'नीतीश से पटखनी खाने के बाद समझी बीजेपी'

  • 6 जुलाई 2016
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मंगलवार को नरेंद्र मोदी ने अपने कैबिनेट का विस्तार किया जिसमें कुछ नए चेहरे शामिल किए गए तो पांच जूनियर मंत्रियों को मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया.

'टाइम्स ऑफ इंडिया' के पूर्व संपादक और वरिष्ठ पत्रकार अंबिका नंद सहाय इस पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की मुहर बता रहे हैं.

मंत्रिमंडल में हुए इस बदलाव पर पढ़िए उनकी राय:

"इस मंत्रिमंडल पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह का स्टैंप है ये बात साफ तौर पर उभर कर सामने आती है. पहले मंत्री बनने के लिए लॉबिंग होती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है.

लॉबिंग में खूब खींचतान होती थी लेकिन अब ऐसा कोई झंझट नहीं है. अब ये एक तरह का नॉमिनेशन है.

वे जिसे चाहते हैं, उसे चुनकर मंत्री बना देते हैं. उत्तर प्रदेश समेत चार और राज्यों का चुनाव होने वाला है.

भारत का समाज और उसका सामाजिक समीकरण एक राजनीतिक सच्चाई है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता.

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नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने मंत्रीमंडल के विस्तार में इसे बखूबी करने की कोशिश की है.

एक आम धारणा थी कि बीजेपी ब्राह्मण और बनियों की पार्टी है. पार्टी बनने के समय से ही पार्टी को लेकर यही धारणा रही है.

जब ब्राह्मण-बनिया समीकरण पर बीजेपी निर्भर थी तब यह बहुत छोटी पार्टी थी. लेकिन कल्याण सिंह के मामले से यह सबक मिला कि जब तक पिछड़े वोट बैंक का एक महत्वपूर्ण धड़ा टूटकर इनके पास नहीं आएगा तब तक ये जीत दर्ज नहीं कर पाएंगे.

इसीलिए इन्होंने अनुप्रिया पटेल को मंत्री बनाया है जबकि उन्हें कोई ख़ास राजनीतिक अनुभव नहीं है.

उन्हें इसलिए लिया गया क्योंकि वो कुर्मी समाज से हैं और पिछड़ों में कुर्मी समाज का अच्छा प्रभाव है और पूर्वी उत्तर प्रदेश में वो अच्छी तदाद में हैं.

बिहार में नीतीश कुमार से पटखनी खाने के बाद उन्हें यह बात समझ में आई है.

वर्ष 2007 में मायावती ने साबित किया कि यदि ब्राह्मणों को ठीक-ठाक प्रतिनिधित्व दिया जाए तो ये 'विनिंग कार्ड' हो सकता है.

मोदी-शाह को एहसास था कि अगर ब्राह्मण भाजपा से अलग हुए तो मायावती के जीत के आसार बन सकते हैं.

नजमा और कलराज, एक मुसलमान और एक ब्रह्मण को हटाने का मतलब आने वाले उत्तर प्रदेश के चुनावों के संदर्भ में समझ आता है.

इसीलिए पार्टी ने उत्तर प्रदेश चुनाव को देखते हुए यह फैसला लिया है कि अभी किसी भी बड़े और महत्वपूर्ण नेता को न हटाया जाए. जिसे बनाना है, उसे बस बनाओ."

(वरिष्ठ पत्रकार अंबिका नंद सहाय से बीबीसी संवाददाता रेहान फ़ज़ल की बातचीत पर आधारित)

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