'वेतन योग्यता के आधार पर बढ़ना चाहिए'

  • 30 जून 2016
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सातवें वेतन आयोग की सिफ़ारिशों को केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को मंज़ूरी दे दी. इस वेतन बढ़ोतरी के बाद केंद्र के क़रीब पचास लाख कर्मचारियों के वेतन और भत्ते में 23.6 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई है.

वेतन बढ़ोतरी का लाभ क़रीब 58 लाख पेंशन धारकों को भी मिलेगा. आयोग की सिफारिशें एक जनवरी 2016 से लागू मानी जाएँगी. इस वेतन बढ़ोतरी से सरकारी ख़जाने पर सालाना 1.02 लाख करोड़ का बोझ पड़ेगा.

वेतन बढ़ोतरी के बाद केंद्र सरकार के कर्मचारियों का कम से कम वेतन अब 7 हज़ार की बजाए 18 हज़ार होगा जबकि अधिकतम वेतन पाने वाले कैबिनेट सचिव को 90 लाख की बजाए ढाई लाख रुपए का वेतन मिलेगा.

पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम का कहना है कि वेतन आयोग की सिफारिशें हर 10 साल में आती हैं, ये एक रूटीन प्रक्रिया है. लेकिन जिस तरह से अच्छे-बुरे सभी कर्मचारियों को एक ही पैमाने से वेतन में बढ़ोतरी मिल जाती है वो ठीक नहीं है.

पढ़िए टीएसआर सुब्रमण्यम का पूरा विश्लेषण:

आज़ादी के बाद ये सातवां वेतन आयोग है. पिछले वेतन आयोगों की सिफ़ारिशों पर अभी तक हर 10 साल में 20, 30 या 40 फीसदी की वेतन बढ़ोतरी होती रही है.

परंपरा रही है कि 'इंडेक्स' के आधार पर केंद्रीय कर्मचारियों को मुआवज़ा दिया जाता है.

अब सबसे कम तनख्वाह सात हज़ार से बढ़कर 18 हज़ार हो गई है.

वहीं सबसे अधिक तनख्वाह, कैबिनेट सेक्रेटरी की ढाई लाख़ हो गई है.

साल 1950 में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी जैसे चपरासी का वेतन 27 रुपए था.

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भारत में तीसरे और चतुर्थ श्रेणी के केंद्रीय कर्मचारी क़रीब 92 फीसदी हैं. पिछले 30-40 साल में इनका वेतन काफी बढ़ा है.

चपरासी, ड्राइवर, खलासी की तनख्वाह बाज़ार के स्तर पर आ गई है और कुछ मामलों में तो ये ज्यादा भी है.

ऊपर के स्तर पर यानी क्लास-ए, क्लास-बी में आईएएस और स्टेट लेवल के कर्मचारियों का वेतन आज बाज़ार के स्तर पर आ गया है.

मुख्य बात है कि सरकारी कर्मचारियों की नौकरी में सुरक्षा है, पेंशन और हेल्थ इंश्योरेंस होती है.

आम तौर पर नीचे लेवल में मार्केट से ज्यादा और ऊंचे लेवल पर मार्केट के बराबर वेतन हो गया है.

भारत में सबसे कम और सबसे ज्यादा वेतन के बीच 10 से 12 गुना का ही फर्क है. एक ज़माने में सबसे ऊंचे और नीचे लेवल में बहुत ज़्यादा फर्क होता था.

ऊंचे लेवल में कई लोग बहुत मेहनती हैं, काफी दिमाग का इस्तेमाल करते हैं.

सबसे ऊंचे यानी सेक्रेटरी लेवल पर प्राइवेट सेक्टर के मुकाबले 10 से 15 गुना ज्यादा ज़िम्मेदारी होती है.

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लेकिन तनख्वाह उस स्तर पर नहीं मिलती है. वेतन, परफॉर्मेंस के आधार पर नहीं है.

इसमें ज्यादा कुछ बदलाव नहीं किया जा सकता है.

लेकिन इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि कर्मचारियों का परफॉर्मेंंस कैसा है और उसी आधार पर वेतन में बढ़ोतरी होनी चाहिए. दरअसल इस 'पे पॉ़लिसी' में कोई बदलाव नहीं हुआ है.

समय आ गया है कि अब परफॉर्मेंस के आधार पर तनख्वाह होनी चाहिए.

राज्य स्तर पर ऊंचे लेवल पर सचिव स्तर के कर्मचारियों की तादाद बहुत ज़्यादा है लेकिन उनके पास उतना काम नहीं है.

लेकिन साथ ही 10 से 15 फीसदी लोगों के पास काम का बहुत बोझ है. हर स्तर पर ये फर्क करना ज़रूरी है.

पुलिस फोर्स में योग्य पुलिस वाले हों, योग्य लोगों को इनाम दिया जाए.

दक्षता, योग्यता और प्रदर्शन के आधार पर कर्मचारियों की तनख्वाह होनी चाहिए.

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बढ़े वेतन की वजह से सरकार को 1 लाख़ करोड़ सालाना खर्च करना पड़ेगा. हर 10 साल में ऐसी स्थिति आती है.

एक तरफ़ केंद्रीय कर्मचारियों को इससे लाभ होगा, लेकिन इससे महँगाई भी बढ़ेगी.

सरकार को चाहिए कि एरियर का भुगतान दो-तीन साल में करे ताकि कर्मचारियों के हाथ में एक साथ ज्यादा पैसे ना आएं.

सरकारी कर्मचारियों का वेतन बढ़ने से उनकी खर्च करने की ताकत बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिलेगा ये बात कुछ हद तक सही है.

लेकिन अर्थव्यवस्था की जो असल ताकत चाहिए वो ऐसे उपायों से नहीं आएगी.

लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा देकर, उनकी खरीदने की क्षमता बढ़ाकर अर्थव्यवस्था का भला नहीं किया जा सकता है. इससे लंबे समय में अर्थव्यस्था को कोई फ़ायदा नहीं होगा.

(बीबीसी संवाददाता अमरेश द्विवेदी से बातचीत पर आधारित)

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