आप भी चाय चखने की नौकरी करना चाहते हैं?

  • 5 जुलाई 2016
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बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हें भले ही खाना बनाना ना आता हो लेकिन कम से कम चाय बनाना जरूर आता होगा. चाय बनाने की बात पर लोगों की स्वभाविक प्रतिक्रिया होती है कि यह तो बहुत ही आसान है.

लेकिन भारत के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरीकों से चाय बनाई जाती है जो इसे बनाने के तरीके को लेकर कंफ्यूजन भी पैदा करता है.

मसलन गुजरात और महाराष्ट्र में चाय बनाने के लिए दूध और पानी को एक साथ उबालना होता है.

वहीं दूसरी तरफ दक्षिण भारतीय लोग पारंपरिक तरीके चाय बनाने के लिए चायपत्ती को कपड़े की एक थैली में रखकर उसके ऊपर से गर्म पानी उड़ेलते हैं.

पहली कड़ी: इन्हें कॉफ़ी पीने के मिलते हैं पैसे

यह चाय बनाने के उत्तर भारतीय तरीके से बिल्कुल जुदा है. किस राज्य या क्षेत्र में किस तरह की चाय की ज़रूरत है, ये बताना टी टेस्टर का काम है, जो चाय चखकर उसकी खूबियां बताता है.

कन्नूर में एन श्रीराम सिर्फ तीस मिनट में दौ सौ कप चाय को हर रोज़ चखकर उसकी खूबियों के बारे में बताते हैं और उनकी ग्रेडिंग करते हैं.

तमिलनाडु के कन्नूर शहर को दक्षिण भारत में चाय की राजधानी के तौर पर जाना जाता है.

आपको शायद तीस मिनट में दो सौ कप चाय सुनकर अचरज हो रहा होगा.

ग्लोबल टी ब्रोकर्स के अध्यक्ष एन श्रीराम ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मैं ये काम 38-39 सालों से हर रोज़ कर रहा हूं. मैं चाय के स्वाद से यह बता सकता हूं कि कितनी ऊंचाई पर मौजूद किस तरह के चाय के पौधे से यह चाय आई है. सालों से चाय चखने का काम करने के कारण हमारे तालू बहुत संवेदनशील हो गए हैं."

दूसरी कड़ी: द्रविड़ के डैड के कहने पर शराब चखने की नौकरी

1978 में जब नरायणस्वामी श्रीराम ने अपनी कैरियर की शुरुआत की थी तब वो अपनी मौजूदा क्षमता का सिर्फ दस फ़ीसदी चाय ही टेस्ट कर पाते थे.

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नौकरी शुरू करने के बाद हर दूसरे दिन उन्हें चाय चखकर उसे परखने को कहा जाता था.

वो उस वक्त को याद करते हुए कहते हैं, "मुझे चाय परखने वाले कमरे में ले जाया गया था और मैंने बीस कप चाय चखी और उसके बाद उल्टी करने लगा. दरअसल मैं चाय पीने लग गया था. मुझे उस वक्त पचास कप चाय चखकर परखने को दी गई थी. आपको चाय चखने के दौरान कभी भी उसे पीना नहीं चाहिए. आप थोड़ी सी चाय लेते हैं और इसे मुंह में थोड़ी देर रखकर थूक देते हैं."

ड्रीम जॉब: बीयर में पान का स्वाद दिलाने वाले

एन श्रीराम ऐसा करते हुए चाय के रंग, उसके कड़वेपन और उसके स्वाद पर ध्यान देते हैं.

वो कहते हैं, "एक टेस्टर के तौर मुझे यह पता होना चाहिए कि कौन सी चाय घरेलू बाज़ार के लिए सही है और कौन सी चाय बाहर भेजने लायक है ताकि मैं उत्पादक को बता सकूं."

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मूल रूप से तीन तरह की चाय की ग्रेडिंग की जाती है. ग्रीन टी, ऑर्थोडॉक्स टी और सीटीसी. इनमें ग्रीन टी बनाना सबसे आसान होता है.

चाय की पत्ती बागान में से तोड़ने के एक घंटे के अंदर ही इसकी नमी निकाल कर इसे सुखा लिया जाता है.

इसे इस तरह से सुखाया जाता कि इसकी नमी वाष्प के रूप में इसमें कायम रहें. इससे इसके अंदर का एंटी-ऑक्सीडेंट गुण पूरी तरह से बचा रहता है.

ऑर्थोडॉक्स टी में भी बड़े पैमाने पर एंटी-ऑक्सीडेंट पाया जाता है. इस चाय को दूध के साथ बनाया जाता है. यह नींबू के साथ भी काफी स्वादिष्ट बन सकता है.

एन श्रीराम बताते हैं कि इसे यूरोप के बाज़ार में भेजा जाता है.

सीटीसी चाय के मामले में चाय की पत्ती तोड़ने के एक घंटे के अंदर इसे सुखाने, फरमेंटेशन (किण्वन), और पैकिंग की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है.

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एन श्रीराम बताते हैं कि सीटीसी की प्रक्रिया बहुत ठोस होती है जिसकी वजह से 2.5 ग्राम चायपत्ती में ही बहुत गहरे रंग की चाय तैयार हो जाती है. इसे दूध और चीनी के साथ तैयार किया जाता है. इसकी खपत घरेलू बाज़ार में ज्यादा है.

एन श्रीराम कहते हैं कि चाय को सूखाने के बाद ही हम इसका स्वाद ले पाते हैं. हम इसे पानी में डालकर तैयार (इंफ्यूजन) करते हैं. पानी में जब इसे डाला जाता है तभी मैं बिना चखे इसे देखकर इसकी सारी खूबियां बता सकता हूं. ऑर्थोडॉक्स चाय के इंफ्यूजन में तीन से चार मिनट का समय लगता है वहीं सीटीसी के इंफ्यूजन में चार से पांच मिनट का समय लगता है."

कॉफी टेस्टर की तरह ही टी टेस्टर को भी स्मोकिंग, तंबाकू, मसालेदार खाना और शराब से दूरी बनाकर रखनी चाहिए.

इस क्षेत्र में कैरियर के विकल्प भी अच्छे मौजूद हैं हालांकि सूचना क्षेत्र में आई क्रांति से पहले हालात ज्यादा बेहतर थे

एन श्रीराम के मुताबिक़ असम चाय सबसे बेहतर है.

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