बेटी ने ख़ुदकुशी कर बाप का 'पैसा बचाया'

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Image caption फांसी लगाकर मोहिनी ने की खुदक़ुशी

लातूर के भिसे वाघोली गांव की कांता भिसे के पास एक ही काम है, काम ढूंढना. मगर सूखा है तो काम कहां से मिलेगा. वे रोज़ घर से निकलती हैं और दोपहर बाद लौट आती हैं, ख़ाली हाथ.

पति कलेक्शन एजेंट हैं और हाड़तोड़ मेहनत के बावजूद उनके हाथ महीने में सिर्फ़ एक हज़ार रुपए आते हैं. मगर इससे घर नहीं चलता.

कांता के दो बच्चे हैं, हाईस्कूल में पढ़ रहा बेटा और बेटी. बड़ी बेटी की शादी हो चुकी है.

दूसरी बेटी मोहिनी ने 70 फ़ीसदी अंक लेकर पिछले साल 12वीं पास की थी, पर उसे आगे पढ़ाने के लिए दूसरे गांव भेजने की हिम्मत और आर्थिक शक्ति कांता में नहीं थी.

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लिहाज़ा उसकी शादी की कोशिश शुरू हुईं, मगर पढ़ाई में दिलचस्पी रखने वाली मोहिनी ने अचानक इस साल 16 जनवरी को दुपट्टे से फांसी लगाई और मर गईं.

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Image caption मोहिनी का सुसाइड नोट

कांता जब भी बेटी के आख़िरी खत को देखती हैं तो उनके आंसू निकल आते हैं.

मोहिनी ने मराठी में अपना सुसाइड नोट लिखा था. इसे पढ़ने से पता चलता है कि सूखा झेल रहे इलाक़ों में लड़कियां क्या सोचती हैं.

सुसाइड नोट में मोहिनी ने अपने पिता से गुहार लगाई है कि वो शराब न पिएं और उसकी मौत के बाद 13वीं या श्राद्ध जैसे कर्मकांडों पर रुपए ज़ाया न करें.

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Image caption मोहिनी का सुसाइड नोट

वो लिखती है कि, "यह सब आत्मा की शांति के लिए करते हैं लेकिन मैं अपनी ख़ुशी से यह क़दम उठा रही हूँ. ख़ुशी होगी कि मैंने दहेज़ और शादी पर आपके जो रुपए ख़र्च हो जाते, उन्हें बचाया है. आख़िर कब तक लड़की वाले लड़के वालों के आगे झुकते रहेंगे?"

कांता बताती हैं, "जो रिश्ते आए थे सब दो से चार लाख रुपए के बीच दहेज मांग रहे थे. हम दोनों पति-पत्नी तनाव में थे. मैंने पति से कहा भी कि हमारे पास जो एक एकड़ खेत है, उसे बेच डालेंगे. जब मैं यह कह रही थी, तब मोहिनी सामने के कमरे में टीवी देख रही थी. उसने मेरी बात शायद सुनी होगी. इसलिए उसने ऐसा किया. उसने लिखा था कि मेरे भाई की ज़मीन छिन जाएगी. उसके पास कोई प्रॉपर्टी नहीं बचेगी. इसलिए उसने ऐसा कर डाला."

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कांता कहती हैं, "कुछ नहीं. अब तो बारिश भी नहीं है और काम का भी सवाल है. किसी ने कोई काम दिया, तो हम दोनों कर सकते हैं, लेकिन काम नहीं है. इसलिए हम लोगों से उधार लेकर काम चला रहे हैं. जिसने उधार वापस मांगा, तो दूसरे से लेकर पहला चुकाते हैं. बैंक अगर हमें बेटी की शादी के लिए एक लाख भी क़र्ज़ दे देता, तो हम जैसे-तैसे शादी निपटा सकते थे, लेकिन एक एकड़ ज़मीन होने के बावजूद बैंक ने हमें सिर्फ़ 20 हज़ार क़र्ज़ देने की पेशकश की थी."

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Image caption मोहिनी की मां कांता भिसे

मोहिनी के गाँव भिसे वाघोली में एक साल में तीन ख़ुदकुशी हो चुकी हैं. गातेगाँव में भी हाल ही में ऐसी घटना हो चुकी हैं.

28 अप्रैल को 65 साल के महाकांत माली ने आम के पेड़ पर लटककर ख़ुद को फांसी लगा ली. वजह थी घर बनाने के लिए लिया दो लाख़ का क़र्ज़.

60 साल की विधवा कमल पर यह रक़म लौटाने की ज़िम्मेदारी है. सोसायटी का 23 हज़ार का क़र्ज़ा भी है. चार एकड़ की खेती को संभालना और तीन बेटों की ज़िम्मेदारी. बड़ा बेटा सेकेंड ईयर से पढ़ाई छोड़कर रोज़गार ढूंढ रहा है. दो छोटे भाई पढ़ाई के साथ पड़ोस के खेत में काम करते हैं, जहां दोनों को 300-300 रुपए मिल जाते हैं.

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लातूर से लगे बीड़ ज़िले के वारवा गांव में इस साल फ़रवरी में 25 लड़कियों ने ग्रुप बनाया और फ़ैसला लिया कि वो सूखा होने की वजह से इस साल शादी नहीं करेंगी.

लगातार सूखे की वजह से किसानों का घरेलू बजट तबाह हो चुका है. ऐसे में शादी का मतलब है दहेज. जिसे जुटाने का मतलब है नया क़र्ज़ या ज़मीन का टुकड़ा या गहने को बेचना.

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Image caption मोहिनी के पिता पांडुरंग भिसे और मां कांता

मोहिनी के पिता पांडुरंग भिसे कहते हैं कि यहां कोई काम नहीं है. रोज़गार गारंटी योजना का भी काम नहीं. जो मिलते हैं, वो इतने मुश्किल हैं कि आम किसान कर नहीं पाते, मसलन पत्थर तोड़कर 40 फ़ीट या सौ फ़ीट कुआं खोदना या सड़क के बड़े काम. ठेकेदार बड़ी मशीनों से ये पूरे कर लेते हैं और बाद में लोगों से जॉब बुक ले जाकर एंट्री कर दी जाती है.

महाराष्ट्र के शेतकरी संगठन के मुखिया सत्तार पटेल इससे सहमत हैं. उनका कहना था कि जो काम मज़दूर नहीं कर सकते, वो काम इस योजना में नहीं डाले जाने चाहिए पर यही हो रहा है.

लिहाज़ा विदर्भ के बाद अब मराठवाड़ा भी किसान खुदकुशियों के लिए जाना जा रहा है. हर ज़िले से ऐसी ख़बरें आ रही हैं. पति के जाने के बाद विधवा को घर, खेत और क़र्ज़ का बोझ तीनों की ज़िम्मेदारी लेनी पड़ती है.

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