ख़तरे में 'जात्रा' नाट्य शैली

  • 31 मई 2016
जात्रा कलाकार इमेज कॉपीरइट Soumya Sankar Bose

पश्चिम बंगाल का पारंपरिक थिएटर, जात्रा, सदियों से घूम-घूमकर लोगों को नाटक दिखाने की एक शैली है. लेकिन ये कला अब ख़त्म होने के कगार पर है. सौम्या शंकर बोस ने कुछ पूर्व प्रतिभावान जात्रा कलाकारों की तस्वीरें खींची हैं जो अब तंगहाली में जीने को मजबूर हैं.

इस थिएटर शैली में एक नाटक चार घंटों तक चलती था. बेहद ऊर्जावान, तेज़ म्यूज़िक, आंखों को चौंधियाने वाली लाइट, अत्यधिक प्रॉप्स के साथ खुले आसमान के नीचे बड़े स्टेज पर नाटक दिखाया जाता था.

लेकिन जात्रा के प्रति लोगों का रुझान कम होने से कई कलाकारों की रोज़ी-रोटी छिन गई है.

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जात्रा कलाकारों के विस्तारित परिवार में जन्मे बोस ने इन कलाकारों की निजी ज़िन्दगी को बेहद करीब से देखा है. पिछले 18 महीनों में उन्होंने जात्रा कलाकारों की कई तस्वीरों को अपने कैमरे में कैद किया है जो अब भी रंगमंच के कपड़ों को पहनकर अपनी कला दिखाने में नहीं झिझकते हैं.

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बोस बताते हैं कि उनकी तस्वीरें जात्रा की घटती लोकप्रियता और पूर्व कलाकारों के बदहाल हालात का मार्मिक चित्रण करते हैं.

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जात्रा की कहानियां ज्यादातर भारतीय पौराणिक कथाओं पर आधारित होती थीं.

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बोस के मुताबिक उनके प्रोजेक्ट का मकसद असल और रंगमंच के बीच के अंतर को धुंधला करना है. बोस ने कहा, "हमें रचनात्मक तरीके से इन कलाकारों की तस्वीरें खींचने का मौका मिला और साथ ही उनके अतीत को डॉक्यूमेंट करने का भी."

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टेलीविजन और मोबाइल फोन पर आसानी से मिलते मनोरंजन के कारण हाल के सालों में जात्रा कलाकारों को अपनी कला को जीवित रखने के लिए मशक्कत करनी पड़ रही है.

(सौम्य शंकर बोस की पूर्व जात्रा कलाकारों पर खींची तस्वीरों को कोलकता में इंडिया फाउंडेशन फॉर द आर्ट्स की हाल ही में आयोजित प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया गया था)

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