कश्मीर के 'बांड पाथर' के रंग

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भारत प्रशासित कश्मीर का लोक थिएटर या 'बांड पाथर' एक ज़माने में कश्मीरियों के लिए मनोरंजन का बड़ ज़रिया हुआ करता था.

कश्मीर में हथियार बंद आंदोलन शुरू होने से पहले 'बांड पाथर' से जुड़े कलाकार गावों और शहर में अपनी इस ख़ास कला से हर आम और ख़ास का दिल मोह लेते थे.

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कश्मीर में 'बांड पाथर' कला से जुड़े लोगों को "बांड" कहते हैं और लोक थिएटर को "बांड पाथर" कहते हैं.

बांड के माने लोग और पथेर माने ड्रामाई खेल. कश्मीर के इन "बांडों" का एक ख़ास लिबास होता है.

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'बांड पाथर' का इतिहास बहुत पुराना है लेकिन 1800 शताब्दी से कश्मीर में ये कला फलने फूलने लगी.

'बांड पाथर' की कला कश्मीर में मर रही है जिसे दोबारा ज़िंदा करने की सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर कोशिशें हो रही हैं.

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पिछले 27 वर्षों में इतने बड़े पैमाने पर 'बांड पाथर' के मेले का पहली बार श्रीनगर के टैगोर हॉल में आयोजन किया गया जहां कश्मीर के 35 बांड थिएटरों को अपनी कला दिखाने का मौक़ा दिया गया.

अभिनय, संगीत और नाच 'बांड पाथर' का बुनयादी हिस्सा हैं. बांड अपनी कला को उपहासात्मक अंदाज़ में पेश करते हैं.

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कश्मीर में पिछले 27 वर्षों के ख़राब हालत ने 'बांड पाथर' की कला को उभरने नहीं दिया.

कलाकार गुलाम मोहिदीन आजिज़ कहते हैं, "कश्मीर में 25 वर्षों के ख़राब हालात की वजह से वह अपनी कला को गावों-गावों और शहर-शहर में पारम्परिक तौर से लोगों तक पहुंचा नहीं सके, क्योंकि कश्मीर के हर घर में मातम रहता था."

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'बांड पाथर' में अच्छी कमाई न होने के कारण नई पीढ़ी इस कला को अपनाने के लिये तयार नहीं है.

इन बांडों का कहना है कि लोग इन्हें नीची नज़र से देखते हैं जिस कारण भी अब नयी पीड़ी इस कला को गले लगाने पर राज़ी नहीं है.

कश्मीर के ये बांड शादियों में मनोरंजन के लिये बुलाये जाते थे. शादियों के अलावा सूफियों की दरगाहों पर भी ये बांड अपनी कला का जादू बिखेरते रहे हैं.

'बांड पाथर' में पुरुष ही महिलाओं का किरदार अदा करते हैं.

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