'आप' के 21 विधायकों की सदस्यता ख़तरे में

  • 14 जून 2016
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राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने आम आदमी पार्टी के उस विधेयक को नामंज़ूर कर दिया है जिसमें 21 विधायकों को लाभ के पद के दायरे से बाहर रखने का प्रावधान था.

इस नामंज़ूरी के बाद इन विधायकों के अपने पद पर बने रहने में मुश्किल पेश आएगी.

"संसदीय सचिव विधेयक बिल'' के खारिज़ किए जाने को केंद्र सरकार को ज़िम्मेदार मानते हुए आप पार्टी के प्रवक्ता राघव चड्ढ़ा कहते हैं कि इन 21 विधायकों को किसी तरह की आमदनी, सुविधा, गाड़ी, बंगला जैसी सुविधाएं पार्टी नहीं दी जा रही है.

वे अपने ख़र्चे पर जगह-जगह काम कर रहे हैं. ऐसे में मोदी जी ये चाहते हैं कि विधायक घर बैठ जाएं तो मोदी जी न तो ख़ुद काम करना चाहते हैं और न हमारे विधायकों को काम करने देना चाहते हैं.

जबकि भाजपा विधायक विजेंद्र गुप्ता इस विधेयक को केजरीवाल सरकार पर नियम का उल्लंघन बताते हुए कहते हैं, "केजरीवाल सरकार जनता के पैसे का ग़लत फ़ायदा उठाने की कोशिश कर रही थी, अधिनियम के अनुसार 70 विधायकों में से महज़ दस फीसदी ही मंत्री पद ग्रहण कर सकते हैं."

लेकिन आपकी सरकार ने सात की जगह 28 लोगों को ऑफ़िस ऑफ प्रॉफिट के अंतर्गत शपथ दिलाई. जिसमें सात मंत्री और 21 संसदीय सचिव शामिल थे.

विजेंद्र गुप्ता अरविंद केजरीवाल से इस्तीफ़े की मांग की है.

उधर राष्ट्रपति का फ़ैसला आने के बाद केजरीवाल ने फिर से मोदी सरकार की आलोचना करते हुए ट्वीट किया है कि सरकार न तो काम करती है और न ही करने देना चाहती है.

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उधर कांग्रेस पार्टी ने भी केजरीवाल को आड़े हाथों लिया है.

कांग्रेस पार्टी के नेता अजय माक़न ने ट्वीट कर कहा है कि आम आदमी पार्टी के विधायक तीन लाख की तनख्वाह से भी खुश नहीं है. इसलिए दफ्तर और दूसरी सुविधाओं की ख़ातिर सचिव बन गए.

आप के 21 विधायकों की सदस्यता रद्द होने के विषय में वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी बताते हैं कि जिस वक़्त इन विधायकों को संसदीय सचिव के पद पर नियुक्त किया जा रहा था, उसी वक्त ये बात उठी थी कि नैतिकता और क़ानून की बात करने वाली आप की सरकार भी उसी तरह फायदा पहुंचा रही है जिस तरह दूसरी राजनीतिक पार्टियां उठाती रहीं है.

अब सरकार के पास अदालत जाने का ही एक रास्ता बचा है लेकिन सवाल ये उठता है कि चुनाव आयोग और राष्ट्रपति के मामले को ख़ारिज किए जाने के बाद अदालत इस मामले में दख़ल देगी?

प्रमोद जोशी के मुताबिक़ यदि किसी मामले में राष्ट्रपति और चुनाव आयोग दोनों ही एक मत हों तो अदालत भी उन फ़ैसलों को रद्द नहीं करता है.

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