविष्य में वे बग़ावत करेंगे या बीजेपी छोड़ेंगे, बल्कि शायद वे 2019 के लोकसभा चुनाव तक धैर्यपूर्वक इंतज़ार करेंगे. उस समय उन्हें अपनी ताकत़ दिखाने और अपनी बात मनवाने का एक मौक़ा मिल सकता है.

सोनोवाल और हेमंत के बीच पटरी बैठेगी ऐसा मानने वालों की तादाद कम ही है. ये तो सब जानते हैं कि अखिल असम छात्र संगठन यानी 'आसू' में हेमंत उनके बॉस हुआ करते थे. अपने जूनियर को बॉस के रूप में स्वीकार करना उनके लिए आसान नहीं होगा.

इसके अलावा हेमंत का राजनीतिक एवं प्रशासनिक अनुभव भी कहीं ज़्यादा है. वे गोगोई सरकार के सबसे क़ाबिल मंत्री थे और सोनोवाल से कहीं ज़्यादा मंझे हुए सत्ता के खिलाड़ी हैं, इसलिए उन्हें छकाने में कोई मुश्किल नहीं होगी.

बीजेपी के स्थानीय नेता भी ये बात भली-भांति जानते हैं. इसी वजह से वे हेमंत से घबराते भी हैं और उनके पर कतरने में भी लगे रहते हैं. उन्होंने हेमंत को पार्टी एवं सरकार में महत्व दिए जाने का लगातार विरोध किया है.

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बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सिद्धार्थ भट्टाचार्य ने तो उन्हें पार्टी में शामिल करने का भी विरोध किया था.

पार्टी के अंदर हेमंत के विरोध की एक बड़ी वजह उन पर लगा भ्रष्टाचार का आरोप है. शारदा चिट फंड घोटाले में उनके कथित तौर पर शामिल होने को लेकर बीजेपी ने बाक़ायदा एक बुकलेट जारी की थी और सड़कों पर विरोध भी किया था. लुईस बर्जर रिश्वत कांड और नॉर्थ कछार हिल्स घोटाले में भी उनका नाम आ चुका है.

शारदा घोटाले में तो सीबीआई ने उनके ठिकानों पर छापे भी मारे थे और उनसे पूछताछ भी की थी. हालांकि बीजेपी में आने के बाद सीबीआई शांत पड़ गई.

कहा जाता है कि हेमंत ने गोगोई से नाराज़ होकर नहीं बल्कि इन घोटालों में गिरफ़्तारी से बचने के लिए बीजेपी का दामन थामा था. अगर ऐसा है तो उनकी लगाम मोदी सरकार के हाथों में है और हेमंत कभी बग़ावत करने का दुस्साहस नहीं करेंगे.

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ज़ाहिर है हेमंत के पास फ़िलहाल सिवाय इसके कोई रास्ता नहीं है कि वे बीजेपी हाइकमान को ख़ुश रखें और बहुत सावधानी से अपने लिए मैदान तैयार करें. वैसे पार्टी ने उन्हें केंद्र में भेजकर टकराव की स्थिति को टालने की कोशिश भी की थी.

लेकिन कहा जाता है कि उन्होंने इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया. स्पष्ट है कि वे असम की राजनीति में ही रमे रहेंगे और सोनोवाल को चैन से नहीं रहने देंगे.

सोनोवाल मंत्री पद और कुछ और ओहदे बांटकर अपनी स्थित मज़बूत कर सकते हैं. उनके सिर पर दिल्ली का हाथ तो है ही और राष्ट्रीय स्वयंसेवक भी उनकी सुरक्षा में तैनात रहेगा. लेकिन इस सबके बावजूद हेमंत का राजनीतिक कौशल ऐसा है कि न वे आश्वस्त हो सकते हैं और न ही उनका हाइकमान.

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