गुलबर्ग: पुलिस अधिकारी से अभियुक्त, फिर बरी

गुलबर्ग सोसाइटी. इमेज कॉपीरइट ANKUR JAIN

गुजरात की बागडोर नरेंद्र मोदी के हाथों रहते हुए कई पुलिस अधिकारियों की आपराधिक मामलों में गिरफ़्तारी हुई थी.

तीन दर्जन से अधिक पर तो फ़र्ज़ी इनकाउंटरों में शामिल होने का आरोप था. लेकिन गुलबर्ग सोसाइटी हत्याकांड केस में गिरफ़्तार पुलिस इंस्पेक्टर केजी इरडा का मामला सबसे विवादास्पद था.

पूर्वी अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसाइटी में जब 2002 में एक उग्र भीड़ ने हमला किया था उस समय इरडा इलाक़े में पुलिस इंस्पेक्टर के तौर पर तैनात थे.

सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त विशेष जांच दल (एसआईटी) ने इरडा पर अपनी ड्यूटी न निभाने और सबूतों से छेड़छाड़ का आरोप लगाया था.

इमेज कॉपीरइट ANKUR JAIN

एसआईटी ने इरडा को 2009 में गिरफ़्तार किया लेकिन गुरुवार को अहमदाबाद की विशेष अदालत ने उन्हें गुलबर्ग सोसायटी मामले में बरी कर दिया.

तड़क भड़क से दूर रहनेवाले किरितसिंह इरडा को दंगों के बाद पुलिस इंस्पेक्टर से प्रमोशन मिलाऔर वो डीएसपी बना दिए गए.

गुलबर्ग सोसाइटी हत्याकांड मामले में पहली एफआईआर उन्होंने ही दर्ज की थी. हत्याकांड में 69 लोग मारे गए थे जिसमें कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफ़री भी शामिल थे.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption एहसान जाफरी की बीवी ज़किया जाफ़री ने नरेंद्र मोदी पर इस घटना को जानबूझकर न रोकने का आरोप लगाया था

एसआईटी ने यह नोट किया था कि अगर मारे गए पूर्व सांसद एहसान जाफ़री अपनी आत्मरक्षा में निजी हथियार से एक व्यक्ति को मार सकते थे और 15 को घायल कर सकते थे तो फिर पुलिस इंस्पेक्टर के नेतृत्व मौजूद टीम दंगाईयों पर कैसे क़ाबू नहीं कर सकी.

पुलिस ने 28 फरवरी 2002 को 61 राउंड गोली चलाईं लेकिन उससे एक आदमी घायल तक नहीं हुआ.

हत्याकांड में बच गए लोगों ने इरडा पर ना सिर्फ दंगाइयों को उनके घरों पर हमला करने की खूली छूट देने का आरोप लगाया था बल्कि उनका यह भी कहना था कि इरडा ने मुसलमानों के घर फ़ूंकने में भी दंगाइयों की मदद की.

एसआईटी ने इरडा और उनकी सात सदस्यीय टीम पर इस तरह से गोली चलाने का आरोप लगाया था, जिससे 61 राउंड गोली चलने के बाद भी किसी को गोली नहीं लगी.

इमेज कॉपीरइट ANKUR JAIN

एसआईटी ने उनपर मुसलमानों को न बचाने और अभियुक्तों को 'खूली छूट' देने का आरोप लगाया था.

इरडा की चूक मुक़दमे में की गई उनकी जांच के तौर तरीक़े में भी दिखी.

एसआईटी ने उनपर जांच के दौरान यांत्रिक रवैया अपनाने और इस तरह की कमियां रखने का इलज़ाम लगाया जिससे अभियुक्तों को बच निकलने में फ़ायदा हो सकता था. उन पर सबूतों को मिटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का भी आरोप लगा था.

इरडा की ओर से दर्ज एफ़आईआर में 11 लोगों को अभियुक्त बनाया गया था लेकिन इसमें से दो व्यक्तियों के नाम दो बार इस्तेमाल किए गए थे. इससे नौ की संख्या बढ़कर 11 हो गई थी.

सीबीआई के पूर्व अधिकारी आरके राघवन 2002 में गुजरात एसआईटी के प्रमुख थे.

इमेज कॉपीरइट AP

वो कहते हैं, "हमने इरडा को पर्याप्त सबूत होने पर ही गिरफ़्तार किया था. मुझे कोर्ट का आदेश देखना होगा कि क्यों उन्हें सभी आरोपों से बरी किया गया है."

लेकिन गुजरात पुलिस में कई लोगों का मानना है कि गुलबर्ग सोसाइटी का सच इरडा को मालूम है.

इरडा मीडिया से बहुत कम बात करते हैं और कुछ साल पहले हुए एक टीवी स्टिंग के बाद तो उन्होंने अपने आपको पूरी तरह से अलग-थलग कर लिया था.

कोर्ट का आदेश आने के बाद भी उन्होंने मीडिया से कोई बातचीत नहीं की.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार