भारतीय अर्थव्यवस्था को 'समाज सुधार' की ज़रूरत

  • 12 जून 2016
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संयुक्त राष्ट्र ने प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से दुनिया भर के देशों की सूची जारी की है. इसमें भारत 150वें स्थान पर है.

भारत में प्रति व्यक्ति सालाना आय 1586 डॉलर है. इससे ज़ाहिर होता है कि भारत का औसत व्यक्ति हर महीने 8,800 रुपए का सामान या सेवा उत्पादित करता है.

भारत से नीचे के पायदानों में यमन (1418 डॉलर), पाकिस्तान (1561 डॉलर), कीनिया (1358 डॉलर), बांग्लादेश (1,088 डॉलर), ज़िंबाब्वे (965 डॉलर), नेपाल (692 डॉलर), अफ़ग़ानिस्तान (688 डॉलर), कांगो (480 डॉलर) शामिल हैं.

प्रति व्यक्ति सालाना 131 डॉलर की आमदनी के साथ सोमालिया सूची में सबसे अंतिम पायदान पर है.

इस सूची में शीर्ष स्थानों पर यूरोप के छोटे देश शामिल हैं. इसमें मोनाको (187650 डॉलर), लिचटेंस्टाइन (157040 डॉलर) और लग्ज़मबर्ग (116560 डॉलर) काफ़ी अमीर देश हैं. जबकि सिंगापुर (55910 डॉलर) और संयुक्त राज्य अमरीका (54,306 डॉलर) उच्च आय वाले देशों में शामिल हैं.

दक्षिण कोरिया (28,166 डॉलर) की कोशिश जापान (36298 डॉलर) को पकड़ने की है जबकि जर्मनी (47966 डॉलर) और ब्रिटेन (46,461 डॉलर) भी एक दूसरे से होड़ ले रहे हैं.

ये आंकड़े अच्छे संकेतक तो हैं लेकिन हम केवल इस पर निर्भर नहीं हो सकते हैं. औसत आय की जगह सूची में मध्य में आने वाले किसी व्यक्ति की आमदनी भारत की तुलना में पाकिस्तान में ज़्यादा है.

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भारतीयों की तुलना में कम आमदनी के बावजूद ऐसा होना बताता है कि पाकिस्तान में आय का वितरण भारत से बेहतर है और पाकिस्तान भारत की तुलना में आर्थिक तौर पर कम असमान लोगों का देश है.

कई पाठकों की इसमें दिलचस्पी हो सकती है कि ज़ांबिया (1715 डॉलर), वियतनाम (2015 डॉलर), सूडान (2081 डॉलर) और भूटान (2569 डॉलर) जैसे देश भारत से आगे हैं.

श्रीलंका (3635 डॉलर) में प्रति व्यक्ति आय भारत से दोगुनी है. हालांकि यह उन लोगों के लिए अचरज भरा नहीं है जो यहां का दौरा कर चुके हैं और देख चुके हैं कि यहां के लोग भारतीयों से ज़्यादा समृद्ध हैं.

हालांकि ऐसी तुलनाओं के लिए देश का आकार, उनकी आमदनी का स्रोत और दूसरे अन्य पहलुओं का ध्यान रखा जाता है. हालांकि इन आंकड़ों को देखने से हमें ये तो पता चलता ही है कि हम कहां हैं?

संभवत: इससे हम यह विचार कर सकते हैं कि भारत को विकसित देश बनाने के लिए हमें क्या करने की ज़रूरत है?

वर्ल्ड बैंक ने ये भी फ़ैसला किया है कि वह ‘विकासशील देश’ कैटेगरी का इस्तेमाल नहीं करेगा और देशों को प्रति व्यक्ति आय के आधार पर वर्गीकृत करेगा.

भारत एक निम्न मध्य आय वाला देश हैं. इस वर्गीकरण के तहत प्रति व्यक्ति सालाना 1000 डॉलर से कम आमदनी वाले देश निम्न आय वाले देश होंगे. 1000 से 4000 डॉलर प्रति व्यक्ति सालाना आय वाले देश निम्न मध्य आय वाले देश होंगे.

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वहीं 4000 से 12000 डॉलर प्रति व्यक्ति सालाना आय वाले देश उच्च मध्य आय वाले देश होंगे. इससे ज़्यादा की आमदनी वाले देश उच्च आय वाले देश होंगे.

यूरोप के ज़्यादातर देश उच्च आय वाले देश होंगे. जहां तक मेरी जानकारी है, उसके मुताबिक़ सर्बिया की आमदनी सबसे कम होगी, वहां प्रति व्यक्ति सालाना आय 6000 डॉलर होगी.

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने हाल ही में बताया है कि अगर भारत में ग़रीबी दूर करनी है तो प्रति व्यक्ति आय क्या होनी चाहिए. हालांकि ग़रीबी को पूरी तरह से दूर करना संभव नहीं है, राजन उसे कम करने के उपायों की तरफ़ संकेत दे रहे थे.

राजन का कहना है, “एक स्तर पर हम अभी भी 1500 डॉलर प्रति व्यक्ति औसत आय वाली अर्थव्यवस्था हैं. 1500 से 50000 डॉलर, जो सिंगापुर की प्रति व्यक्ति औसत आय है, तक पहुंचने के लिए काफ़ी कुछ किए जाने की ज़रूरत है. हम अभी भी एक ग़रीब अर्थव्यवस्था हैं और प्रत्येक आंख से आंसू पोंछने के लिए हमें कम से कम 6000 से 7000 डॉलर प्रति व्यक्ति आय तक पहुंचना होगा. अगर इसका वितरण समुचित ढंग से हुआ तो हम ग़रीबी का सामना कर सकते हैं. इसके लिए कम से कम दो दशक तक काम करना होगा.”

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चीन में प्रति व्यक्ति औसत सालाना आय 7600 डॉलर है. यानी राजन जिस लक्ष्य तक पहुंचने की बात कर रहें, चीन ने उसे हाल में ही हासिल किया है.

जो लोग चीन जा चुके हैं, उन्हें मालूम होगा कि चीन में विकास की रफ़्तार का स्तर एकदम अलग है और दोनों देशों की तुलना नहीं हो सकती. वे काफ़ी आगे हैं.

मुझे नहीं लगता है कि हमारे जीवन में यह संभव हो पाएगा, यानी अगले 30 साल में चीन को पकड़ना मुझे संभव नहीं दिख रहा है.

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ऐसे में 1500 डॉलर से चार गुना छलांग लगाकर 6000 डॉलर तक पहुंचने के लिए भारत को क्या करना होगा? भारत में अब तक हर बहस के केंद्र में यही होता है कि सरकार क्या कर सकती है और उसे क्या करना चाहिए?

सोच ये है कि हमें कहीं ज़्यादा और बेहतर क़ानून की ज़रूरत है. आर्थिक सुधार एकसमान गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) के जरिए हो सकते हैं. दूसरी बात ये है कि हमें सुशासन की ज़रूरत है, यानी भ्रष्टाचार मुक्त और प्रभावी प्रशासन की.

ये भी मान लिया कि जिस देश में भ्रष्टाचार और अक्षमता संस्कृति का हिस्सा बन चुका है, वहां दूसरी बात संभव हो जाए. बावजूद इसके मुझे लगता है कि दोनों चीज़ें काफ़ी नहीं हैं.

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जिसकी ज़रूरत है, उसका बड़ा हिस्सा भी इन दो बातों से संभव नहीं होगा. जिन लोगों ने उच्च आय वाले देशों का दौरा किया है, उन्होंने यह महसूस किया होगा कि वहां का समाज भारतीय समाज से अलग तरीक़े से काम करता है.

उन देशों में व्यक्तियों के लिए सम्मान है, वे अजनबियों का अपमान नहीं करते हैं. उनके समाज में आपसी सद्भाव दिखता है. यह हमारे बेहतरीन शहरों में भी नहीं है.

यानी सरकार से ज़्यादा समाज में सुधार की ज़रूरत है. इसी से देश की आमदनी बढ़ती है और प्रति व्यक्ति आय उच्च होती है. जब तक हमारा फोकस सरकार के बदलावों पर निर्भर रहेगा, हमारी रफ़्तार धीमी रहेगी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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