इनके ऑटो में सवारियों का बैठने से इंकार

  • 1 जून 2016
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35 साल के रानी ट्रांसजेंडर हैं. बीते एक महीने से वो भुवनेश्वर में ऑटो रिक्शा चला रहे हैं या कहें चलाने की कोशिश कर रहे हैं.

वे हर दिन अपना ऑटो रिक्शा लेकर भुवनेश्वर स्थित ऑटो स्टैंड जाते हैं, लेकिन दुखद ये है कि बीते एक महीने में कोई यात्री उनके ऑटो में नहीं बैठा है.

लोग उनके ऑटो तक आते हैं. रानी को देखकर वो हंसते हैं और दूसरे ऑटो को तलाश में निकल जाते हैं. देश के दूसरे हिस्सों की तरह ही ओडिशा में अक्सर किन्नर ट्रेन में, बाज़ार में, गाने बजा कर भीख मांगते नज़र आते हैं. रानी भी कभी वैसा ही करते थे.

कुछ ही दिन पहले रानी को पता चला कि भुवनेश्वर में रह रहे कुछ किन्नर ऐसे हैं जो ख़ुद के पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रहे हैं. वो भी सम्मान के साथ जीना चाहते थे, लिहाज़ा उन्होंने ड्राइविंग की ट्रेनिंग ली और ऑटो रिक्शा चलाने लगे.

लेकिन ऐसा लग रहा है कि रानी की राह आसान नहीं है. उन्हें आम लोगों का साथ नहीं मिल रहा है. रानी इससे निराश नहीं हैं, उन्हें अभी भी उम्मीद है कि एक दिन बदलाव आएगा और लोग उनके ऑटो रिक्शा में बैठना शुरू कर देंगे.

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रानी को बचपन से ही भेदभाव और उपेक्षा झेलनी पड़ी. उनका जन्म ओडिशा के अनुगुल ज़िले के छेंदिपदा में हुआ था. उनके पिता बैंक मैनेजर थे और भाई स्कूल टीचर.

ऐसे में रानी का बचपन सुविधाओं के बीच बीता. उन्होंने 12वीं तक पढ़ाई भी की, लेकिन जैसे-जैसे उनके हावभाव और स्वभाव में परिवर्तन आने लगा, उनके साथ भेदभाव होने लगा.

रानी ने बताया, ''घर के अंदर और बाहर बुरा बर्ताव झेलना पड़ा. लोग देखकर हंसते थे. हालात ऐसे हुए अपना घर छोड़ना पड़ा. 2011 से मैं भुवनेश्वर में ही हूं.''

ऑटो में कोई सवारी नहीं मिलती है. लेकिन रानी ज़रूरतमंदों की मदद के लिए हमेशा तैयार होते हैं. रानी अकेले नहीं हैं, उनकी तरह ही सारिका, सुष्मिता, मेनका जैसे किन्नर भी ऑटो रिक्शा चलाकर अपनी रोज़ी-रोटी कमाना चाहते हैं.

कई बार इन्हें दिन में इक्का-दुक्का सवारियां मिल भी जाती हैं, तो इनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता.

मेनका के ऑटो रिक्शा से उतरने वाली एक लड़की ने कहा, ''इस ऑटो वाले ने हमारे साथ कोई भी दुर्व्यवहार नहीं किया, हमें तो इसमें आना अच्छा ही लगा.''

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हालांकि समाज में अभी लोग ये मानते हैं कि किन्नरों का बर्ताव सही नहीं होता. इनके ऑटो में बैठने से इनकार करने वाले दीपक का कहना था, ''अक्सर किन्नर दुर्व्यवहार करते हैं, ज़बर्दस्ती भी करते हैं. ऐसे में ढेरों ऑटो रिक्शा मौजूद हैं, कोई किन्नरों के रिक्शे में क्यों बैठे?''

सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में किन्नरों को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी. लेकिन रानी जैसे किन्नरों को देखने से साफ है कि समाज में उनकी भागीदारी को लेकर संकट बना हुआ है.

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