'गुजरात का हिंदू होते हुए गर्व हो रहा है'

  • 17 जून 2016
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अहमदाबाद की विशेष अदालत ने साल 2002 में हुए गुलबर्ग हत्याकांड मामले में शुक्रवार को 11 लोगों को उम्रक़ैद, 12 को सात साल की जेल की सज़ा सुनाई है.

विशेष अदालत में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत दयाल के मुताबिक़ एक दोषी को 10 साल की क़ैद की सज़ा सुनाई गई है.

अदालत के इस फ़ैसले पर लोग सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं. ट्विटर पर 'गुलबर्ग वर्डिक्ट' ट्रेंड कर रहा है.

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2002 में हुए इस दंगों में मारे गए कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान ज़ाफरी की पत्नी ज़ाकिया जाफरी ने कहा, "मैं संतुष्ट नहीं, मैं ख़ुश नहीं हूं. मुझे अपने वकीलों से सलाह लेनी होगी, यह न्याय नहीं."

उन्होंने कहा, "अदालत को सभी दोषियों को उम्रकैद की सजा देनी चाहिए थी. यह केस मेरे लिए आज ख़त्म नहीं हुआ है. हम अभी भी वही हैं, जहां से हमने शुरुआत की थी."

वकील तीस्ता सीतलवाड़ का कहना है, "हम बदला लेने वाला फ़ैसला नहीं चाहते, बल्कि सुधार चाहते हैं.".

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कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने लिखा है, "याक़ूब और गुलबर्ग हत्याकांड के लिए कड़ी सज़ा की मांग की थी. सामूहिक रूप से हत्या करने वालों को नहीं बख़्शा जाना चाहिए."

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ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने ट्विटर पर लिखा है, "अगर नागरिक संगठनों के इतिहास में गुलबर्ग हत्याकांड सबसे काला अध्याय था, तो इस मामले में दोषी को सज़ा-ए-मौत दी जानी चाहिए, उम्रक़ैद या 10 साल की सज़ा काफी नहीं है."

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने लिखा, "बड़े दोषियों को छोड़ना नहीं चाहिए. इस पर अपील की जानी चाहिए और साजिश के आरोप भी लगाए जाने चाहिए."

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आशीष त्रिवेदी ने तंज कसा है, "कमाल है. मैं बलात्कार, आगज़नी, हत्या कर सकता हूं और मुझे केवल 7 साल की सज़ा मिलेगी... वो भी 14 साल बाद. गुजरात में हिंदू होते हुए मुझे गर्व महसूस हो रहा है!"

राकेश बुटकरी ने लिखा, "क्या इस देश में मौत की सज़ा केवल मुसलमानों के लिए है."

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करमवीर सिंह ब्रार ने लिखा है, "किसी को मौत की सज़ा नहीं. यह शर्म की बात है. वे चरमपंथी हैं और उन्हीं वैसी ही सज़ा मिलनी चाहिए."

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