'तलाक़ पर उलेमा से क्यों बात करें?'

  • 1 जून 2016
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'तीन तलाक़' के ख़िलाफ़ मुहिम चला रही महिलाओं का कहना है उन्हें अब तक 50 हजार मुसलमान औरतों का समर्थन मिला चुका है.

‘भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन’ (बीएमएमए) की सह-संस्थापक नूरजहां सफ़िया नियाज़ ने बीबीसी को बताया, "तीन बार तलाक कहने से तलाक़ होने से बहुत सारी महिलाएं परेशान हैं. फोन पर तलाक हो रहे हैं, व्हाट्सएप पर हो रहे हैं और जुबानी तो हो ही रहे हैं. एक पल में महिला की जिंदगी पूरी बदल जाती है."

उन्होंने कहा, "कोई पूछने वाला नहीं है कि आख़िर क्यों तलाक़ दे रहो हो. हमारे जो काज़ी मौलाना है वो भी इस तरह के तलाक का समर्थन कर रहे हैं."

बीएमएमए का कहना है कि उसने इस बारे में प्रधानंत्री कार्यालय, राष्ट्रीय महिला आयोग, क़ानूनी आयोग और अल्पसंख्यक आयोग को भी पत्र लिखा है.

इस्लाम जुड़े विद्वानों की राय इस मामले पर बँटी हुई है, और अभी तक इस चलन के ख़िलाफ़ कोई निर्णायक क़दम नहीं उठाया गया है, जबकि बड़ी संख्या में ज़बानी तौर पर तलाक़ दिए जाने का सिलसिला जारी है.

नूरजहां का कहना है कि वो इस मुद्दे को सांसदों तक भी ले जाना चाहती हैं क्योंकि क़ानून तो संसद में ही बनेगा.

जब नूरजहां से पूछा गया कि क्या उन्होंने इस बारे में उलेमा से बात की है, तो उन्होंने कहा, "उनसे क्या बात करें और क्यों बात करें. क्या उन्हें पता नहीं है कि मुस्लिम औरतों को इस तरह तलाक दिया जा रहा है. जब उन्होंने पूरी हकीकत पता है और फिर भी वो हकीकत से मुंह फेर रहे हैं और इस मुद्दे पर अपनी राय बदलना नहीं चाहते हैं तो फिर उनसे बात क्यों करें."

नूरजहां का कहना है कि तीन तलाक की अवधारणा किसी भी धार्मिक किताब में नहीं है.

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय महिला आयोग को इस चलन पर पूरी तरह से रोक लगानी चाहिए.

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