जब अकबर को मिला बीरबल का रोल

  • 6 जुलाई 2016
मंत्री पद की शपथ लेते एमजे अकबर. इमेज कॉपीरइट AFP

2002 में गुजरात दंगों के दौरान उनकी कलम सबसे ज्यादा आग उगल रही थी. आज उन्हीं नरेन्द्र मोदी की केबिनेट में एम जे अकबर राज्य मंत्री हैं. अकबर उस ज़माने के धाकड़ अंग्रेजी एडिटरों में से हैं, जब वे राष्ट्रीय स्तर के सेलिब्रिटी हुआ करते थे.

अकबर तब तीस के भी नहीं हुए थे, जब उन्होंने सन्डे पत्रिका का संपादक पद सम्भाला था. सन्डे मैगज़ीन कलकत्ता से छपती थी. तीस की उम्र पार करने के बाद उन्होंने आनंद बाज़ार पत्रिका समूह से ही 'द टेलीग्राफ' अख़बार की शुरुआत की.

और चालीस पार करने के बाद उन्होंने 'एशियन एज' नाम से ख़ुद का अख़बार शुरू किया, जिसका एक एडिशन लंदन में भी था.

इस दौरान अकबर का जलवा सिर्फ मीडिया में नहीं था. सियासी हलकों में अपनी पैठ और मौके की तलाश साथ में चलती रही.

लोकसभा वे एक ही बार पहुंचे थे. किशनगंज से कांग्रेस के टिकट पर. उस वक़्त उन्होंने सैय्यद शहाबुद्दीन को हराया था. और शहाबुद्दीन का आरोप ये था कि उन्हें नामांकन दाख़िल करने से रोकने की कोशिश की गई थी. सत्ता पाने की हसरत अकबर को किस कदर थी, अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है.

लेकिन किस्मत देखिए कि कांग्रेस में वे महज पार्टी के स्पोक्समैन की हैसियत ही पा सके थे, जैसा भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद भी हुआ. राजीव गांधी की हत्या के बाद ही कांग्रेस में उन्हें नरसिम्हा राव ने दरकिनार कर दिया.

अकबर का कहना है कि एक बार वे और राजीव गांधी एक साथ बैठे थे और तभी नरसिम्हा राव कमरे में दाखिल हुए. बुज़ुर्ग नरसिम्हा राव कमरे में दाखिल होते वक्त थोड़ा लड़खड़ा गए थे. शायद उनकी धोती पैरों में फंस गई थी. अकबर और राजीव दोनों की इसपर हंसी छूट गई.

अकबर को लगता है राव ने इस बात को दिल पर ले लिया और अकबर का कांग्रेस के साथ नाता टूट गया.

अकबर को मैं बीस सालों से जानता हूं और मानता हूं कि वे देश में अंग्रेजी के सबसे उम्दा संपादक हैं. उन्हें खुद ये पता था कि वे अरुण शौरी, विनोद मेहता और प्रीतीश नंदी से बेहतर संपादक थे.

जब अरुण शौरी नब्बे के दशक में मंत्री और प्रीतीश नंदी राज्यसभा के सदस्य बनें तो मुझे लगता है अकबर को ये बात नाग़वार गुजरी होगी. आख़िर जो लोग पेशे में उनसे जूनियर हैं, उन्हें वह सब हासिल हो रहा था, जो वे खुद अपने लिए हासिल करना चाहते थे. अकबर को यक़ीन था कि वे इन लोगों से ज्यादा इसके हक़दार हैं.

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जब कांग्रेस की बागडोर सोनिया गांधी के पास आई तो इकबारग़ी ऐसा लगा कि कांग्रेस के दरवाज़े अकबर के लिए वापस खुल सकते हैं. पर ऐसा हो न सका. इस बीच उनके अख़बार की माली हालत भी ख़स्ता थी और उनके पार्टनरों ने ही उन्हें पद से निकाल बाहर कर दिया. इसके बाद हाशिए पर रहने का थोड़ा कठिन दौर शुरू हुआ और यही वह वक़्त था, जब वे मोदी से करीब होने में कामयाब हो गए और ज़माने को भनक भी नहीं लगी.

अकबर और मोदी की नज़दीकी मेरे लिए दो वजहों से बहुत अचरज भरी बात थी. पहली यह कि अकबर ने मोदी की सबसे तीखी आलोचना की थी. गुजरात में हिंदुत्व की राजनीति पर उन्होंने कड़ा हमला किया था.

उन्होंने 'भीड़ और सरकार में फर्क होना चाहिए' शीर्षक से एक ओजस्वी सम्पादकीय लिखा था.

उन दिनों प्रकाशित होने वाले अपने एक नियमित कॉलम में उन्होंने लिखा था, ''नरेन्द्र मोदी ने जितना काम किया है, उतने में तो उन्हें किसी देश का सर्वोच्च सम्मान मिल ही जाना चाहिए. पर हमारे देश से नहीं. दरअसल गुजरात के मुख्यमंत्री को तो निशान-ए-पाकिस्तान से नवाज़ा जाना चाहिए.''

उन्होंने लिखा था कि मोदी तो 'पाकिस्तान के हितों को साधने का' काम कर रहे हैं. उनके हिसाब से, 'आइडिया ऑफ इंडिया में हर नागरिक को बराबरी का हक़ मिलता है, चाहे वह किसी भी मजहब का क्यों न हो. मोदी ने उस आइडिया को तबाह करने की कोशिश की है. मोदी ने तो उस बात का सुबूत पेश कर दिया, जो अब तक मुबाहिसों पर महज एक दलील थी.’

उन्होंने आगे लिखा, ''गोधरा में हुई क्रूर त्रासदी के बाद जब तक हिंसा पर उतारू गुस्सैल भीड़ की तरह बात करना मोदी ने शुरू नहीं किया, तब तक सिर्फ पूरे दक्षिण एशिया में ऐसी नकारात्मकता का अड्डा पाकिस्तान था.''

अकबर के इस फैसले पर मेरे आश्चर्य की दूसरी वज़ह ये भी थी कि वे वाकई में उस मायने में धर्मनिरपेक्ष हैं जिस मायने में हम में से ज्यादातर लोग नहीं होते. ये उनके दफ्तर में भगवान गणेश की दर्जनों मूर्तियों को देख कर पता चलता है. वे भगवान गणेश की ताकत में यकीन करते हैं. वे अपने ही हमनाम मुगल बादशाह की तरह अजमेर में मोईनुद्दीन चिश्ती की दरग़ाह पर अक्सर मत्था टेकने जाते रहे हैं.

अकबर कभी भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उसूलों से हामी भरने वाले शख़्स नहीं रहे हैं. उन्हें नेहरूवादी कहा जा सकता है और जवाहर लाल नेहरू पर लिखी जीवनी उनकी सबसे दमदार किताब है.

अकबर की विचारधारा का असर उनके नीचे काम करने वाले दर्जनों पत्रकारों पर भी था. इन पत्रकारों में संकर्षण ठाकुर, मानिनी चटर्जी और सीमा मुस्तफा जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं.

बीजेपी में एमजे अकबर के शामिल होने की ख़बर ने बहुतों को अचरज में डाल दिया था. लेकिन सच तो ये है कि साठ की उम्र पार करने के बाद आख़िरकार उन्हें थोड़ा ही सही वह मुकाम ज़रूर हासिल हुआ है जो उनका अरमान था. मैं थोड़ा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि अकबर अभी भी केबिनेट मंत्री नहीं बनाए गए हैं और ना ही स्वतंत्र प्रभार के साथ राज्य मंत्री ही हैं. वे उन राज्यमंत्रियों की लंबी कतार में एक हैं, जिन्हें अपने सीनियर केबिनेट मंत्री को रिपोर्ट करनी होगी. मुझे यकीन है कि अपने उस सीनियर मंत्री से खुद को अकबर ज्यादा बौद्धिक और होशियार समझते रहेंगे.

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बातों बातों में कई साल पहले एक दिन अकबर ने मुझसे कहा था कि वे चाहते तो भारत का प्रधानमंत्री बनना हैं पर ऐसा हो न सकेगा क्योंकि वे एक मुसलमान है.

अब वे भारत सरकार के राज्य मंत्री तो बन ही गए हैं. भले ही इसके लिए उन्होंने अपने उसूलों और लिखे हुए को दांव पर लगाना पड़ा हो. अकबर के लिए शायद ये कोई बड़ी कीमत नहीं.

(आकार पटेल एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के प्रमुख हैं, एमजे अकबर के साथ काम कर चुके हैं. इस लेख के विचार उनके अपने हैं.)

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