उड़ता पंजाब: नशे ने मेरे बेटे को खा लिया

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दो दिन पहले की ही बात है. ऑफ़िस से घर लौटते हुए ड्राइवर साहब ने गाड़ी ग़लत रास्ते पर ले ली. मेरे टोकने पर उन्होंने तोहमत मुझ पर ही लगा दी.

“आप काफ़ी देर से फ़ोन पर किसी से फ़िल्म उड़ता पंजाब और नशे पर बात कर रही हैं, मेरा ध्यान उसी में था. मेरा गाँव पंजाब में हैं, नशे ने नाश कर डाला है. हमारे गाँव में उस नशे को चिट्टा कहते हैं. अब फ़िल्म बन रही है तो उसमें नशाखोरी भी न दिखाएँ ?”

उसके इस सवाल से मुझे एहसास हुआ कि ड्रग्स को लेकर बनी फ़िल्म उड़ता पंजाब और सेंसरशिप को लेकर विवाद इतना बड़ा हो गया कि जिस मुद्दे को ये फ़िल्म उठाती है वो बैकग्राउंड में चला गया.

पंजाब का एक गाँव है मक़बूलपुरा, जहाँ नशाखोरी के कारण इतने मर्दों की मौत हो चुकी है कि इसे 'विलेज ऑफ़ विडोज़' कहा जाने लगा.

2009 के लोक सभा चुनाव में मैं पंजाब भर में घूमी थी .

किसानों की बदहाली पर एक रिपोर्ट करने के सिलसिले में एक बूढ़े किसान से जब मैं मिली तो उन्होंने अपनी बात यूँ रखी थी- “मेरे खेतों की रौनक तो लौट आएगी. इन बूढ़ी हड्डियों में इतना दम है, लेकिन मेरे घर की रौनक कैसे लौटेगी. नशे ने मेरे बेटे को खा लिया.”

अलग-अलग सर्वे, रिपोर्टें पंजाब में ड्रग्स की समस्या को लेकर गंभीर नतीजों की बात करती रही हैं.

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केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण विभाग ने इस साल पंजाब के दस ज़िलों में सर्वे कराया है, जिसे सोसाइटी फ़ॉर प्रमोशन ऑफ यूथ एंड मासेज (ए़पीआईएम) ने ऐम्स के साथ मिलकर किया है.

इसके मुताबिक़ पंजाब में ड्रग्स और दवाइयों की लत के चपेट में क़रीब 2.3 लाख लोग हैं. जबकि क़रीब 8.6 लाख़ लोगों के बारे में अनुमान हैं कि उन्हें लत तो नहीं है, लेकिन वो नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करते हैं. सर्वे से जुड़े लोगों की चिंता है कि इन्हीं में से ज़्यादातर लोग बाद में नशे के आदि हो जाते हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक़ नशा करने वालों में 99 फ़ीसदी मर्द, 89 फ़ीसदी पढ़े लिखे, 54 फ़ीसदी शादी शुदा लोग हैं. हेरोइन सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला मादक पदार्थ है (53 फ़ीसदी). हेरोइन इस्तेमाल करने वाला इस पर रोज़ाना क़रीब 1400 रुपए ख़र्च कर डालता है.

इसकी झलक गीत-संगीत, गानों में भी दिखती है, ख़ासकर जिस तरह दारू और शराब को मर्दानगी से जोड़कर बढ़ा चढ़ा कर इन दिनों पंजाबी गानों में पेश किया जाता है, उससे ऐसी छवि बनती है कि ड्रग्स लेना बड़े शान की बात हो.

मसलन ये गाना –“ जिन्नी तेरी कॉलेज दी फ़ीस झल्लिए, ऐनी नागनी जट्टा दा पुत्त खांदा तड़के”

मतलब ये कि लड़का लड़की से इस बात की डींगे मार रहा है कि जितनी तुम्हारी कॉलेज की फ़ीस है, उतने की तो जाट का बेटा सुबह नागनी (यानी अफ़ीम) खा लेता है.

या फिर हनी सिंह का “ऐना वी न डोप-शोप मारया करो” जो ड्रग्स को एकदम हिप और कूल फ़ील देता है.

पंजाब में हालात और बिगड़े, जब हेरोइन की तस्करी बड़े पैमाने पर शुरु हुई. पंजाब में पाकिस्तान सीमा से लगे इलाक़ों में समस्या सबसे ज़्यादा है, जहाँ से अफ़ग़ानिस्तान से होते हुए हेरोइन की भारत में तस्करी की जाती है.

इस साल बीएसएफ़ के हाथों पंजाब सीमा पर होरोइन की तस्करी पकड़ने के कम से कम छह बड़े मामले सामने आ चुके हैं. मई में बीएसएफ़ ने पंजाब सीमा से 18 किलो हेरोइन पकड़ी..और ये सिलसिला कई साल से जारी है.

चंडीगढ़ स्थित संस्था आईडीसी ने भी पंजाब के सीमावर्ती ज़िलों का अध्ययन किया था. प्रोफ़ेसर पीएस वर्मा अपनी रिपोर्ट में लिखते हैं, “एक मामला तो ऐसा भी था, जहाँ चाय बेचने वाले का 12 साल का बेटा बीड़ी पीने लगा और धीरे धीरे फिर सूखी भांग का आदि हो गया और उसे संगरूर के नशामुक्ति केंद्र में ले जाना पड़ा. ऐसे बच्चे या तो ड्रग्स की तस्करी कें धंधे में चले जाते हैं या चोरी-चकारी जैसे कामों में.”

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राहुल गांधी ने 2014 के लोकसभा चुनावों में जब बयान दिया था कि पंजाब में 70 फ़ीसदी लोग नशे के शिकार हैं, तो इसपर काफ़ी बयानबाज़ी हुई कि आँकड़े बढ़ा चढ़ा कर बताए जा रहे हैं. फिर बात राजनीति की बहसा–बहसी में आई-गई हो गई.

इस पर नाइत्तेफ़ाकी हो सकती है कि पंजाब में कितने फ़ीसदी लोग नशे की चपेट में हैं, लेकिन इससे ज़िंदगियाँ तबाह हो रही हैं, इसके निशान हर ओर दिखते हैं.

भांगड़ा और सरसों के खेत वाले पंजाब की दूसरी कई सच्चाइयाँ भी हैं, जो पंजाबी फ़िल्मों में भी गाहे-बगाहे ही उतरती है. फ़िल्म उड़ता पंजाब के बहाने ही सही, जिन्न बोतल से बाहर निकला तो है. वरना तो ऐसे पंजाबी गानों से काम चलाना पड़ता है, जिसमें लड़का लड़की से कहता है कि “सूखी वोडका न मारया करो, थोड़ा बहुत लिमका वी पा लिया करो”... और उस पर सेंसर की कोई कैंची भी नहीं चलती.

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