तीन तलाक़ से तलाक़ चाहती हैं मुस्लिम महिलाएं

  • 13 जून 2016
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इन दिनों समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड पर इतनी चर्चा क्यों है?

चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन नाम के एक संगठन ने लगभग 50 हज़ार मुस्लिम महिलाओं के हस्ताक्षर वाला एक ज्ञापन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपा है जिसमे तीन बार तलाक़ को ग़ैर क़ानूनी बनाने की मांग की गई है.

इस ज्ञापन पर मुस्लिम समाज के कई मर्दों ने भी हस्ताक्षर किए हैं.

भारत के सर्वोच्च न्यायलय ने केंद्र सरकार से कहा है कि वो स्पष्ट करे कि वो इस पर क्या कर रही है.

जब संविधान बनाया जा रहा था उस वक़्त इसके निर्माताओं ने यह पेशकश रखी कि सभी भारतीय नागरिकों के लिए एक ही तरह का क़ानून रहना चाहिए ताकि इसके तहत उनके विवाह, तलाक़, संपत्ति और विरासत का उत्तराधिकार और दत्तक को लाया जा सके, जिसका निपटारा अलग अलग धर्म के लोग अपने स्तर पर करते रहे हैं.

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डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ स्टेट पॉलिसी यानी राज्य की नीति के निदेशक तत्वों में कहा गया है कि भारत में सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता बनाने का प्रयास होना चाहिए.

इस मुद्दे को लेकर बहस तो अंग्रेज़ों के शासनकाल से ही शुरू हो गई थी. भारत में समाज की विविधता को देखकर अंग्रेज़ शासक हैरान थे. वो इस बात पर भी हैरान थे कि चाहे वो हिन्दू हों या मुसलमान, या फिर पारसी और ईसाई, सभी के अपने अलग क़ायदे क़ानून हैं.

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इन्हीं से उनका समाज चलता था. इसी वजह से ब्रितानी हुकूमत ने धार्मिक मामलों का निपटारा उन्हीं समाजों के परंपरागत क़ानूनों के आधार पर ही करना शुरू कर दिया.

मुसलमानों के लिए प्रावधान-

  • मुसलमान पुरूष और महिला को पुनर्विवाह की अनुमति.
  • मुसलमानों में उत्तराधिकार में स्त्री को भी हिस्सा.
  • तीन बार तलाक कह कर पुरुष को स्त्री से अलग होने का अधिकार.

हिन्दू के लिए प्रावधान-

  • विधवाओं का पुनर्विवाह वर्जित
  • बाल-विवाह की अनुमति क्योंकि विवाह की कोई उम्र-सीमा तय नहीं की गई.
  • बहु पत्नी के चलन को स्वीकृति
  • स्त्री को संपत्ति या विरासत का उत्तराधिकार नहीं
  • स्त्री को दत्तक पुत्र अपनाने की भी अनुमति नहीं
  • विवाहित स्त्री को भी सम्पत्ति में कोई अधिकार नहीं

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संविधान निर्माताओं ने हिन्दू समाज की महिलाओं को उन पर लगी बेड़ियों से मुक्ति दिलाने के लिए इस बिल को बनाया.

ख़ास तौर पर डॉ बीआर अम्बेडकर इस पहल में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से सहमत थे. मगर हिन्दू कोड बिल को संसद में ज़ोरदार विरोध का सामना करना पड़ा.

विरोध कर रहे सांसदों का तर्क था कि जनता के चुने गए प्रतिनिधि ही इस पर निर्णय ले सकेंगे क्योंकि यह बहुसंख्यक हिन्दू समाज के अधिकारों का मामला है.

कुछ लोगों की नाराज़गी थी कि नेहरू की सरकार सिर्फ़ हिन्दुओं को ही इससे बाँधना चाहती है, जबकि दूसरे धर्मों के अनुयायी अपनी पारम्परिक रीतियों के हिसाब से चल सकते हैं.

हिन्दू कोड बिल पारित तो नहीं हो पाया मगर 1952 में हिन्दुओं की शादी और दूसरे मामलों पर अलग-अलग कोड बनाए गए.

1955 में हिंदू मैरिज एक्ट बनाया गया जिसमें तलाक़ क़ानूनी मान्यता के साथ- साथ अंतर जातीय विवाह को भी मान्यता दी गई जबकि एक से ज़्यादा शादी को ग़ैरक़ानूनी बनाया गया.

1956 में ही 'हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम', 'हिंदू दत्तक ग्रहण और पोषण अधिनियम' और 'हिंदू अवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम' लाया गया.

हिन्दुओं के लिए बनाए गए क़ानून के दायरे में सिखों, बौद्ध और जैन धर्म के अनुयायियों को भी लाया गया.

अंग्रेज़ों की हुकूमत के ज़माने से ही भारत में मुसलमानों के शादी, ब्याह, तलाक़ और उत्तराधिकार के मामलों का फ़ैसला शरीयत के हिसाब से लिया जाता रहा है.

इस क़ानून को मोहम्मडन लॉ के नाम से जाना जाता है. हालांकि इसकी ज़्यादा व्याख्या नहीं की गई है मगर 'मोहम्मडन लॉ' को हिन्दू कोड बिल और इस तरह के दूसरे क़ानूनों के बराबर की ही मान्यता है.

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यह क़ानून 1937 से ही चला आ रहा है. इस क़ानूनी व्यवस्था को संविधान में धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार यानी अनुच्छेद 26 के तहत है जिसमें सभी धार्मिक संप्रदायों और पंथों को सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के मामलों का स्वयं प्रबंधन करने की आज़ादी दी गई है.

लेकिन 1985 में मध्य प्रदेश की रहने वाली शाह बानो को पति द्वारा तलाक़ दिए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला किया कि उन्हें आजीवन गुजारा भत्ता दिया जाए.

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शाह बनो के मामले पर जमकर हंगामा हुआ और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने संसद में 'मुस्लिम वीमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स आफ डाइवोर्स) एक्ट पास कराया जिसने सुप्रीम कोर्ट के शाह बानो के मामले में दिए गए फैसले को निरस्त कर दिया और निर्वाह भत्ते को आजीवन न रखते हुए तलाक के बाद के 90 दिन तक सीमित रख दिया गया.

इसके साथ ही सिविल मैरिज एक्ट भी आया जो देश के सभी लोगों पर लागू होता है.

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इस क़ानून के तहत मुसलमान भी कोर्ट में शादी कर सकते हैं.

एक से अधिक विवाह को इस क़ानून के तहत अवैध क़रार दिया गया. इस एक्ट के तहत शादी करने वालों को भारत उत्तराधिकार अधिनियम के दायरे में ही लाया जाता है और तलाक़ की सूरत में गुज़ारा भत्ता भी एक सामान ही होता है चाहे वो किसी समुदाय से संबंध क्यों ना रखते हों.

कम से कम 22 ऐसे इस्लामी देश हैं जिन्होंने तीन बार तलाक़ बोलने की प्रथा को पूरी तरह ख़त्म कर दिया है. इनमे पकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की, ट्यूनीशिया और अल्जीरिया जैसे देश शामिल हैं.

पकिस्तान में इसमें बदलाव लाने की प्रक्रिया 1955 की एक घटना के बाद शुरू हुई. पकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोहम्मद अली बोगरा ने पत्नी के रहते हुए अपनी निजी सचिव से शादी की थी. इस शादी का पकिस्तान में जमकर विरोध हुआ था जिसके बाद सरकार ने एक सात सदस्यों वाली एक आयोग का गठन किया था.

पहली बार तलाक बोलने के बाद व्यक्ति को यूनियन काउन्सिल के अध्यक्ष को नोटिस देना अनिवार्य है. एक प्रति अपनी पत्नी को भी देना अनिवार्य रखा गया है

ऐसा नहीं करने पर एक साल की सजा और 5000 रूपए के आर्थिक दंड का प्रावधान किया गया है. नोटिस की अवधि 90 दिनों की होगी और 30 दिनों के अंदर ही चेयरमैन पति पत्नी के बीच मध्यस्थता करने के लिए एक कमिटी के गठन का प्रावधान.

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पत्नी के गर्भवती होने की स्थिति में तलाक़ का नोटिस 90 दिनों तक वैध नहीं होगा. बिना हलाला के पत्नी अपने पहले पति से ही दोबारा शादी कर सकती है.

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