जितना दबाएंगे, ख़बर उतनी ही बड़ी होगी

  • 9 जून 2016
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पिछले दिनों मुंबई पुलिस ने फ़ेसबुक और यूट्यूब को सचिन तेंदुलकर और लता मंगेश्कर का मज़ाक़ उड़ाने वाले एक वीडियो को हटाने को कहा था.

उन्हें राजनीतिक पार्टियों के नेताओं की ओर से शिकायत मिली थी. इस वीडियो को स्टैंडअप कॉमेडियन तन्मय भट्ट ने सोशल साइट स्नैपचैट पर पोस्ट किया था.

भारत में अमरीका की तरह स्नैपचैट उतना लोकप्रिय नहीं है. भारत में ये सिर्फ़ कम उम्र के युवाओं में लोकप्रिय है, जबकि अमरीका में यह दूसरा सबसे ज़्यादा डाउनलोड किया जाने वाला ऐप है.

ऐप एनी के मुताबिक़, एक जून तक भारत में गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड करने के मामले में इसकी रैकिंग 89वीं थी. ऐप एनी डाउनलोड के हिसाब से रैकिंग तय करने वाली कंपनी है.

इसलिए इसकी काफ़ी संभावाना थी कि इस वीडियो को बहुत कम लोगों ने देखा होता, लेकिन मुख्यधारा की मीडिया में आने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर ज़बरदस्त प्रतिक्रिया सामने आई.

फ़ेसबुक और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और दुनिया भर में मुख्यधारा की मीडिया में आने के बाद इसे देखने वालों की संख्या 2 लाख तक पहुंच गई.

यह मामला भारत में 'स्ट्राईसैंड इफ़ेक्ट' का सबसे नया उदाहरण है. यह एक ऐसा फ़िनॉमेना है, जिसमें किसी चीज़ को दबाने की कोशिशों का अनचाहा असर होता है और बड़े पैमाने पर प्रचार मिल जाता है.

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इस प्रभाव का नाम अमरीकी इंटरटेनर बारबरा स्ट्राईसैंड के नाम पर रखा गया है. उन्होंने अपनी तस्वीरों को हटाने की मांग करते हुए एक फ़ोटोग्राफ़र और एक वेबसाइट पर पांच करोड़ अमरीकी डॉलर के हर्जाने का मुक़दमा कर दिया था.

वे ऊपर से ली गई 12,000 तस्वीरों के संग्रह से अपने घर की तस्वीर को हटाने की मांग कर रही थीं. तस्वीरों का यह संग्रह तटीय कटाव का आंकलन करने के लिए बनाया गया था.

जब स्ट्राईसैंड ने मुक़दमा दायर किया था तब तक इसे केवल छह लोगों ने देखा था. मुक़दमा दायर करने के बाद एक महीने में 4 लाख 20 हज़ार लोगों ने इस तस्वीर को देखा.

भारत की एक पत्रकार राणा अय्यूब ने 'गुजरात फ़ाइल्स: एनाटॉमी ऑफ़ ए कवर अप' नाम से हाल ही में एक किताब का लोकार्पण किया है.

इस किताब के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ.

यह किताब 2002 में गुजरात में हुए दंगे पर लिखी गई है. उस वक़्त गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे और उनपर मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा का समर्थन करने का आरोप लगा था.

किताब आने के बाद मोदी समर्थक इसके पीछे पड़ गए और जबतक यह किताब उपलब्ध होती, लेखिका के मुताबिक़, इस पर 200 नकारात्मक टिप्पणियाँ अमेज़न के पेज पर आ गई थीं.

एक जून तक किताब के ऊपर 13,00 टिप्पणियां आ गई थीं, जिसमें से 70 फ़ीसदी बहुत नकारात्मक थीं. इनमें से कुछ टिप्पणियां एक जैसी ही थीं.

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राणा अय्यूब का कहना है कि किताब पर हुए ऑनलाइन हमले ने किताब को चर्चा में ला दिया.

उन्होंने बताया, "ग्लोबल मीडिया ने इसे हाथों-हाथ लिया. यह बिना प्रशंसकों के रिलीज़ होने वाली किताब के लिए बड़ी बात थी. इसे हज़ारों लोगों ने डाउनलोड किया और पहले हफ़्ते में बाज़ार में इसकी 15,000 प्रतियाँ आ चुकी हैं."

ऐसा ही इस साल की शुरुआत में टेलीविज़न पत्रकार बरखा दत्त की किताब के साथ भी हुआ.

एक जून तक अमेज़न के पेज पर उनकी किताब पर 4,100 टिप्पणियां आ चुकी थीं, जिनमें से 95 फ़ीसदी नकारात्मक थीं.

ट्विटर यूज़र सालों से इस प्रभाव से वाक़िफ़ हैं. 2012 में दक्षिण भारत के एक व्यवसायी रवि श्रीवास्तव ने कांग्रेस के एक युवा नेता पर अकूत धन इकट्ठा करने की बात ट्वीट की थी.

उस राजनेता के शिकायत दर्ज कराने के बाद अगली सुबह पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया.

इसके बाद तो रवि श्रीवास्तव को सोशल मीडिया पर समर्थन करने की बाढ़ सी आ गई और वे रातों रात हीरो बन गए. वे टेलीविज़न के प्राइम टाइम पर आने लगे.

48 घंटों में ट्विटर पर उनके फॉलोवरों की संख्या 16 से 2,300 पहुँच गई और जिस ट्वीट को कुछ चंद लोगों ने ही देखा था, वो टेलीविज़न, अख़बारों और सोशल मीडिया के ज़रिए दसियों हज़ार लोगों तक पहुँच गया.

देखा गया है कि सूचनाओं को दबाने की क़ानूनी पहल का उल्टा असर होता है.

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अप्रैल 2014 में तीन लेखकों ने मिलकर अपनी एक किताब 'गैस वार्स: क्रोनी कैपिटलिज्म एंड द अंबानी' का ख़ुद से प्रकाशन किया था.

इस किताब के लिए अंबानी भाइयों की दो कंपनियों ने लेखकों, वेबसाइट अमेज़न और फ्लिपकार्ट को मानहानि के चार क़ानूनी नोटिस भेजे.

अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर ये किताबें बिक्री के लिए उपलब्ध थीं. उन्होंने उस प्रकाशक को भी नोटिस भेजा, जिसने इस किताब की समीक्षा छापी थी.

एक नोटिस में एक अरब रुपए की मानहानी का दावा किया गया था.

इन क़ानूनी नोटिसों ने किताब को मशहूर कर दिया और न्यूज़वीक और न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने इस पर स्टोरी की.

इस किताब के सह-लेखक परांजॉय गुहा ठाकुरता का कहना है, "अख़बार और टेलीविज़न चैनलों ने गैस वार्स को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर रखा था, लेकिन क़ानूनी नोटिस ने इसे सुर्खियों में ला दिया. लोगों में किताब ख़रीदने की होड़ लग गई. लोग प्रतिबंध लगने से पहले किताब ख़रीद लेना चाहते थे."

हाल का एक उदाहरण स्वयंभू मैनेजमेंट गुरु अरिंदम चौधरी और उनके संस्थान इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ प्लानिंग एंड मैनेजमेंट (आईआईपीएम) का भी है.

आईआईपीएम अपने प्रचार पर यह बहुत ख़र्च करने की वजह से ख़ूब विवादों में रहा था.

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हालांकि इसका सबसे पसंदीदा हथियार रहा है लेखकों और पत्रकारों के ख़िलाफ़ क़ानूनी धमकियाँ, जो कि अक्सर भारत के दूर-दराज के इलाक़ों से दायर की जाती थीं और लोगों को दूर दराज़ के स्थानीय कोर्ट में आने पर मजबूर होना पड़ता था.

ऐसा ही एक नोटिस पेंगुईन प्रकाशन को मिली, जिसमें 2001 में इसकी छापी गई किताब से अरिंदम चौधरी के ऊपर लिखे एक चैप्टर को हटाने की मांग की गई थी.

ऐसा नहीं है कि हर कोई उनके सामने झुका ही हो. महेश्वर पेरी 'करियर्स 360' नाम से एक प्रकाशन चलाते हैं.

उन्हें अरिंदम चौधरी और आईआईपीएम की ओर से देश भर की अदालतों में दायर दर्जन पर मुक़दमों का सामना करना पड़ा था.

महेश्वर पेरी बताते हैं कि आईआईपीएम की ओर से दायर किया गया हर नया मामला, 2009 में छपे उन तीन लेखों को चर्चा का विषय बनता रहा, जिसे अरिंदम चौधरी दबाना चाह रहे थे.

इन सालों में हो सकता है आख़िरकार अरिंदम चौधरी को स्ट्राईसैंड प्रभाव समझ में आ गया हो, लेकिन इसके लिए उन्हें बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी.

देश भर में कई अदालतों से अपने पक्ष में आदेश नहीं आने के बाद आईआईपीएम ने 2015 में घोषणा की कि वे भारत में अपने सभी कैंपस बंद कर रहे हैं.

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