उप्र में बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग 'राम' भरोसे

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असम चुनाव में जीत दर्ज करने के बाद उत्साहित बीजेपी नेतृत्व उत्तर प्रदेश की चुनावी लड़ाई में बड़ी जीत हासिल करना चाहती है.

इसके लिए बीजेपी उत्तर प्रदेश में अपने संगठन के नेतृत्व के साथ-साथ सामाजिक, जातीय और धार्मिक समीकरणों को तो मज़बूत करने की दिशा में काम कर ही रहा है, साथ ही मोदी सरकार के दो साल के काम, उनकी छवि, का व्यापक रुप से गांव-गांव में प्रचार करने की योजना पर भी काम कर रही है.

केन्द्र में एनडीए की सरकार के अभी हाल ही में दो वर्ष पूरे होने पर नरेंद्र मोदी की एक बड़ी ‘विकास सभा’ सहारनपुर में की गई. चुनाव को ही ध्यान में रखकर 12-13 जून को बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक इलाहाबाद में आयोजित की जा रही है.

जहां तक नेतृत्व का प्रश्न है तो लग रहा है कि बीजेपी मोदी की छवि पर ही ज़्यादा निर्भर रहेगी, हालांकि उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को उत्तर प्रदेश चुनाव में बड़ी भूमिका देने की बात की जा रही है.

इससे ज़ाहिर होता है कि बीजेपी बाबरी मस्जिद विध्वंस के नायक को फिर से चुनाव में लाकर ‘हिन्दुत्व’ के ध्रुवीकरण की राजनीति को ज़्यादा प्रभावी बनाना चाहती है.

अभी हाल ही में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने बयान दिया है कि उत्तर प्रदेश को देखिए वह किसे अपना राम चुनती है. आदित्यनाथ बार-बार कहते ही रहते हैं कि हिन्दुत्व और राम मंदिर आगामी चुनाव में हमारे महत्वपूर्ण मुद्दे होंगे.

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अभी हाल ही में अख़लाक़ के घर पाए गए मांस को मथुरा की एक लैब ने अपनी रिपोर्ट में ‘गोमांस’ बताया है जिससे बीजेपी और संघ परिवार को हिन्दुत्व की राजनीति करने में मदद मिल रही है.

बीजेपी एक तरफ़ ‘विकास की राजनीति’ करते हुए ‘विकास पर्व’ जैसे आधुनिक और सबको स्वीकार होने वाले मुहावरों का इस्तेमाल कर रही है तो दूसरी तरफ़ ‘जातीय समीकरण’ को साधने के लिए सोशल इंजीनियरिंग को मज़बूत करने में लगी है.

वे ग़ैर-यादव ओबीसी, एमबीसी (अति पिछड़ा वर्ग) और ग़ैर-जाटव दलितों को अपनी राजनीति से जोड़ने के मक़सद से काम कर रही है. इसके लिए बीजेपी दो स्तरों पर काम कर रही है.

एक तो पार्टी नेतृत्व में इन वर्गों को प्रतिनिधित्व देना और दूसरी ओर अलग-अलग सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से इन जातियों को अपने से जोड़ना.

बीजेपी उत्तर प्रदेश में पटेल, बिन्द, राजभर, मौर्य, काछी, लोध, निषाद जैसी ओबीसी, एमबीसी जातियों का महासंघ बनाना चाहती है ताकि यादव मतों की बड़ी संख्या के प्रभाव को कमज़ोर कर सकें.

इसलिए उसने केशव प्रसाद मौर्य को उत्तर प्रदेश बीजेपी का अध्यक्ष बनाया और कल्याण सिंह को चुनाव में सक्रिय किया है. साथ ही साथ उसने अनुराधा पटेल, कृष्णा पटेल, अनिल राजभर जैसे जातीय आधार वाले नेताओं को भी पार्टी से जोड़ा है.

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वहीं पार्टी गांव-गांव में ‘विचार कुंभ’ आयोजित करने की योजना पर काम कर रही है. वे हर विचार कुंभ में सामाजिक समरसता भोज का आयोजन कर दलितों में ग़ैर-जाटव दलित जातियों और मुसहर, धोबी, भड़भूजा जैसे जातियों को जोड़कर दलितों में अपना पैठ बनाना चाहती है.

विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस और बीजेपी विचार कुंभ में दलितों, ओबीसी और सवर्णों के सहभोज के अवसर पर पूजा का आयोजन करना चाहती है.

वे पूजा के प्रसाद को घर-घर में भेजकर दो उद्देश्यों को साधना चाहती है. एक तो इसके माध्यम से वे हिन्दुत्व की राजनीति को बढ़ाना चाहती है तो दूसरी ओर अपने चुनावी समीकरण को मज़बूत करना चाहती है.

बीजेपी विकास की सोच के साथ अस्मिता का अनोखा संगम कर रही है.

उत्तर प्रदेश में पार्टी के संगठन के अंदर ज़िलों से लेकर मंडल स्तर तक की कमीटियों में दलित, ओबीसी और महिलाओं के लिए सीट सुरक्षित कर दिए गए हैं.

मंडल स्तर पर 15 पदाधिकारी होंगे तो उनमें से पांच महिलाएं होंगी और अनुसूचित जाति, जनजाति के दो पदाधिकारी होंगे. ब्लॉक स्तर पर 60 सदस्य होंगे जिसमें 20 महिलाएं होंगी और अनुसूचित जाति, जनजाति के 4 सदस्य होंगे. अनुसूचित जाति/जनजाति में आम तौर पर ग़ैर-जाटव दलितों को ज़िम्मेदारी दी जा रही है, इनमें खटिक, सोनकर, मुसहर, भंगी जैसी जातियां महत्वपूर्ण हैं.

इन जातियों के नायकों और देवताओं के मंदिर भी बनाए जा रहे हैं. मुसहर बस्तियों में ‘सबरी माता’ की मंदिर बीजेपी बनवा रही है. मुसहर अपने को ‘सबरी माता’ का वंशज मानते हैं.

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प्रधानमंत्री के द्वारा गोद लिए गांव जयापुरा की मुसहर बस्ती जिसे ‘अटल नगर’ नाम दिया गया है, में ‘शबरी माता’ के मंदिर का एक मॉडल भी तैयार किया गया है.

ऐसे ही राजभरों की बस्तियों में ‘सुहलदेव राजभर’ का थान बनवाया जा रहा है. लोध जाति को ख़ुश करने के लिए बीजेपी नेता आनंदी बाई लोधी का गुणगान करते नहीं थक रहे हैं. लेकिन बीजेपी के सामाजिक इंजीनियरिंग की राजनीति की समस्या है कि समाजवादी पार्टियां अपना यादव अधिकार बचाए रखते हुए एमबीसी की जातियों और धानुक, गड़ेरिया, निषाद जैसी जातियों को जोड़ने के काम में लंबे समय से लगी है.

बसपा भी ग़ैर-यादव ओबीसी मतों को हासिल करने में लगी हुई है.

छोटे-छोटे सांप्रदायिक विवादों की पृष्ठभूमि भी तैयार की जा रही है ताकि चुनाव के पहले छोटे-छोटे स्तर पर तनाव आयोजित करवा के सांप्रदायिक धुव्रीकरण किया जा सके.

ऐसे तनाव अक्सर ‘मुस्लिम-दलित’ के बीच कराए जाने की योजना पर संघ परिवार काम कर रही है. अयोध्या में बजरंग दल के शिविर और वीएचपी के शिविरों में की जाने वाली बातें, पूर्वी उत्तर प्रदेश में आज़मगढ़ और दूसरी जगहों पर हाल में हुए साम्प्रदायिक तनावों से यह बात साबित होती है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो उन्होंने पिछले दिनों संप्रदायिकता की राजनीति का सफल प्रयोग किया ही है.

मूल रूप से उत्तर प्रदेश में बीजेपी की चुनावी राजनीति ‘भावनाओं को भड़काने की राजनीति’ है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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