असम में सीमा मुद्दे को हवा क्यों दे रहे हैं सोनोवाल?

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चुनाव हो गए, सरकार भी बन गई. मगर असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल की सूई अब भी बांग्लादेशियों के मुद्दे पर ही अटकी है.

मुख्यमंत्री बार-बार दोहरा रहे हैं कि दो साल के अंदर असम-बांग्लादेश सीमा को सील करवा देंगे.

सवाल ये है कि क्या सोनोवाल के सिर से चुनाव की खुमारी उतरी नहीं है या फिर वे इस मुद्दे को लगातार गरमाकर अपनी सियासत मज़बूत करना चाहते हैं?

वैसे तो ये हक़ीक़त है कि असम के मध्यवर्गीय हिंदू असमिया को बांग्लादेशी नागरिकों की घुसपैठ का मुद्दा परेशान करता है और वे इसका समाधान भी चाहते हैं. इसीलिए उन्होंने बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को ऐतिहासिक जीत दिलाई.

सोनोवाल की सीमा सील करने की घोषणा उनके कानों को अच्छी भी लग रही हैं, लेकिन जो सच्चाई जानते हैं वे इस घोषणा से बहुत प्रभावित नहीं हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि सीमा को सील करने का काम उतना बड़ा नहीं है जितना वे दिखाने की कोशिश कर रहे हैं.

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बांग्लादेश से लगने वाली 262 किलोमीटर की सीमा में से केवल 40 किलोमीटर का इलाक़ा ही बाड़ लगाने के लिए रह गया है. इस हिस्से के रह जाने का कारण भी यही है कि ये नदियों वाला इलाक़ा है. ज़्यादा बारिश और बाढ़ वाले इस इलाक़े में बाड़ कितनी देर टिक पाएगी और उसकी रक्षा कैसे होगी इसका अंदाज लगाना कतई मुश्किल नहीं है.

दूसरे, पूर्वोत्तर के तीन अन्य राज्यों (मेघालय-443 किमी, त्रिपुरा-856 किमी और मिज़ोरम-318 किमी) की ज़्यादा लंबी सीमाएं बांग्लादेश से लगती हैं. यानी अगर ये सीमाएं भी पूरी तरह बंद नहीं होतीं तो असम की सीमा को सील करने का कोई मतलब नहीं रह जाएगा. बांग्लादेश के लोग दूसरी जगहों से प्रवेश करके असम में पहुंच सकते हैं.

भारत और बांग्लादेश के बीच करीब चार हज़ार किलोमीटर लंबी सीमा है. 1985 में हुए असम समझौते के बाद करीब 3200 किलोमीटर की सीमा पर बाड़ लगाने का फ़ैसला किया गया था. इसमें से ढाई हज़ार किलोमीटर में बाड़ लगाई भी जा चुकी हैं.

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वैसे भी सरहदी मामलों में किसी राज्य का सीधे तौर पर कोई दख़ल नहीं होता है, फिर भी अगर सोनोवाल उन्हें हवा दे रहे हैं तो इसके दो मक़सद दिखते हैं. पहला, वे असमिया हिंदुओं के रक्षक की अपनी छवि को चमकाना चाहते हैं.

आईएमडीटी एक्ट (अवैध प्रव्रजन शिनाख्त अधिनियम) को सुप्रीम कोर्ट से रद्द करवाने में अहम भूमिका निभाने के बाद वे असम के एक वर्ग में हीरो बन गए थे. बीजेपी की चुनावी राजनीति में उनकी ये छवि बहुत काम आई थी.

अब वे इस छवि को पुख्ता करना चाहते हैं. ज़ाहिर है कि इससे पार्टी में तो उनकी स्थिति और मज़बूत होगी ही, सरकार में अपने प्रतिद्वंद्वियों को क़ाबू में रखने का लाभ भी मिलेगा. हेमंत बिस्वा सरमा को इस मामले में वे पटखनी दे सकते हैं.

दूसरे, भारतीय जनता पार्टी बांग्लादेशियों से जुड़े विवादित मुद्दों को उठाती रहना चाहेगी ताकि ये मसला कभी ठंडा न पड़े.

भाजपा का बांग्लादेशियों से मतलब बांग्लादेशी मुसलमानों से है. उसने इस मसले को हिंदू-मुसलमान में तब्दील कर दिया है. हिंदू बांग्लादेशियों को वह भारत में बसाने की पक्षधर है.

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लेकिन यह भी नहीं भुलाया जाना चाहिए कि सीमा पर बाड़ लगाने का काम बहुत खर्चीला साबित हो रहा है. अब तक इस पर क़रीब पचीस हज़ार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं. इसके बावजूद इसकी कोई गारंटी नहीं है कि लोगों का आना रुक जाएगा.

इसके कई प्राकृतिक और मानवीय कारण हैं.

सीमा पर रहने वालों की रिश्तेदारियां और कामकाज दोनों ओर फैले हुए हैं और उन्हें उनके परिवेश से अलग करना बहुत मुश्किल है.

फिर ग़रीबी और बेराज़गारी के मारे बांग्लादेशी जान जोखिम लेकर भी सीमा पार करते रहते हैं. इस चक्कर में बहुतों की जानें भी जाती हैं. कुछ समय पहले पचास से ज़्यादा लोग सीमा सुरक्षा बल की गोलियों का शिकार हुए थे.

खुली सीमा से जुड़ी एक बड़ी चिंता ये थी कि बांग्लादेश में चरमपंथियों को पनाह मिलती थी. लेकिन शेख हसीना वाजेद की सरकार के आने के बाद वह चिंता भी ख़त्म हो चुकी है.

यहां ये भी ग़ौर करने लायक है कि भाजपा दूसरे देशों से लगी सीमाओं को सील करने का मुद्दा उतने ज़ोर-शोर से नहीं उठाती जितना वो बांग्लादेश सीमा का मुद्दा उठाती है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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