झालमुड़ी: यूं ही नहीं कहते स्नैक्स फूड का राजा

  • 9 जुलाई 2016
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झालमुड़ी कोलकाता में फ़ुटपाथ पर बिकने वाले स्नैक्स का राजा है. माना जाता है कि इसे अमीर और ग़रीब दोनों ही बड़े चाव से खाते हैं. इसके कारण भी हैं.

इनके स्टॉल कटोरों और अन्य बर्तनों से लदे होते हैं जिनमें चटपटे मसाले रखे होते हैं और ठीक बीचों-बीच एक बड़ा सा स्टील का कटोरा रखा होता है, जिसमें झालमुड़ी बनाई जाती है.

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झाल का मतलब है मसालेदार और मुड़ी का मतलब है चावल के भुने दाने, लेकिन इस स्नैक्स में केवल कुरकुरे चावल ही नहीं होते बल्कि इसमें मिर्च पॉउडर भी छिड़काव होता है.

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जैसा कि सभी स्ट्रीट फ़ूड के बारे में होता है, झालमुड़ी बनाने का असली स्वाद बनाने वाले की कला पर निर्भर करता है.

कुछ मुठ्ठी मुड़ी में कुछ मूंगफली, दाल के दाने और मक्के (कॉर्नफ्लेक्स) भी पड़ते हैं. कभी-कभी इसमें सेव भी डाली जाती है.

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इसके बाद इसमें टमाटर, खीरा, मिर्च, धनिया, नारियल और प्याज के टुकड़े मिलाए जाते हैं. इसके ऊपर उबले हुए आलू के टुकड़े डाले जाते है.

जिन्होंने झालमुड़ी कभी नहीं चखी है वे सोचेंगे कि शायद इसे बनाने में कोई गड़बड़ी है, लेकिन इस पर तुरंत फैसला देने की ज़रुरत नही है?

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अब इस स्नैक्स के दूसरे हिस्से की बारी आती है यानी झाल की, जो कि मसालों का पेस्ट होता है.

इसमें मिर्च ज़रूर होती है, लेकिन इससे ज़्यादा मिर्च मुड़ी में होगी.

इसमें नमक और गरम मसाला तो होता ही है. गरम मसाले में जीरा, इलायची, जायफल, जावित्री, लौंग, काली मिर्च और तेजपत्ता मिला होता है.

कुछ झालमुड़ी वाले खट्टापन पैदा करने के लिए मसालों में अमचूर भी डालते हैं. कच्चे आम को सूखाकर अमचूर का पाउडर तैयार किया जाता है.

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एक चम्मच अमचूर को कटोरे में डाला कर उस पर नींबू निचोड़ा जाता है और सरसों का तेल डाला जाता है.

इन सभी को अब अच्छी तरह मिला लिया जाता है.

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एक बढ़िया स्ट्रीट फ़ूड को बनाने की कला थोड़ी थोड़ा नाटकीय होना चाहिए, इसलिए किसी भी झालमुड़ी वाले के लिए यह एक मौके की तरह होता है और वह इसका थोड़ा प्रदर्शन भी करता है.

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हर चीज अच्छी तरह से मिक्स हो इसके लिए बनाने वाला कटोरे को कई बार उछालता है.

अंत में इसे रद्दी अख़बारों से बने कोन के आकार के पैकेट में डालकर इसे हिलाया जाता है.

अब ये खाने के लिए बिल्कुल तैयार होता है.

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और अब वो पल आता है जब आपको पता चलेगा कि क्यों इसके गुणों के लिए इतनी तारीफ़ की जाती है.

कोलकाता पश्चिम बंगाल की राजधानी है और बंगाली भारतीय परम्पराओं के सबसे अहम पहलू बहस मुहाबिसों के लिए प्रसिद्ध हैं.

नोबल पुरस्कार विजेता भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन की सबसे चर्चित किताबों में अपने देशवासियों के विवाद करने वाले व्यवहार की तारीफ़ है गई है और इसे 'वाद विवाद करने वाले भारतीय' कहा गया है.

यहां तक कि अगर कुछ लोग झालमुड़ी के एक पैकेट को साझा कर रहे हैं तो यह बंगालियों का सबसे अधिक तू-तू मैं-मैं वाला पल होता है और आपको एक बिल्कुल ग़ैर भारतीय अनुभव प्राप्त होगा- यानी खामोशी.

ऐसा इसलिए क्योंकि वो इस दौरान मसालेदार और कुरकुरी चीज को जल्द जल्द से चबाकर ख़त्म कर रहे होते हैं.

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यह झालमुड़ी इतनी स्वादिष्ट होती है कि इस बारे में सभी बंगालियों की राय एक सी ही होगी.

शहर के मशहूर पार्क मैदान में खड़े ढ़ेरों झालमुड़ी स्टाल में से किसी से एक पैकेट खरीदिए और खाते हुए अन्य ग्राहकों को देखिए.

आप देखेंगे कि सूटे-बूट पहने वाले बिजनेसमैन भी ग़रीब से ग़रीब ग्राहकों की लाइन में खड़े होते हैं.

वाक़ई जब स्वाद की बात हो तो झालमुड़ी सबको बराबर बना देता है!

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