होम शेफ़ ने बदल दिया मुंह का ज़ायका

  • 8 जुलाई 2016
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भारतीय खाने की जब भी बात आती है, आम तौर पर बटर चिकन, नान रोटी और मसालेदार सब्जी करी या मसाला डोसा का ख़्याल सबसे पहले आता है.

लेकिन दिमाग पर थोड़ा और ज़ोर दें तो पाएंगे कि भारत ऐसी धरती है जहां लोगों की तरह ही खान पान भी काफी विविधता वाला है.

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हालांकि भारतीय खुद अपने आस पास बिखरी इस विविधता से अनजान से रहते हैं. मां के हाथ का बना खाना या घर के खाने की इस क़दर आदत होती है कि वो जो बनाते और खाते हैं उसमें बहुत प्रयोग नहीं करते.

इसको लेकर स्थानीय चुटकुला भी है कि कि भारतीय विदेश यात्रा पर जाते हैं, अपने साथ अपना शेफ़ भी ले जाते हैं ताकि उन्हें विदेशी खाना न खाना पड़े.

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लेकिन ऐसा लगता है कि भारत के शहरों में कम से कम ये आदत बदल रही है.

सोशल मीडिया, ऑनलाइन डिलीवरी साइट और नए-नए प्रयोग करने को लेकर बढ़ती इच्छा के कारण घर में खाना बनाने वालों को अपने खाने को लेकर ज़्यादा विकल्प मिल रहे हैं.

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जो लोग भारत में बढ़ते स्टार्ट अप के ज़माने में मौके पाने में सफल रहे हैं और वे लोग जो घर में खाना बनाते हुए कुछ नया ट्राई करना चाहते हैं, उनके लिए यह बहुत दिलचस्प रहा है.

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परम्परागत खान पान से अलग हटकर प्रयोग करने वाले इनमें से अधिकांश लोगों को सफलता भी मिल रही है.

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इस क्षेत्र में बड़ी सफलता रही है दक्षिणी मुंबई के कपाड़िया परिवार को. तीन सदस्यों वाला यह परिवार घर से ही 'दि बोहरी किचन' या टीबीके चलाता है.

आम तौर पर भारतीय खानों के मेन्यू में परम्परागत बोहरी मुस्लिम भोजन नहीं पाया जाता है और समुदाय के बाहर तो न के बराबर खाया जाता है.

लेकिन हर सप्ताहांत कपाड़िया परिवार लगभग 15 मेहमानों को बुलाते हैं, जो प्रति व्यक्ति 1,500 रुपये अदा करते हैं.

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इस विशेष भोज में मटन कीमा समोसा या चिकन रोश्त होता है जिसे नफ़ीसा कपाड़िया खुद बनाती हैं.

मटन कीमा समोसे में मटन के कीमे के साथ, हरा प्याज और धनिया होता है जिसे नींबू और पुदीने की चटनी से खाया जाता है.

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चिकन रोश्त के लिए चिकन को तले हुए प्याज और दही की ग्रैवी में पकाया जाता है. इसमें उबले अंडे और तले हुए आलू भी डाले जाते हैं.

नफ़ीसा के बेटे मुनफ़ ने टीबीके को पूरा समय देने के लिए गूगल की अपनी नौकरी छोड़ दी.

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वो कहते हैं कि इसकी शुरुआत एक प्रयोग के तौर पर कुछ दोस्तों के बीच की गई थी, लेकिन अब यह संख्या 15 तक पहुंच गई है और इसकी सीटें एक सप्ताह पहले ही बुक हो जाती हैं.

आयोजन की सूचना फ़ेसबुक पर डाल दी जाती है और अपने बारे में थोड़ी बहुत सूचना देने के बाद लोगों को साइन-अप करना पड़ता है.

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इसे मुनफ़ कपाड़िया 'नो सीरियल किलर पॉलिसी' कहते हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया कि उनके मेहमानों में सेलिब्रिटीज़, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, राजनयिक और मल्टी नेशनल कंपनियों से जुड़े लोग होते हैं.

मुंबई की एक और होम शेफ़ गीतिका सैकिया असम की आदिवासी खाना बनाती हैं और अकेले ही 'गीतिका पाकघर' चलाती हैं.

उनके मेन्यू में कबूतर का मांस, रेशम के कीड़े का प्यूपा और जूट के पत्तों के साथ पोर्क जैसी चीजें शामिल हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "मैं खाना बनाने के परम्परागत असमी आदिवासी पाक कला को बचाने की कोशिश भी कर रही हूँ. ये कहीं लिखा नहीं है, लेकिन आदिवासी समुदाय की विविधता के साथ पाक कला भी अलग अलग है."

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हालांकि रुचि के बावजूद, होम शेफ़ को खुद कोई बहुत ज़्यादा मुनाफ़ा नहीं होता है.

बाइट क्लब और ट्रेकूरियस जैसी कई सेवाएं हैं जिन्होंने होम शेफ़ को ग्राहकों से जोड़ने की कोशिश की, लेकिन इससे उनके मुनाफ़े में कोई बहुत फर्क नहीं पड़ा.

बाइट क्लब और ट्रेकूरियस अब बंद हो चुके हैं.

जब बाइट क्लब चल रहा था तो इसके साथ काम करने वाली दिल्ली की होम कुक प्रिथा सेन कहती हैं, "जैसे जैसे प्रतियोगिता बढ़ी, उन्होंने ऑर्डर में कमी करनी और कटौती करनी शुरू कर दी. मैं चाहे सात प्लेट बनाऊं या 12 प्लेट बनाऊं मेहनत तो उतनी ही लगती है."

मुनफ़ कपाड़िया इस बात से सहमति जताते हैं कि इसमें मुनाफ़ा एक बड़ी समस्या है.

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उन्होंने बताया, "हम अभी भी इसलिए ये कर रहे हैं क्योंकि हमें ये अच्छा लगता है, लेकिन ये मॉडल बहुत फलने फूलने वाला नहीं है क्योंकि इसमें बहुत सारी मेहनत है और बचत बहुत ही कम है."

इसलिए मुनाफ़ा बढ़ाने के और मौके खोजने के लिए वो साथी होम शेफ़ को प्रेरित करने की कोशिश कर रहे हैं. इसके लिए वो होम शेफ़ का एक ढ़ीला ढ़ाला ग्रुप बना रहे हैं. इसे वो 'होम शेफ़ रिवोल्यूशन' कहते हैं.

मुनफ़ कपाड़िया ने खुद हाल ही में टीबीके की होम डिलीवरी शुरू की है. वो कहते हैं कि इससे काफ़ी लोग आकर्षित हो रहे हैं.

वो कहते हैं, "यह एक ऐसा आइडिया है जिसका समय आ गया है. समाज में पैसा है, सपोर्ट है और लोगों में रुचि भी है. बस थोड़ी योजना और समय की ज़रूरत है."

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