पढ़ाई का गोल्ड मेडल 81 साल की उम्र में

  • 25 जून 2016
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Image caption अजीत सिंह सिंघवी को 47 साल के लम्बे इंतजार के बाद 'गोल्ड मेडल' मिला.

अजीत सिंह सिंघवी को वर्ष 1969 में राजस्थान विश्वविद्यालय से एलएलबी में टॉप करने के लिए 'स्वर्ण पदक' दिया गया है.

हालांकि 47 साल पहले आए रिजल्ट में किसी और को टॉप बताया गया था. सिंघवी ने इसे गलत बताते हुए इसके ख़िलाफ़ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी.

81 साल की उम्र और 47 साल का लंबा इंतज़ार.

“एक ज़िंदगी में 47 साल का अरसा काफ़ी लम्बा होता है. यदि मुझे ये स्वर्ण पदक पहले मिला होता तो अपने पूरे सेवाकाल में मुझे इसका कुछ लाभ मिला होता. इससे बड़ी बात डूंगर कॉलेज, बीकानेर जहाँ से मैं पढ़ा, वह गौरव के उन क्षणों से वंचित रहा."

"अब देखा जाए तो यह 'स्वर्ण पदक' मेरे लिए किसी काम का नहीं है सिवाय इसके कि मेरे पोते–पोतियों को अच्छा महसूस हो.”

वे बीते गुरुवार को जयपुर आए थे. वहां राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति जेपी सिंघल ने उन्हें गोल्ड मेडल और प्रमाण पत्र भेंट किया.

'स्वर्ण पदक' पाने के लिए दायर मुकदमे के दौरान उन्हें 300 से ज़्यादा बार पेशी पर जाना पड़ा. भागा-दौड़ी, परेशानी, पैसा ख़र्च होना, सो अलग.

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Image caption कुलपति जेपी सिंघल ने उऩ्हें गोल्ड मेडल और प्रमाण पत्र भेंट किया.

रिटायर्ड आईएएस अजीत सिंह सिंघवी ने 1969 में बीकानेर के डूंगर कॉलेज से एलएलबी पास की थी. उनके पूरे विश्वविद्यालय में अधिकतम अंक थे पर उन्हें मेरिट में दूसरे स्थान पर रखा गया.

एक नए फ़ार्मूले के तहत यूनिवर्सिटी लॉ कॉलेज जयपुर के छात्रों की मेरिट सिर्फ फ़ाइनल ईयर के अंकों के आधार पर बनाई गई.

सिंघवी ने रिजल्ट को राजस्थान की अदालत में चुनौती दी. उन्होंने दावा किया कि मेरिट दोनों सालों के 14 पर्चों के अंकों के आधार पर बननी चाहिए थी.

राजस्थान विश्वविद्यालय ने 1975 में आए निचली अदालत के निर्णय के बाद स्वीकार कर लिया था कि सिंघवी टॉपर हैं.

लेकिन 1969 में टॉपर घोषित किए गए सवाई सिंह एवं अन्य ने उनके दायर मुकद्दमे पर नाराज़गी जताते हुए अदालत में चुनौती दी थी.

हालांकि बाद में 2003 में राजस्थान हाई कोर्ट के सिंघवी के हक़ में फैसले के बाद सवाई सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में कोई अपील नहीं की.

राजस्थान विश्वविद्यालय के वकील अशोक मारू ने बीबीसी को बताया कि "90 दिन के भीतर सवाई सिंह अथवा और किसी ने इस निर्णय के खिलाफ कोई विशेष अनुमति याचिका पेश नहीं की. इससे जाहिर है कि उन्होंने अदालत के निर्णय को स्वीकार किया है. इसलिए विश्वविद्यालय की ओर से कोई नई मेरिट लिस्ट घोषित करने की ज़रूरत नहीं है."

सिंघवी को न्याय के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा. लेकिन उसके बाद राजस्थान विश्वविद्यालय ने भी उन्हें 'स्वर्ण पदक' देने में 12 साल और लगा दिए. कुलपति सिंघल ने इस देरी को मात्र "प्रक्रिया का विलम्ब" करार दिया.

सिंघवी को मलाल है कि डूंगर कॉलेज के इतिहास में पहली बार था कि किसी छात्र ने 'स्वर्ण पदक' हासिल किया था पर उनके संस्थान को इस ख़ुशी और गर्व से वंचित रहना पड़ा.

यदि 47 साल बाद गुरुवार को जब कुलपति कक्ष में उन्हें यह सम्मान मिला तो उनकी इस ख़ुशी में शरीक़ होने के लिए उनके कॉलेज के ज़माने के कोई पुराने संगी साथी नहीं थे.

उनके प्रशासनिक जीवन के मित्र त्रिलोचन सिंह ही जयपुर में होने की वजह से पहुँच पाए.

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Image caption मित्र और सहयोगी त्रिलोचन सिंह के साथ

सिंघवी एक किताब लिखने जा रहे हैं और उनका कहना है कि इसकी शुरुआत ही वे अदालत में देरी और व्यवस्था की खामियों से करेंगे. जजों की कमी देरी का मात्र एक पहलू है. उनके मामले में एक नोटिस को तामील करवाने में 12 साल लगे.

फिर भी वे इस 'पदक' को पाकर ख़ुश हैं. वो कहते हैं आपको मेरे धैर्य की तो तारीफ़ करनी ही पड़ेगी.

उनकी पोती कहती हैं, “दद्दू में दम है.”

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