'सुंदरबन की मछलियां हरिद्वार चलीं'

  • 2 जून 2016

रुआनू तूफ़ान बंगाल की खाड़ी में तेज़ी से बांग्लादेश की तरफ बढ़ रहा है. समुद्र में ऊंची लहरें और तेज़ हवाओं ने पश्चिम बंगाल के सुंदरबन के इलाक़े में लोगों को अपने घरों के अंदर ही सीमित कर रखा है.

यहाँ इस तूफ़ान का उतना असर नहीं है जितना कि बांग्लादेश में हुआ है. मगर, यहाँ लोग डरे हुए हैं. वो डरे हुए हैं एक ऐसी अनहोनी की आशंका में जिसके साथ वो हर रोज़ जीने की आदत डाल रहे हैं. समुद्र उनकी ज़मीनें निगल रहा है.

यहां कई टापू ऐसे हैं जो जलवायु परिवर्तन की वजह से बंगाल की खाड़ी में समाते जा रहे हैं. दिनोंदिन स्थिति बद से बदतर होती चली जा रही है क्योंकि समुद्र का जल स्तर चिंताजनक रूप से बढ़ता जा रहा है.

'सुंदरबन सोशल डेवलपमेंट सेंटर' के गोपाल प्रमाणिक कहते हैं कि पिछले दस सालों में जलवायु परिवर्तन की वजह से स्थिति और भी ज़्यादा खराब हो गयी है.

वो कहते हैं, "सुंदरबन में कई टापू हैं जिन्हें समुद्र निगलता चला जा रहा है. पिछले दस सालों से यह कुछ ज़्यादा ही हो रहा है. बढ़ते जलस्तर की वजह से यहां की नदियों में खारापन बढ़ रहा है जिसका असर यहाँ के इसानों और जानवरों पर पड़ रहा है. अब मिसाल के तौर पर जो नदियां बंगाल की खाड़ी में जाकर मिल रही है उनमें खारापन इस क़द्र बढ़ गया है कि इनमें पाई जाने वाली मछलियां तैरकर हरिद्वार चली जा रही हैं. हालांकि बांध बनाकर ज़मीन को बहने से रोकने के प्रयास हो तो रहे हैं मगर, समुद्र की तेज़ धार ज़मीन को नीचे नीचे खोखला करती चली जा रही है."

तूफ़ान की वजह से मुझे बंगाल की खाड़ी के उन टापुओं पर जाने की इजाज़त नहीं थी जहां ज़मीन का कटाव बहुत तेज़ी से हो रहा है.

मगर पाथर प्रतिमा प्रखंड के पास स्थित कुछ टापुओं का जायज़ा लेने जब मैं एक लांच पर सवार हुआ तो समझ में आया कि यहाँ के मछुआरों के गीतों में इतना दर्द क्यों है. लांच पर मौजूद सुंदरबन के टापुओं पर रहने वाले कुछ ग्रामीणों ने बताया कि भारी कटाव की वजह उनकी कई एकड़ ज़मीन जलमग्न हो चुकी है और पिछले एक दशक से यह सिलसिला बदस्तूर जारी है.

ग्रामीण कहते हैं कि सरकारी अनदेखी की वजह से उन्हें समुद्र में समाई अपनी ज़मीन का मुआवज़ा भी नहीं मिला और इसी वजह से पूरे इलाक़े से बड़े पैमाने पर विस्थापन शुरू हो गया है.

हालांकि सुंदरबन के टापुओं के रहने वालों ने अब इस प्राकृतिक चुनौती से निपटने के लिए अपने स्तर पर प्रयास शुरू किए हैं. उन्होंने अपने अपने टापुओं के चारों तरफ बड़े पैमाने पर 'मैन्ग्रोव' लगाने का काम शुरू कर दिया है जिससे ज़मीन के कटाव को रोका जा सके.

पश्चिम सुरेंद्रनगर के एक टापू की रहने वाली कुछ महिलाओं के एक समूह से मेरी मुलाक़ात हुई जो खुद से 'मैंग्रोव' की कई प्रजातियां लगा रही हैं. इनमे कई महिलाएं ऐसी हैं जिनकी एक-दो एकड़ ज़मीन पानी के कटाव से ख़त्म हो चुकी है.

बीबीसी से बात करते हुए वो कहती हैं कि उन्हें अब सरकारी तंत्र से कोई उम्मीद भी नहीं हैं.

वायु परिवर्तन की मार झेल रहे सुंदरबन के लोगों के बीच काम कर रहे सोमेन बिस्वास स्थिति को बयान करते हुए कहते हैं : "सिर्फ पाथर प्रतिमा प्रखंड की अगर बात की जाए तो यहां के 15 टापुओं की 500 बीघा ज़मीन अभीतक पानी में जा चुकी है."

पश्चिम बंगाल के सुंदरबन के बारे में शोधकर्ता और मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ज़मीन को बचाने का काम युद्ध स्तर पर नहीं शुरू किया गया तो वो समय दूर नहीं जब इस इलाक़े में एक भी टापू बाक़ी ना बचे.

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