'बिना बताए डॉक्टर ने बच्चेदानी निकाल ली'

  • 5 जुलाई 2016

आठ साल पहले डॉक्टरों ने 'बिना बताए' 36 वर्षीय गीता दीवान के अंडाशय और बच्चेदानी निकाल ली. गीता आज तक सदमें में हैं.

रोहतक के कलानौर इलाक़े में बिस्तर पर लेटी गीता बताती हैं, “डॉक्टर ने कहा, छोटा सा प्रोसीजर है, जल्द ही तू भागती फिरेगी. सात जुलाई 2008 को मेरा ऑपरेशन हुआ. ऑपरेशन के बाद मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई जब मुझे पता चला कि उन्होंने बिना बताए दोनों अंडाशय और बच्चेदानी निकाल ली.”

उनके पति ने उनको छोड़ दिया. इलाज में सारी ज़मीन-जायदाद बिक गई.

पास ही उनकी 14 साल की बेटी पुराने लैपटॉप पर मां के पुराने म्यूज़िक वीडियो, तस्वीरें देख रही थी. तस्वीरों में गीता गुरुदास मान, हंसराज हंस के साथ नज़र आ रही थीं.

वो ज़माना था जब गीता दिन के दो लाख तक कमा लेती थीं. एक दिन वो ‘लेडीज़ प्राब्लम’ के इलाज के लिए लुधियाना के डॉक्टर अमित सोफ़ट और डॉक्टर रमा सोफ़ट के क्लीनिक पहुंचीं जहां ये घटना हुई.

जांच के लिए बने डॉक्टरों के एक बोर्ड ने डॉक्टर रमा के रजिस्ट्रेशन रद्द करने की सिफ़ारिश करते हुए कहा, “ऐसा लगता है कि डॉक्टरों ने मेडिकल कारणों के अलावा दूसरे कारणों के लिए ये कार्यवाही की है.”

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बीबीसी से बातचीत में डॉक्टर अमित सोफ़ट ने चिकित्सीय लापरवाही से इनकार किया और गीता दीवान पर पैसे की मांग का आरोप लगाया. डॉक्टर अमित का दावा था उनके पास गीता का हस्ताक्षर किया सहमति पत्र है. उन्होंने इस संबंध में दस्तावेज़ ईमेल करने का वादा भी किया लेकिन वो दस्तावेज़ हमें नहीं मिले.

वर्ष 2013 के एक शोध के मुताबिक़ दुनिया में हर साल करीब 4.3 करोड़ लोग असुरक्षित चिकित्सकीय देखरेख के कारण दुर्घटना का शिकार होते हैं. रिपोर्ट में पहली बार ये पता लगाने की कोशिश की गई थी कि चिकित्सीय भूल के कारण हुई दुर्घटना में कितने साल की मानवीय ज़िंदगी का नुकसान होता है.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बातचीत में रिपोर्ट के लेखक आशीष झा ने बताया कि भारत में हर साल क़रीब 30 लाख साल की स्वस्थ ज़िंदगी मेडिकल चूक का शिकार होती है हालांकि जानकारी के अभाव में ये बात पुख्ता तौर पर नहीं कही जा सकती.

1998 में सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टर की लापरवाही मामले में कोलकाता के एक अस्पताल को आदेश दिया था कि वो कुनाल साहा को एक मिलियन डॉलर्स का जुर्माना अदा करें. कुनाल की पत्नी अनुराधा की मृत्यु गुर्द की ख़राबी के कारण हुई थी. भारत में किसी अस्पताल के खिलाफ़ ये सबसे बड़ा जुर्माना है, लेकिन अभी भी शिकायतें कई हैं.

स्वास्थ्य मामलों पर काम करने वाले प्रवीन डांग के मुताबिक़ हालांकि डॉक्टरों के खिलाफ़ शिकायतों पर कार्रवाई के लिए नियामक संस्था है, "डॉक्टर दूसरे डॉक्टरों पर कार्रवाई नहीं करना चाहते."

प्रवीन डांग कहते हैं, "जब मैंने पहली बार एक डॉक्टर की शिकायत के लिए मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया को पत्र भेजा था तो उसका 15 दिनों में जवाब आ गया था. आज उस बात को तीन साल हो गए हैं. आज तक राज्य काउंसिल जांच पूरी नहीं कर पाई है."

भारत में सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं खस्ताहाल होने के कारण निजी अस्पतालों का 80 प्रतिशत बाज़ार पर कब्ज़ा है. आरोप लग रहे हैं कि कानूनों के कमज़ोर क्रियान्वयन के कारण निजी अस्पतालों के जवाबदेही की भारी कमी है.

डॉक्टर अरुण गदरे और डॉक्टर अभय शुक्ला ने अपनी किताब ‘डिसेंटिंग डायग्नोसिस’ में निजी अस्पतालों के भ्रष्टाचार का ज़िक्र किया है.

निजी अस्पतालों में पैसे हड़पने के लिए लोगों को बीमारी के नाम पर डराया जाता है, उन्हें वो टेस्ट करने को कहा जाता है या फिर उन पर वो सर्जरी और ऑपरेशन किए जाते हैं जिसकी कोई ज़रूरत नहीं होती. साथ ही उन्होंने डॉक्टरी पेशे में कमीशन के चलन की चर्चा की है, यानि डॉक्टरों की दवा कंपनियों या डायग्नोस्टिक सेंटरों के बीच कमीशन को लेकर सांठगांठ.

मार्च 2016 में अमरीका की 'प्रोपब्लिका' में छपी रिपोर्ट के अनुसार जिन डॉक्टरों को मेडिकल उद्योग से धन मिलता है वो कंपनी के ब्रैंड के पक्ष में दवाइयां लिखते हैं. जिन पांच को मेडिकल कंपनियों की ओर से सबसे ज़्यादा धन मिला, उनमें से दो भारतीय मूल के थे.

उधर डॉक्टर और वकील एमसी गुप्ता डॉक्टरी पेशे में भ्रष्टाचार का कारण महंगी पढ़ाई और सरकार के नीम-हकीम के खिलाफ़ कार्रवाई नहीं करने को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. वो कहते हैं, "भारत जहां स्वास्थ्य पर जीडीपी का मात्र 1.3 प्रतिशत खर्च होता है, वहां ऐसी हालत के लिए सरकार ज़िम्मेदार है."

इसके बावजूद दुनिया के कोने-कोने से लोग इलाज के लिए भारत पहुंच रहे हैं और कई खुश होकर वापस लौट रहे हैं.

लेकिन नाइजीरिया की चिनेये का मामला अलग है. अगस्त 2015 में एक दुर्घटना में चोटिल हुए पांव का इलाज करवाने आईं चिनेये को दिल्ली के फ़ोर्टिस में दाख़िल किया गया. अक्टूबर में उनकी मृत्यु हो गई.

चिनेये को लेकर सोशल मीडिया, ब्लॉग आदि में लिखा गया है लेकिन चिनेये के परिवार के मुताबिक़ उन्हें अस्पताल ने नहीं बताया कि चिनेये की मौत कैसे हुई. ट्विटर पर @Justice4Chineye नाम का एक हैंडल भी है.

कनाडा से बात करते हुए चिनेये की बहन एनकीरू ऑनवुगालू ने आरोप लगाया कि चिनेये की मृत्यु मेडिकल लापरवाही का मामला है. चिनेये की सर्जरी से जुड़े रहे डॉक्टर धनंजय गुप्ता ने बताया कि अटॉप्सी रिपोर्ट पुलिस के पास है और परिवार को पुलिस से बात करनी चाहिए.

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डॉक्टर गुप्ता ने अस्पताल के प्रशासनिक प्रमुख संदीप गुर्थू से बात करने को कहा लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका. मामले के जांच कर रहे सब इंस्पेक्टर संदीप कुमार ने बताया कि मौत के कारण फ़ोर्टिस के डॉक्टर बताएंगे न कि वो.

एनकीरू ऑनवुगालू बेहद नाराज़ हैं.

वो कहती हैं, “मैं किसी को भी भारत जाने की सलाह नहीं दूंगी. अस्पताल कोई जवाब नहीं दे रहा है जो निर्दयता की इंतहा है. अगर अस्पताल का दावा है कि उनके पास रिपोर्ट नहीं है और सिर्फ़ पुलिस के पास ये रिपोर्ट है, अस्पताल को मौत के कारणों का कैसे पता चलेगा? वो भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कैसे कदम उठाएंगे?”

फ़ोर्टिस का बयान: कपंनी के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट राजन ढाल ने कहा है हमें परिवार के साथ पूरी सहानभूति है हालांकि ये मामला 9 माह पहले हुआ था. हालांकि हम लगातार परिवार से, भारत में नाइजेरिया के दूतावास और लागोस में भारतीय दूतावास के संपर्क में रहे हैं और उन्हें पूरी बात से आगाह करते रहे हैं.

फोर्टिस के अनुसार सर्जरी और आपरेशन के बाद किसी भी तरह की दिक्क़त नहीं हुई थी और अगले हफ्ते मरीज़ रूटीन रिव्यू के लिए भी आए थे, जब वो ओपीडी में ही गिर गई थीं. हमने तुरंत हर संभव मेडिकल केयर उपलब्ध किया लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका.

अस्पताल ने प्रतिक्रिया में कहा है, ''इस तरह की घटनाएं बहुत ही कम होती हैं लेकिन मेडिकल इतिहास में ऐसी घटनाएं दर्ज़ हैं. प्रोटोकाल के अनुसार अधिकरियों ने एक स्वतंत्र ऑटोप्सी की वो भी सरकारी केंद्र में ताकि मृत्यु के कारणों का पता लगाया जा सके. ऑटोप्सी की रिपोर्ट सीधे और सिर्फ परिवार से अधिकारियों ने शेयर की ताकि विश्वास बना रहे. मृतक के परिजनों को उसी हिसाब से सलाह दी गई.''

वो कहते हैं, ''फोर्टिस में हम इस तरह के मुद्दों को बड़ी गंभीरता से लेते हैं और इस मामले में हमने आंतरिक समीक्षा भी की थी जाने माने कंसल्टेंट्स द्वारा जिसमें पाया गया कि हमारे डॉक्टरों ने मरीज के हित में काम किया और उनक अप्रोच एवं रिस्पांस में कहीं कोई कोताही नहीं थी.''

आरोपों की सत्यता जांच के बाद ही सामने आएगी लेकिन अस्पतालों पर मरीज़ के साथ पारदर्शिता न बरतने के आरोप पुराने हैं.

अगर आप मेडिकल लापरवाही के खिलाफ़ उपभोक्ता अदालत जाना चाहें तो आसान नहीं. कम से कम आयुर्वेद की डॉक्टर इंदु शर्मा यही कहती हैं.

वर्ष 2015 में नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रसेल कमीशन (एनसीडीआरआसी) ने शर्मा दंपत्ति को कथित डॉक्टरी चूक के लिए एक करोड़ का हर्जाना दिया.

इंदु ने दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल पर आरोप लगाया था कि वहां कथित डॉक्टरी चूक के कारण 1999 में उनके बच्ची मानसिक विकलांगता का शिकार हुई. अस्पताल ने फ़ैसले के खिलाफ़ उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी है.

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इंदु को निष्ठा के पैदा होने के डेढ़ साल बाद विकलांगता का पता चला. वो बताती हैं, “पैदा होने के बाद से ही उसे दौरे आने शुरू हो गए. सीटी स्कैन में पता चला कि उसका आधे से ज़्यादा दिमाग काम नहीं कर रहा है.” 2012 में निष्ठा की मौत हो गई.

इंदु कहती हैं, “मदद के अभाव में लोग अदालत जाने का सोच भी नहीं पाते. मैंने अपना पेशा छोड़ दिया. इस केस में मेरी पूरी ज़िंदगी बीत गई है.”

इंदु शर्मा के वकील और मेदांता अस्पताल से जुड़े मधुकर पांडे कहते हैं कि डॉक्टरी चूक को साबित करना सबसे मुश्किल है और सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए मेडिकल बोर्ड के गठन की बात कही है.

वो कहते हैं, "अलग-अलग मानवीय शरीर अलग अलग तरह से व्यवहार करता है और हर मौत पर ये समझना कि ये डॉक्टर की लापरवाही का नतीजा होगा, ग़लत है."

वकील महेंद्र कुमार बाजपेई को चिंता है कि मरीज़ और डॉक्टर के बीच विश्वास तेज़ी से घट रहा है.

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