सपा मुख़्तार अंसारी की पार्टी नहीं होगी साथ

  • 25 जून 2016
इमेज कॉपीरइट harshjoshi

समाजवादी पार्टी के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता मुख़्तार अंसारी की पार्टी क़ौमी एकता दल का गठबंधन आख़िरकार नहीं हो सका.

समाजवादी पार्टी के संसदीय बोर्ड ने इस प्रस्ताव को नामंज़ूर कर दिया.

बताया जा रहा है कि इसे लेकर पार्टी के अंदर ज़बर्दस्त विरोध था और ख़ुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पार्टी के इस फ़ैसले से नाखुश थे.

चार दिन पहले ही पार्टी के कद्दावर नेता, कैबिनेट मंत्री और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल सिंह ने उत्साह और उम्मीद के साथ क़ौमी एकता दल के सपा में विलय की घोषणा की थी.

शिवपाल ने ये कहकर इस गठबंधन की वकालत की थी कि इससे सपा को मज़बूती मिलेगी.

लेकिन इस फ़ैसले से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बेहद ख़फ़ा थे और उन्होंने अपने ग़ुस्से का इज़हार पार्टी के वरिष्ठ और सम्मानित नेता बलराम सिंह यादव को मंत्रिमंडल से बाहर करके किया.

इमेज कॉपीरइट PTI

दरअसल बताया गया कि इस विलय और मेल मिलाप के पीछे बलराम सिंह यादव ही सूत्रधार थे. लेकिन जब संसदीय बोर्ड में इस विलय को नामंज़ूर कर दिया गया तो बलराम सिंह यादव की मंत्री पद की बहाली भी हो गई.

संसदीय बोर्ड की बैठक के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव ने फ़ैसले की जानकारी देते हुए कहा कि अब अखिलेश के नेतृत्व में पार्टी रथयात्रा निकालेगी. उन्होंने बताया कि पार्टी के पुनर्गठन की ज़िम्मेदारी सपा मुखिया मुलायम सिंह को सौंपी गई है.

क़ौमी एकता दल के सपा में विलय की घोषणा के वक्त हालांकि शिवपाल ने भी कहा था कि मुख्तार अंसारी पार्टी में शामिल नहीं हुए हैं लेकिन मुख्तार की पार्टी के सपा में विलय को लेकर सीएम अखिलेश यादव की नाराज़गी के चर्चे काफ़ी आम थे.

यहां तक कि शनिवार सुबह उन्होंने सार्वजनिक तौर पर इसे ज़ाहिर भी किया. तभी से ये क़यास लग रहे थे कि हो सकता है कि संसदीय बोर्ड में इस विलय को मंज़ूरी न मिले.

इमेज कॉपीरइट SAMIRATMAZ MISHRA

दरअसल इस विलय का फ़ैसला शिवपाल का बताया जा रहा है और शिवपाल को इसके लिए पार्टी मुखिया मुलायम सिंह की इजाज़त थी. कुछ ऐसा ही पिछले दिनों अमर सिंह की पार्टी में वापसी को लेकर भी हुआ था और उसका भी मुलायम परिवार के कुछ अहम सदस्यों की ओर से जमकर विरोध हुआ था. लेकिन उस मुद्दे पर अखिलेश यादव सामने नहीं आए थे.

जानकारों का कहना है कि मुख्तार अंसारी को लेकर अखिलेश ने कुछ उसी अंदाज़ में विरोध दर्ज कराया जैसा की पिछले विधान सभा चुनाव से पहले उन्होंने डीपी यादव को पार्टी में शामिल करने पर किया था.

जानकारों का ये भी कहना है कि संगठन को दुरुस्त करने की ज़िम्मेदारी पार्टी ने भले ही वरिष्ठ नेताओं को सौंप दी है लेकिन चुनाव वो अखिलेश यादव को ही आगे करके लड़ेगी. यही नहीं, शनिवार को हुए संसदीय बोर्ड के फ़ैसले से यह भी साफ़ हो गया है कि चुनावी रणनीति के तहत अहम फ़ैसले बिना अखिलेश की अनुमति के शायद ही हों.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार