नवाब शुजाउद्दौला के ढहते महल की अनदेखी तस्वीरें

दिलकुशा इमेज कॉपीरइट Wellcome Images

लापरवाही के चलते 20 वर्षों तक अवध के नवाब रहे शुजाउद्दौला का महल 'दिलकुशा' ढहता जा रहा है.

फ़ैज़ाबाद और अयोध्या के बीच स्थित इस छोटे महल के बीच का पूरा हिस्सा गिर चुका है और अब बाहर की चारदीवारी भी गिरने की कगार पर है.

ख़ास बात ये है कि ये कम्पाउंड भारत सरकार के नारकोटिक्स विभाग के पास पिछले कई दशकों से है और इसके भीतर प्रवेश करने पर मनाही है.

ईस्ट इंडिया कंपनी से 1764 में बक्सर की लड़ाई हारने के बाद शुजाउद्दौला ने सरयू नदी के किनारे इस ख़ूबसूरत महल का निर्माण करवाया था.

कई एकड़ तक फैले इस महल का भीतरी भाग बिलकुल ढह चुका है और सिर्फ़ वही हिस्से बच्चे हैं जिनमें शायद ईस्ट इंडिया कंपनी के फ़ौजी अफ़सर रहा करते थे.

इस महल की ख़ास बात ये है कि इसके चारों ओर कई वर्ग किलोमीटर में 18वीं सदी की कुछ बेहतरीन इमारतें आज भी हैं जिन्हें शुजाउद्दौला के पिता सफ़दरजंग और शुजाउद्दौला की पत्नी बहू बेगम ने बनवाए थे.

लेकिन अब ख़स्ता हालत में पहुँच चुके इस दिलकुशा महल का असल नाम दिलकश था, जिसे अंग्रेज़ी में अनुवाद के बाद दिलकुशा के नाम से जाना जाने लगा.

वर्ष 1754 से लेकर 1775 तक नवाब शुजाउद्दौला अवध प्रांत के सूबेदार थे और इतिहास में उन्हें पानीपत की तीसरी लड़ाई (1761) में अपनी ख़ास भूमिका के लिए जाना जाता है.

इस लड़ाई ने उत्तर की ओर बढ़ती मराठा फ़ौजों को रोक दिया था, जिसमें शुजाउद्दौला ने अपनी सेना के साथ मुग़ल शासक का भरपूर साथ दिया था.

शुजाउद्दौला की मृत्यु फ़ैज़ाबाद में ही हुई थी और उनका मक़बरा 'गुलाब बाड़ी' के नाम से जाना जाता है.

दिलचस्प बात ये है कि जिस दिलकुशा महल में शुजाउद्दौला रहते थे वो क़रीब-क़रीब ढह चुका है लेकिन उनके मक़बरे का रख-रखाव अभी भी काफ़ी बेहतर है.

ग़ौरतलब है कि एक ज़माने में मुग़ल शासकों के सूबेदार रहे अवध के नवाबों ने शुरुआत में फ़ैज़ाबाद को अपनी राजधानी बनाया था.

1775 में शुजाउद्दौला के बेटे नवाब आसिफ़उद्दौला ने राजधानी को लखनऊ ले जाने का फ़ैसला किया.

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