'मर्द बोले तलाक़, बीवी को अदालत के चक्कर'

  • 14 जून 2016
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मारिया बेगम की शादी 29 साल की उम्र में हो गयी थी. हालांकि शुरू से ही पति-पत्नी के संबंधों में दरार आ गई, मारिया हमेशा पति के साथ ही रहना चाहती थीं.

मगर एक दिन उन्हें तब झटका लगा जब पति ने तलाक़ देने की घोषणा कर दी.

उन्होंने इस्लामी संस्था 'दारुल क़ज़ा' का दरवाज़ा खटखटाया मगर वहां मौजूद क़ाज़ी ने कह दिया कि अब कुछ नहीं हो सकता और तलाक़ वैध है.

मारिया को मेहर भी नहीं दिया गया और उन्होंने अब न्याय के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाया क्योंकि 'मुस्लिम पर्सनल लॉ' के तहत बनाए गए 'दारुल क़ज़ा' से उन्हें इंसाफ नहीं मिल पाया.

उनका कहना है कि उनके जैसी महिलाओं को इस तरह की सामाजिक संस्थाओं से न्याय नहीं मिल सकेगा इसलिए इन मामलों का निपटारा अदालतों में ही होना चाहिए और इसके लिए क़ानून भी होना चाहिए.

फ़रज़ाना (बदला हुआ नाम) का निकाह 21 साल की उम्र में हुआ और अब उनका एक आठ साल का बेटा है.

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शादी के चार महीनों के अंदर ही उनका पति काम करने सऊदी अरब चला गया.

जब वो दो साल के बाद लौटा तो उसने अपनी बीवी के ज़ेवर गिरवी रख दिए और एक कार ख़रीद ली.

वो वापस सऊदी अरब चला गया. फिर लंबे समय तक ना उसका कोई फोन आया और ना ही ही कोई चिठ्ठी.

फ़रज़ाना अपने बेटे के साथ रोज़ उसका इंतज़ार करती रहीं.

मजबूर होकर वो क़ाज़ी के पास पहुंचीं जिन्होंने फ़रज़ाना के पति से फोन के ज़रिए संपर्क किया.

मगर फ़रज़ाना के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था जब क़ाज़ी साहब ने बताया कि उनके पति ने उन्हें तलाक़ दे दी है.

क़ाज़ी साहब ने यह भी कहा कि अगर वो अपने बेटे को पति के हवाले कर दें तो वो उन्हें मेहर देने को तैयार हो सकते हैं.

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आश्चर्यजनक रूप से क़ाज़ी साहब ने वो काग़ज़ भी निकाल लिया जिसमें तलाक़ की बात कही गई थी.

फ़रज़ाना का कहना है कि सरकार को चाहिए कि वो ऐसा क़ानून बनाये ताकि धर्म की आड़ में इस तरह के एक तरफ़ा फैसले कोई ना ले पाये.

ये सिर्फ दो अकेले मामले नहीं हैं. मुस्लिम समाज को अपनी महिलाओं को लेकर एक बड़ी चिंता सता रही है.

चिंता उनके भविष्य की और उनकी सामाजिक सुरक्षा की.

हाल ही में मुस्लिम महिलाओं के बीच काम कर रही एक संस्था भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक प्रतिवेदन दिया और मांग की है कि मुस्लिम महिलाओं के साथ समाज में हो रहे लिंग भेद को समाप्त करने के लिए क़ानून बनाया जाए.

संस्था ने मांग की है कि मुस्लिम महिलाओं के हितों को देखते हुए 1936 से चले आ रहे मुस्लिम पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध करना अब ज़रूरी हो गया है.

संस्था ने इस प्रतिवेदन की प्रतियां विधि आयोग से लेकर अल्संख्यक आयोग तक को भेजी है और कहा है कि 1985 में शाह बानो के मामले के बाद से ही कुछ 'पुरूष प्रधान सोच वाले' लोगों और धर्म की अगुवाई करने का दावा करने वाले लोगों ने 'मुस्लिम पर्सनल लॉ' में किसी तरह के भी बदलाव लाने में 'हमेशा अड़चन' ही पैदा की है.

संगठन की ज़किया सोमन ने बीबीसी से बात करते हुए कहा है कि मुस्लिम देशों में भी शादियों और पारिवारिक मामलों के लिए क़ानून को संहिताबद्ध कर दिया गया है.

मोरक्को, ट्यूनीशिया, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बांग्लादेश में पारिवारिक, शादी-ब्याह और उत्तराधिकार के मामलों को संहिताबद्ध कर दिया गया है जबकि यहां 'मुस्लिम समाज के स्वम्भू नेता' इसे होने नहीं दे रहे हैं.

वो कहती हैं, "मुस्लमान मर्द तो तीन बार तलाक़ कहकर निकल लेता है. मगर मुसलमान औरत को अगर तलाक़ चाहिए तो उसे अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़ता है. समाज पुरूष प्रधान होता चला जा रहा है और औरत के खिलाफ दारुल क़ज़ा के क़ाज़ी फैसले सुनाते चले जा रहे हैं. उनके साथ नाइंसाफी कर रहे हैं और समाज में कोई बोलने वाला नहीं है. इसलिए मुस्लिम पर्सनल लॉ की समीक्षा ज़रूरी है और एक नया क़ानून भी ज़रूरी है जो औरतों को बराबरी दे."

प्रधानमंत्री को भेजे गए ज्ञापन में प्रमुख मांगे
  • मेहर शहर की एक साल की आय के बराबर हो
  • मौखिक तलाक़ को अवैध घोषित किया जाए
  • तलाक़ से पहले सुलह की कोशिश के लिए 90 दिनों की मोहलत
  • पत्नी नौकरी करने वाली ही क्यों ना हो, तलाक़ की सूरत में उसे गुज़ारा भत्ता देने की ज़िम्मेदारी पति की होनी चाहिए
  • एक पत्नी के रहते दूसरा विवाह ग़ैर क़ानूनी घोषित किया जाना चाहिए
  • माँ और पिता को बच्चों पर बराबर का अधिकार
  • हलाला और मुत्ता शादियां अवैध घोषित की जाएँ
  • संपत्ति में बेटियों को बराबरी का हक़
  • तलाक़ और दुसरे निकाह में ग़लत फतवों और फ़ैसलों के लिए क़ाज़ियों को भी दोषी ठहराया जाए.
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सिर्फ महिला संगठन ही नहीं बल्कि समाज के बुद्धिजीवियों का भी कहना है कि यह कहना ग़लत होगा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ की समीक्षा का मतलब यह नहीं है कि शादी-ब्याह की रस्मों और तरीक़ों को बदल दिया जाए.

महिलओं को गुज़ारा भत्ता, उनकी सामजिक सुरक्षा और उनका संपत्ति पर अधिकार और उत्तराधिकार महत्वपूर्ण हैं.

सेवानिवृत प्रोफेस्सर इम्तियाज़ अहमद कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि यूनिफार्म सिविल कोड अगर लागू होता है तो सिर्फ इसका विरोध मुसलामानों के बीच होगा.

वो मानते हैं कि सभी समाजों में इसका विरोध होगा क्योंकि संपत्ति और उत्तराधिकार बड़े संवेदनशील मामले हैं.

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सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी कहती हैं कि भाजपा और संघ के लोग जिस यूनिफॉर्म सिविल कोड की वकालत कर रहे हैं उसके बारे में ऐसी धारणा है कि वो हिंदू कोड बिल को सब पर थोपना चाहते हैं.

और यही विरोध का कारण भी है.

वो कहती हैं, "सरकार को चाहिए कि वो कोड के पचड़ों में ना पड़कर अलग अलग क़ानून लाए जैसे घरेलु हिंसा और दहेज़ प्रताड़ना के क़ानून बने हैं ताकि सभी महिलाएं इन क़ानूनों के तहत इंसाफ के लिए अदालत जा सकें."

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वहीं 'आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड' की अस्मां ज़हरा का कहना है कि मौजूदा क़ानून में बदलाव की कोई ज़रुरत नहीं हैं क्योंकि मुसलामानों में शादी जन्म-जन्मांतर का बंधन नहीं बल्कि पति-पत्नी के बीच एक तरह का समझौता है. वो कहती हैं कि मुसलामानों में मर्द, औरत का पालनहार नहीं हो सकता.

अस्मां ज़हरा कहती हैं, "देश में कई ऐसे क़ानून बनाए गए हैं जो महिलाओं की सामजिक सुरक्षा के लिए हैं. इसलिए मुस्लिम पर्सनल लॉ में कोई तब्दीली नहीं की जानी चाहिए."

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