'एहसान जाफ़री के गोली चलाने से बिगड़े हालात'

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गुलबर्ग हत्याकांड पर फ़ैसला देने वाली अहमदाबाद की विशेष अदालत का कहना है कि घटना वाले दिन पूर्व कांग्रेस सांसद एहसान जाफ़री के गोली चलाने से हालात ख़राब हुए थे.

अदालत के मुताबिक़ गोली चलाने से भीड़ बेक़ाबू हो गई जिसके बाद अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी में हत्याकांड हुआ.

28 फरवरी 2002 की इस घटना में कुल 69 लोग मारे गए थे जिनमें कांग्रेस के पूर्व एहसान जाफ़री भी शामिल थे.

अदालत ने शुक्रवार को इस मामले में 11 को उम्रक़ैद और 12 को सात-साल की जेल की सज़ा सुनाई.

कोर्ट की टिप्पणी से गुलबर्गा सोसायटी के लोग ख़ासे नाराज़ हैं.

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उनका कहना है कि अदालत के फ़ैसले से ऐसा लगता है कि जैसे एहसान जाफ़री के कारण ही ये घटना घटी.

मानवाधिकार कार्यकर्ता शमशाद पठान कहते हैं कि फ़ैसला हैरत में डालने वाला है.

शमशाद पठान ने बीबीसी से कहा, “विशेष जांच दल ने अदालत के सामने जो तथ्य रखे वे सही नहीं थे. या आधे अधूरे थे. हां, यह बात सही है कि जाफरी ने अपने बचाव में भीड़ पर गोली चलाई थी.’’

घटना के बारे में शमशाद पठान ने कहा, “सुबह नौ बजे गुलबर्ग सोसायटी के बाहर भीड़ जमा हो रही थी. पथराव हो रहा था और भीड़ ने सोसायटी का दरवाजा तोड़ कर अंदर आने की भी कोशिश की. बाहर से पेट्रोल बम फेंके गए.

उन्होंने बताया, “जाफरी ने पुलिस कमिश्नर से लेकर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी तक को फोन किया लेकिन कहीं से मदद नहीं आई. जाफरी के पास लाइसेंसी बंदूक थी और आत्मरक्षा के लिए ही थी. ऐसी स्थिति में कोई क्या करता.”

“उन्होंने अपने परिवार और सोसायटी के लोगों की जान बचाने के लिए गोली चलाई थी, अगर वक्त पर पुलिस की मदद मिलती तो वो गोली नहीं चलाते.’’

2002 से ही गुलबर्ग सोसायटी की जांच और अदालती कार्यवाही पर नज़र रखने वाले अहमदाबाद के वरिष्ठ पत्रकार सईद ख़ान ने भी बताया कि अदालत ने माना है कि एहसान जाफरी ने गोली चलाई जिस कारण स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई.

पठान ने बताया कि ऐसी ही घटना 2002 में अहमदाबाद के पालड़ी इलाक़े में भी घटी थी.

वहां की ग़ुस्साई भीड़ को अपने घर में घुसने से रोकने के लिए डॉ. युनूस भावनगरी के खिलाफ़ भी हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज किया था. हालांकि गुजरात हाईकोर्ट ने मुकदमा रद्द कर भावनगरी के प्रयास को आत्मरक्षा माना.

उधर जांच दल के अधीक्षक हिमांशु शुक्ल ने इस बारे में पूछने पर बीबीसी से कहा, “हमारे पास अदालत के फैसले की कॉपी नहीं आई है. कॉपी मिलने के बाद ही तय किया जाएगा कि इसके खिलाफ़ हाईकोर्ट में अपील करना है या नहीं.”

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