बस अपना बच्चा पास हो जाए...

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बिहार में टॉपर्स घोटाले के बाद वहां की परीक्षा व्यवस्था पर कई सवाल खड़े हो गए हैं.

लेकिन हमारी परीक्षा व्यवस्था में धोखाधड़ी कोई नई बात नहीं है. यह बहुत समय से चला आ रहा है. बाद में तो इसमें व्यवसायिकता भी आ गई.

कई परीक्षा केंद्र छात्रों की तरह-तरह से मदद करते हैं और उनसे पैसा लेते हैं. ये एक देशव्यापी समस्या है लेकिन यह कहा जा सकता है कि हिंदी पट्टी में यह ज़्यादा है.

लेकिन कोई भी इसके स्थाई इलाज के बारे में नहीं सोचता है. इस मामले में मैं बिहार को बिल्कुल अलग नज़र से नहीं देखता हूँ.

ये बीमारी सिर्फ़ पूर्वी हिंदी पट्टी में ही नहीं, और प्रदेशों में भी है. यह संयोग की बात है कि कहीं की कोई चीज़ एकदम से उजागर हो जाती है.

पिछले साल जब व्यापम का मामला सामने आया तो उसकी जड़ों में भी यही था.

2005 में राष्ट्रीय पाठ्चर्या की जो रूपरेखा आई थी उसने परीक्षा व्यवस्था के सुधार के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिेए थे.

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जिसमें से कुछ को सीबीएसई ने 2008 में लागू करना शुरू किया था. लेकिन दो-तीस साल के भीतर परिस्थिति बिल्कुल बदल गई और अब पुरानी वाली परिस्थिति लौट आई है.

सीबीएसई तो एक-डेढ़ साल से अनाथ पड़ी हुई है. वहां कोई अध्यक्ष नहीं है.

व्यवस्था के पास सुधरने के लिए इच्छाशक्ति का अभाव है. यह इच्छाशक्ति एक दिशा में व्यवस्था को आगे बढ़ाती रहती.

इस नाकामी की कोई एक वजह नहीं है. समाज और राज्य की उदासीनता मिलकर एक परिस्थिति का निर्माण करती है.

हमारी परीक्षा पद्धति है ही इस क़िस्म की कि हर आदमी सोचता है कि इसमें से हमारा बच्चा ठीक से निकल जाए.

उसके बाद व्यवस्था की कोई फ़िक्र नहीं करता है.

इसलिए समाज, मीडिया और सरकार और यहां तक कि उन संस्थाओं में भी कोई स्थाई सुधार की इच्छा नहीं है.

(शिक्षाविद् कृष्ण कुमार से बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्या से बातचीत पर आधारित)

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