अब बाज़ार में आया 'दलित फूड्स'

  • 1 जुलाई 2016

दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने ‘दलित फूड्स’ के नाम से खाद्य उत्पादों की एक सिरीज़ शुरू की है. इस सिरीज़ के तहत आम का आचार, हल्दी पाउडर, धनिया पाउडर, मिर्च पाउडर जैसे उत्पाद ऑन लाइन बिक्री के लिए उपलब्ध हैं.

चंद्रभान के मुताबिक फिलहाल उनके उत्पाद ई-कॉमर्स के लिए उपलब्ध हैं. इसके लिए उन्होंने दलित फूड्स डॉट कॉम और दलितशॉप डॉटकॉम नाम से दो वेबसाइट शुरू की हैं.

इसकी शुरुआत कैसे हुई, इस बारे में बीबीसी से बातचीत में चंद्रभान प्रसाद ने कहा, “अमरीकी यूनिवर्सिटी के एक शोध अध्ययन के दौरान मुझे 2008 में दलितों की बस्ती में रहने का मौका मिला. जहां 90 साल और उससे भी ज़्यादा उम्र के दलित मिले. ये अचरज भरा था क्योंकि दलितों की औसत उम्र आम भारतीयों से कम होती है. फिर मैंने उन लोगों से बातचीत की. उनके खान-पान के बारे में जानने की कोशिश की.”

दलितों के खान-पान के बारे में चंद्रभान प्रसाद बताते हैं, “दरअसल दलितों का समाज गांव से बाहर होता था. उनके पास साधन नहीं थे, ऐसे में उन लोगों के 90-100 साल तक जीवित होने पर अचरज ही था. लेकिन वे लोग बताते थे कि बाजरे की रोटी खाते थे, ज्वार खाते थे. जब गेहूं की रोटी पहली बार उन लोगों ने खाई तो उनका पेट ख़राब हो गया.”

ऐसे लोगों से बातचीत के करीब आठ साल बाद चंद्रभान प्रसाद ने पांच लाख रूपये के निवेश के साथ दलित फूड्स नामक ब्राण्ड की शुरुआत की है.

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लेकिन इन उत्पादों को भारतीय बाज़ार में बेचना, वो भी दलित नाम के ठप्पे के साथ कितना कारगर होगा?

इस पर चंद्रभान प्रसाद कहते हैं, “जो आजकल हेल्दी डायट है, वो एक-दो पीढ़ी पहले तक दलितों का मुख्य भोजन हुआ करता था. आज डायबिटीज़ और हृदय रोग के मरीज जो जौ और बाजरा खा रहे हैं, वही दलितों का मुख्य भोजन था.”

लेकिन क्या इसको सामाजिक मान्यता मिल पाएगी, इस बारे में चंद्रभान कहते हैं, “देखिए हमारा उद्देश्य शहर के उन लोगों तक पहुंचना है, जो दलितों का उत्थान चाहते हैं. उनके हुनर और काम को बढ़ाना चाहते हैं. ऐसे लोग समाज में हैं और वे बाज़ार में भी हैं.”

हालांकि चंद्रभान ये मानते हैं कि इससे सामाजिक बदलाव का संदेश भी फैलेगा. वे कहते हैं, "जब दलितों के बनाए उत्पाद का इस्तेमाल सवर्ण करेंगे तो सोचिए ये कितना बड़ा बदलाव होगा. हमने अपने जीवन में अलग पांत में बैठकर खाना खाया है, सवर्ण हमारा बर्तन तक नहीं छूते थे. ऐसे में हमारे बनाए उत्पाद का वे इस्तेमाल करेंगे, तो यह आज़ादी मिलने जैसा ही सुख होगा."

चंद्रभान प्रसाद के भरोसे की वजहें भी हैं. उनकी इस कोशिश को सीआईआई यानि भारतीय उद्योग परिसंघ (कंफेडरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्रीज़) का साथ मिला है.

चंद्रभान प्रसाद के दलित फूड्स साइट पर वही उत्पाद मिलेंगे जो उनके यूनिट में तैयार हो रहे हैं. वहीं दलित शॉप में कोई भी दूसरा दलित अपना उत्पाद बेच सकता है. यानि एक तरह से दलितों को ई-कॉमर्स की दुनिया में एक तरह का मंच मिलेगा.

अपने उत्पादों के बारे में चंद्रभान प्रसाद बताते हैं, “हमने ख़ास हल्दी का इस्तेमाल किया है, जो महाराष्ट्र के सूखे से प्रभावित इलाके वर्धा के दलित किसान के खेत में पैदा हुई है. धनिया बुंदेलखंड से मंगाया है. लाल मिर्च हम राजस्थान के माथानिया से मंगा रहे हैं.”

लेकिन इस तरह के उत्पाद तो योगगुरु बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर भी बना रहे हैं. उनसे चंद्रभान प्रसाद के उत्पाद कितने अलग होंगे.

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इस बारे में पूछे जाने पर चंद्रभान कहते हैं, “इन लोगों का बड़ा कारोबार है. बाबा रामदेव की छवि ऐसी है कि वे गोबर की आइसक्रीम भी बेचेंगे तो वो बिक जाएगी. मेरी कोशिश बहुत छोटी है और उत्पाद भी कम ही होंगे.”

अपने उत्पादों की तारीफ़ में चंद्रभान प्रसाद कहते हैं, “हमने जो आचार बनाया है उसमें एसिड का कोई इस्तेमाल नहीं किया है. हमने उन लोगों का ध्यान रखा है जो केवल मोटी रोटी और आचार के साथ खाना खाते हैं.”

चंद्रभान प्रसाद की छवि दलित चिंतक की रही है. साथ ही वे दलितों को कारोबार की दुनिया से जोड़ने की मुहिम भी चलाते रहे हैं. फ़िक्की की तर्ज पर दलितों के चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के गठन में भी उनकी अहम भूमिका रही है.

बहरहाल चंद्रभान दावा करते हैं, "दलित फूड्स खाने वाले सौ साल तक स्वस्थ रह पाएंगे."

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लेकिन उनकी इस मुहिम में केवल दलित ही शामिल होंगे, इस सवाल के जवाब में उनका कहना है, “हमारी मुहिम से गैर दलित भी जुड़ सकते हैं, हम उनका स्वागत करेंगे. अभियान के शुरुआती दौर में ही एक सवर्ण साझेदार हमसे जुड़े हुए हैं.”

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