बिहार के लोक देवताओं के बारे में आप कितना जानते हैं?

  • 27 जून 2016
डीहवार बाबा, सदरपुर, बड़हड़िया, सिवान. इमेज कॉपीरइट Pradeep Kant Chaudhary
Image caption डीहवार बाबा, सदरपुर, बड़हड़िया, सिवान.

बिहार के गांवों और क़स्बों में स्थानीय देवी-देवता होते हैं जिन्हें लोक देवी-देवता भी कहते हैं.

इन देवी-देवताओं में स्थानीय लोगों की अटूट आस्था होती है.

गांव के लोग कोई भी अच्छा काम करने से पहले इन देवताओं की अनुमति और आशीर्वाद लेना ज़रूरी मानते हैं.

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Image caption डीहवार-डिहवारिनी, भोर के नजदीक, गोपालगंज

इन्हीं देवताओं में से एक बरहम बाबा या डीहवार बाबा उत्तरी बिहार के लोक धर्म के सर्वाधिक प्रखर प्रतीक हैं.

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Image caption बरहम स्थान, श्रीपुर, श्रीपुर गाहर, खानपुर, समस्तीपुर.

इनका स्थान गांव के सार्वजनिक धार्मिक क्रियाकलापों का केंद्र होता है.

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Image caption डीहवार-डीहवारिनी, बलइआ, दारौली, सिवान.

नियमानुसार पीपल के पेड़ के रूप में गाँव के बाहर पश्चिम में बरहम स्थान होना चाहिए, लेकिन गांव के विस्तार होने पर एक से अधिक बरहमस्थान अलग-अलग दिशाओं में बन जाते हैं.

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Image caption बरहम स्थान, फतेहपुर, दरियापुर, सारण

बरहम को गांव का मुख्य संरक्षक माना जाता है. बरहम के बारे में यह भी माना जाता है कि ये गांव के आसपास भटकने वाली आत्माओं, भूत-पिशाचों को अपने नियंत्रण में रखते हैं.

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Image caption बरहम स्थान, लोहाना, झंझारपुर, मधुबनी.

दूसरी संस्थाओं की तरह इनका भी ब्राह्मणीकरण हुआ है. वर्तमान में माना जाता है की यदि कोइ ब्राह्मण बालक यज्ञोपवित के बाद और विवाह से पहले किसी दुर्घटना के कारण मर जाता है तो वही गांव का बरहम बन जाता है.

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Image caption बरहम स्थान, पाकौली, महानार, वैशाली.

लेकिन इसकी मूल अवधारणा अवैदिक और जनजातीय लगती है. ग्राम-स्थापना और वास्तुपूजा के जनजातीय कर्मकांडों में इसके सूत्र खोजे जा सकते हैं.

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Image caption बरहम बाबा, लालगंज, वैशाली.

इसलिए यहां संस्कृत शब्द निराकार ब्रह्म के बजाए बरहम शब्द का उपयोग किया जा रहा है, जो आम लोग बोलते हैं.

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Image caption बरहम स्थान, लोहाना, झंझारपुर, मधुबनी.

बरहम बाबा को लोग मिट्टी के बने घोड़कलश, धोती, जनेऊ, मिठाई, पान, फूल आदि चढाते हैं. मिथिला में पशुबलि भी इन्हें दी जाती है.

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Image caption बरहम बाबा, मुसारी घरारी, समस्तीपुर.

घर में विवाह और अन्य शुभ अवसरों पर सबसे पहले यहीं आकर प्रणाम किया जाता है.

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Image caption सिरकट्टी माई, नरकटियागंज, पश्चिमी चंपारण.

सिर और धड़ के रूप में अलग-अलग देवियों की पूजा दक्षिण भारत में रेणुका-येलम्मा संप्रदाय के रूप में काफी चर्चित है लेकिन उत्तर भारत में ऐसी लोक देवियां कम हैं.

यह ग़ौर करने की बात है कि ताम्रपाषाण काल से ही सिरकटी देवी-देवताओं के चलन होने का पता चलता है. आम तौर पर ऐसी देवियों का चलन शिकारी-भोजन संग्राहक समाज की उत्पत्ति थी.

इस रूप में इन देवियों का महत्व बहुत बढ़ जाता है. दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि चूंकि इन देवियों का कोई प्रतिमा शास्त्रीय विवरण नहीं मिलता इसलिए इनके सिर्फ नाम का महत्व है. सिरकट्टी माई की पूजा भी एक पिंडी के रूप में होती है, लेकिन नाम बहुत ख़ास है, जो हज़ारों सालों के इतिहास को अपने अंदर छुपाए हुए है.

पश्चिम चंपारण के नरकटियागंज के मथुरा गाँव में छोटे से मिट्टी के टीले पर खेत के एक किनारे बने इस देवीस्थान का महत्व इसके नाम में छिपा है.

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Image caption गढ़ी देवी, भारथुई गढ़, जीरादेई, सारण.

गढ़ी माई का संप्रदाय राजपूत और थारू समुदायों के साथ गहरे जुड़ा हुआ है. इसकी मुख्य विशेषता मिट्टी के ऊंचे टीले के ऊपर बनी पिंडी होती है.

आज से कुछ दशक पहले तक पिंडी के ऊपर कोई छत नहीं दी जाती थी मगर अब धीरे-धीरे मंदिर जैसी सरंचनाएं बनने लगी है

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Image caption गढ़ी देवी मंदिर, पाटेढ़ा, नागारा, सारण.

गढ़ी माई का स्थान पश्चिमी बिहार और नेपाल की तराई में कई जगह मौजूद है, जहां भारी मात्रा में बलि चढ़ाई जाती है. इनके टीले बलूचिस्तान में नवपाषाणकालीन झोब संप्रदाय की याद दिलाते हैं, जिसे सिन्धु सभ्यता के विकास और नगरीकरण का श्रेय दिया जाता है.

यह गंगा नदी के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में घुमंतू पशुचारी समुदायों के स्थायी बस्तियों में बसने से संबंधित भी हो सकता है.

(प्रदीप कांत चौधरी बिहार के लोक देवी-देवताओं पर शोध कर रहे हैं.)

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