रोज़ा रखने वाले हिंदू, ईसाई और नास्तिक

  • 3 जुलाई 2016
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गंगा-जमुनी तहज़ीब उत्तर भारत की अनोखी पहचान है. इस तहजीब की एक ख़ासियत यह भी है कि भारत के लोग अलग-अलग मज़हबों का सम्मान करते हैं.

एक-दूसरे के त्यौहारों में शामिल होते हैं.

अभी मुसलमानों का पाक महीना रमज़ान चल रहा है जिसमें रोज़ा रखा जाता है. आम तौर पर रोज़े का जिक्र आने पर किसी मुस्लिम शख्स की छवि ज़हन में उभरती है.

लेकिन रोज़ा रखने वालों में गैर-मुस्लिम भी हैं. मिलिए रोज़ा रखने वाले ऐसे ही कुछ गैर-मुसलमान लोगों से. इनमें से एक शख्स ख़ुद के नास्तिक होने का दावा भी करता हैं.

अमरेंद्र बागी-

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पटना के अमरेंद्र बागी बीस वर्षों से रमज़ान के महीने में रोज़ा रखते आ रहे हैं. वकील और भाजपा नेता अमरेंद्र पहले नास्तिक थे. लेकिन हालात कुछ ऐसे बने कि अपने बीमार छोटे भाई समरेंद्र कुमार के इलाज के सिलसिले में उन्हें नब्बे के दशक में एक सूफी-संत के पास जाना पड़ा.

बिहार के दरभंगा ज़िले के इस सूफी-संत के दरबार में जाने के बाद वे सभी धर्मों के त्यौहारों में शामिल होने लगे. रोज़ा रखना भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है. बिहार के सीमामढ़ी में रहने वाले समरेंद्र भी अपने भाई की तरह ही रोज़ा रखते हैं.

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जेपी आंदोलन से जुड़े रहे बागी बताते हैं, "‘समाज में सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के मकसद से मैं रोज़ा रखता हूं. हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई अगर मिलकर एक दूसरे के त्यौहार मनाएं तो आपस में किसी तरह का मतभेद नहीं हो सकता."

प्रभात जोसेफ ठाकुर-

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Image caption प्रभात जोसेफ ठाकुर

पेशे से रियल स्टेट कारोबारी और मूल रूप से बिहार के बेतिया के रहने वाले प्रभात जोसेफ ठाकुर ईसाई हैं. ठाकुर पश्चिम बंगाल के आसनसोल में रहते हैं.

प्रभात कहते हैं, "मेरे मुस्लिम दोस्तों ने बताया कि रोज़ा रखने से शांति मिलती है, मन में अच्छे विचार आते हैं और शरीर भी तंदुरुस्त रहता है. दोस्तों से प्रेरित होकर मैंने भी रोज़ा रखना शुरु किया."

प्रभात का रोज़ा रखने का अपना तरीका है. वे सहरी और इफ्तार के समय बाइबिल पढ़ते हैं.

मेघनाथ-

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सामाजिक कार्यकर्ता और डाक्युमेंट्री के लिए नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीत चुके मेघनाथ खुद को नास्तिक बताते हैं, लेकिन रोज़ा रखते हैं.

1989 के रमज़ान के महीने में वे जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में एक फिल्म का संपादन कर रहे थे. तब शाम के वक्त उनके आस-पास कई लोग इफ्तार करने के लिए बैठते थे.

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Image caption मेघनाथ के घर पर इफ्तार में लोग

रांची में रहने वाले मेघनाथ बताते हैं, "पिताजी बचपन में सिखाते थे कि हज जाने के पहले सारा उधार उतारना पड़ता है, दिल से दुश्मनी साफ करनी पड़ती थी. इस तरह इस्लाम के बारे में जो थोड़ा-बहुत मैंने सीखा था उसे जामिया मिलिया में और विस्तार मिला. और फिर इस्लाम को समझने की कोशिश में मैं रोज़ा रखने लगा."

प्रोफ़ेसर सच्चिदानंद सिंह साथी-

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Image caption प्रोफ़ेसर सच्चिदानंद सिंह साथी

पटना यूनिवर्सिटी के 83 साल के रिटायर्ड प्रोफेसर सच्चिदानंद सिंह साथी 1985 से रोज़ा रख रहे हैं. वे सिर्फ एक दिन रमज़ान के अंतिम जुमे को रोज़ा रखते हैं.

पटना के बीएनआर रोड निवासी प्रोफ़ेसर सच्चिदानंद रोज़ा रखने की शुरुआत के बारे में बताते हैं, "मुझे एक मित्र ने 1984 में कुरान भेंट की. इसके बाद एक मित्र हज कर लौटे तो वहां से मेरे लिए टोपी लेते आए. इसके बाद मेरे मन में रोज़ा रखने का भाव जगा. मैं रोज़ा रख रहा हूं और लोग भी मुझे प्रोत्साहित करते हैं."

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