सूखे का इलाज करेंगे 'वॉटर डॉक्टर'

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धरती पर भले ही 70 फ़ीसदी पानी हो फिर भी 78 करोड़ तीस लाख लोगों को साफ़ पानी नहीं मिल पाता है.

गंदे पानी को पीना और गंदे पानी में नहाना जानलेवा हो सकता है लेकिन हालात को बदलने के लिए अब आसान समाधान निकालने का वक़्त आ गया है.

जो लोग इस तरह के समाधान निकालने में लगे हुए है उनमें से एक हैं भारत के आंध्र प्रदेश के अयप्पा मासागी, जिन्हें 'वॉटर डॉक्टर' के नाम से जाना जाता है.

आंध्र प्रदेश में उनसे मिलने पहुंचे मैथ्यू व्हीलर और प्रीति गुप्ता और जाना कि कैसे वे साफ़ पानी मुहैया कराने की मुहिम चला रहे हैं.

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अयप्पा मासागी का बहुत छोटा सा संदेश है, "आपको पानी चाहिए तो मुझे कॉल करें!"

उनका फ़ोन दिनभर बजता रहता है. ऐसा लगता है कि उन्हें कॉल करने वालों की कोई कमी नहीं है.

वो बताते हैं, "मैंने अपने बचपन में पानी की बहुत समस्या झेली है. मैं सुबह तीन बजे उठ जाता था और दरिया से पानी लाने के लिए चला जाता था. तभी मैंने क़सम खाई कि जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तो इसका समाधान निकालूंगा. इसलिए मैंने देश में पानी की समस्या का समाधान निकालने के लिए 2002 में अपनी इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ दी."

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भारत बुरी तरह से पानी की समस्या से गुज़र रहा है. क़रीब तीस करोड़ तीस लाख लोग पिछले दो मॉनसून से बारिश नहीं होने के कारण पानी की क़िल्लत से जूझ रहे हैं.

सूखाड़ पड़ा हुआ है. किसान आत्महत्या कर रहे हैं.

सूखा की मार झेल रहे गांवों से हज़ारों लोग शहर की ओर पलायन कर चुके हैं.

मासागी के आकलन के मुताबिक़ भारत में होने वाली बारिश का तीस फ़ीसदी हिस्सा भी अगर इकट्ठा कर लिया गया तो "एक साल का पानी तीन सालों तक चलेगा."

इसे साबित करने के लिए उन्होंने 2014 में चिलामाथुर के नज़दीक 84 एकड़ ज़मीन ख़रीदी और उन्होंने अपने पार्टनर्स से कहा, "मैं इस ज़मीन को किसी पानी से भरे कटोरे की तरह भर दूंगा."

चिलामाथुर आंध्रप्रदेश का बुरी तरह से सूखा प्रभावित इलाक़ा था.

आज यहां पच्चीस हज़ार बालू से भरे हुए गड्ढे हैं और चार नए झील हैं जिसमें बारिश का पानी जमा होता है.

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यहां होने वाली बारिश की एक बूंद भी नदी या समुद्र में नहीं जाती है. इससे यहां की नीचे की मिट्टी में पानी जमा रहता है और जब ज़रूरत पड़ती है तब पांच कम गहराई वाले कुंओं की मदद से निकाला जाता है.

झील तैयार करने के सिलसिले में जो ऊपरी मिट्टी निकली उसका इस्तेमाल ज़मीन की सतह को बराबर करने में किया गया. इसमें फिर पेड़-पौधे और फ़सलें लगाई गई.

मासागी अपने वॉटर लिटरेसी फाउंडेशन के ज़रिए लोगों को जल संरक्षण का प्रशिक्षण देते हैं. उन्होंने अब तक सात किताबें लिखी हैं और भारत और बाहर के देशों के 100 से ज़्यादा लोगों को प्रशिक्षित किया है.

उनके पास जर्मनी, जापान और अमरीका से भी इंटर्न आते हैं.

साफ़ पानी मुहैया कराने की ऐसी ही एक मुहिम पूर्वी अफ्रीका के देशों में चल रही है.

यहां पहुंचे जोए फ्लड और देखा कि कैसे कुछ नौजवान उद्यमी अपने देश में लोगों को साफ़ पानी की सेवा दे रहे हैं.

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यूगांडा की राजधानी कंपाला के नंसाना इलाक़े में 21 साल के बेलिंडा नैगावा की फ्रेंचाइज़ी का तंबू लगा हुआ है और इस तंबू के बाहर पानी लेने वालों की क़तार लगी हुई है.

यहां एक ख़ास तरह की पानी मिल रही है जिसे जीबू वॉटर कहते हैं. इसे स्थानीय स्तर पर पानी साफ़ करने वाले छोटे संयंत्र में फ़िल्टर किया गया है.

जीबू वॉटर फिर से इस्तेमाल की जाने वाली बोतल में दी जाती है. इससे ग्राहक को कम ख़र्च करना पड़ता है.

ऐसे लोग जो पहले पानी को उबाल कर पीते थे उन्हें इस मुहिम के मार्फ़त कम लागत में साफ़ पानी मिलने लगा है.

बैलिंडा नैगावा का कहना है, "मैं दूसरे फ्रेंचाइज़ी में मैनेजर के रूप में काम कर रहा था और मुझे फ्रेंचाइज़ी का मालिक बनने के लिए कुछ और प्रयास करने की ज़रूरत थी."

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जीबू वॉटर के सीईओ गैलेन वेल्सक का कहना है, "फ्रेंचाइज़ी हमारे पास आते हैं और वे लाइसेंस फ़ीस के रूप में सह-निवेश करते हैं."

वो कहते हैं, "तब हम फ्रेंचाइज़ी बनाने में निवेश करते हैं जिसके अंदर एक प्रोडक्शन रूम होता. वे जितना पानी बेचते हैं हम उसी हिसाब से प्रति लीटर उनसे पैसे लेते हैं. इसतरह से हम अपनी फ्रेंचाइज़ी बनाने में लगी लागत निकाल लेते हैं.''

जीबू ने यूगांडा, रवांडा और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो में यह प्रोजेक्ट शुरू किया था लेकिन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो में असफल होने के बाद कीनिया में इसे लांच करने की तैयारी पर काम चल रहा है.

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