स्मृति पर मोदी का इतना भरोसा क्यों?

  • 4 जून 2016
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बात 2014 के आम चुनावों की है और मैं स्मृति इरानी की एसयूवी में पीछे बैठ कर एक चुनावी सभा में पहुंचने वाला था.

उन्होंने एकाएक पीछे मुड़कर कहा, "अभी देखते जाओ. यहां चुनाव कैंपेन का इतिहास बदल देंगे."

इसके दो हफ़्ते बाद गौरीगंज, अमेठी में एक चुनावी सभा ख़त्म होते ही इंटरव्यू के इंतज़ार में उनकी गाड़ी में बैठा ही था कि स्मृति बोलीं, "मोदी जी आ रहे हैं यहां राहुल के ख़िलाफ़ कैंपेन करने."

मुझे थोड़ा ताजुब्ब हुआ. आमतौर पर और ख़ास कर पुराने दौर में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार विपक्षी के बराबरी के उम्मीदवार के ख़िलाफ़ चुनाव प्रचार नहीं किया करते थे.

हालांकि ये भी सच है कि राहुल गांधी कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार नहीं थे.

स्मृति की बात सौ आने सच निकली. पांच मई को पांच बजे अमेठी में चुनाव प्रचार ख़त्म होना था और चार बजे मोदी का हैलीकॉप्टर मुंशीगंज के उस गेस्ट हाउस से थोड़ी दूर ही उतरा जहां राजीव, संजय, सोनिया, प्रियंका और राहुल गांधी दशकों से रुकते रहे हैं.

दो वर्ष बीत चुके हैं और स्मृति इरानी ने तब से पीछे मुड़ कर नहीं देखा है.

एक ज़माने में मोदी का विरोध और बाद में उससे इंकार कर चुकीं इरानी इस समय की सरकार के कोर ग्रुप में गिनीं जाती हैं.

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2004 और 2014 में चांदनी चौक और अमेठी से लोक सभा चुनाव हारने के बावजूद वे आज भारत की एचआरडी मंत्री हैं और नरेंद्र मोदी की नीतियों की 'पुरज़ोर' हिमायती भी.

भाजपा के लोग बताते हैं कि कैबिनेट बैठकों में स्मृति की बात बराबर से सुनी जाती है.

ग़ौर इस पर भी किया जाना चाहिए कि गुजरात से राज्य सभा सांसद स्मृति के मंत्रिपद के दो साल कितने विवादास्पद रहे हैं.

अपनी ग्रैजुएशन की डिग्री और फिर उसके बाद अमरीका की येल यूनिवर्सिटी में किया हुआ कथित कोर्स हो या एचआरडी मंत्रालय और संस्थाओं में आरएसएस बैकग्राउंड से जुड़े लोगों का चयन.

टीचर्स डे यानि शिक्षक दिवस को 'गुरु उत्सव' नाम से मनाने की पहल या फिर देश भर के स्कूलों में नरेंद्र मोदी का बच्चों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए दिया गया भाषण हो.

आईआईटी दिल्ली के निदेशक का इस्तीफ़ा हो या मंत्रालय से दिल्ली विश्वविद्यालय के तत्कालीन वाइस चांसलर दिनेश सिंह के ख़िलाफ़ कारण बताओ नोटिस.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वीसी से तनातनी या फिर जेएनयू कैंपस में कथित हेट स्पीच को लेकर मचा बवाल.

हां, संसद में मायावती से हुई एक बहस के बाद स्मृति को अपने वाक्यों पर सफ़ाई देनी पड़ी.

बड़ा सवाल यही है कि अपने सभी मंत्रियों पर 'पैनी नज़र' रखने वाले पीएम नरेंद्र मोदी ने आख़िर स्मृति इरानी से जुड़े तमाम विवादों पर क्या रुख़ अपनाया है?

ख़बरें हैं कि उत्तर प्रदेश के आगामी विधान सभा चुनावों के लिए भी इन दिनों स्मृति का नाम पार्टी में चर्चा में है.

हालांकि भाजपा के भीतर के लोग बताते हैं कि 'मामले पर अभी सभी स्टेकहोल्डरों से बातचीत चल रही है, तय कुछ भी नहीं हुआ है.'

अगर भाजपा नेतृत्व स्मृति इरानी को यूपी में बतौर सीएम उम्मीदवार उतारता है तो उनका क़द शायद प्रदेश के दूसरे क़द्दावर नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों में अचानक से और उपर चढ़ेगा.

और ये तो जगज़ाहिर है है कि इस समय पार्टी की 'बागडोर' नरेंद्र मोदी और मौजूदा अध्यक्ष अमित शाह के हाथों में है, और सभी बड़े 'फ़ैसले' उन्हीं के होते हैं.

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