मोदी का राज्यमंत्रियों पर इतना भरोसा क्यों?

  • 10 जुलाई 2016
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समाचार चैनलों में अकसर मुझे मंत्रियों को उनके काम के प्रदर्शन के आधार पर आंकने को कहा जाता है. वे मुझे उनके बारे में एक पैराग्राफ़ भेजते हैं, उनके मंत्रीमंडल की उपलब्धियों की सूची भेजते हैं और उसके आधार पर मंत्रियों को नंबर देने के लिए कहते हैं.

जब शो प्रसारित होता है तो मैं ये भी देखता कि दूसरों ने मंत्रियों को क्या रैंकिंग दी है.

केंद्र सरकार के चार मंत्री पीयूष गोयल (ऊर्जा, कोयला, नई एवं नवीनीकरण ऊर्जा मंत्रालय), निर्मला सीतारमण (वाणिज्य एवं उद्योग), धर्मेंद्र प्रधान (पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस) और प्रकाश जावड़ेकर (पर्यावरण) हमेशा बेहतर रैंकिंग पाते रहे. इन चारों में एक चीज़ सामान्य थी, ये सब के सब राज्यमंत्री थे, यानी वे जूनियर मंत्री थे, उनके पास कैबिनेट रैंक नहीं थी.

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कुछ दिनों पहले नरेंद्र मोदी ने जब अपनी कैबिनेट को विस्तार दिया, तब भी यही वास्तविकता थी. कई लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया और मंत्रीमंडल भी भारी भरकम हो गया. लेकिन केवल एक मंत्री को राज्य मंत्री से कैबिनेट मंत्री के तौर पर प्रमोट किया गया. प्रकाश जावड़ेकर को ना केवल प्रमोट किया गया बल्कि उनका विभाग भी बदला गया. उन्हें अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय का प्रभार सौंपा गया है.

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मामलों का प्रभार अब अनिल माधव दवे को सौंपा गया है, वे भी राज्य मंत्री होंगे. मेरा आकलन है कि यह मोदी की अपनी शैली है, गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद से बीते 15 साल से यही उनकी शैली रही है.

वे कुछ विभागों को चुनते हैं और उसमें दिलचस्पी रखते हैं और उसका प्रभार किसी वरिष्ठ को नहीं सौंपते. उसकी ज़िम्मेदारी वे जूनियर मंत्री को सौंपते हैं जो या तो सीधे मोदी को रिपोर्ट करते हैं या फिर मोदी के साथ काम करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों की टीम को. मैंने इसे गुजरात में तब नोटिस किया था जब मोदी मुख्य तौर पर अपने दो मंत्रियों- सौरभ पटेल और अमित शाह के साथ काम करते थे.

सालों तक जब तक मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहे, पटेल के पास उद्योग, खनन, खनिज, पेट्रो केमिकल, बंदरगाह और ऊर्जा विभाग था. भारत के सबसे ओद्यौगिक राज्यों में से एक गुजरात है.

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इस लिहाज से ये महकमे काफी अहमियत वाले थे. पटेल के इन विभागों को ही पांच बड़े कारोबारी समूहों, टाटा, एस्सार, अडानी, अंबानी और टोरैंट के कारोबारी हितों को देखना था. गुजराती मीडिया में उस वक्त मजाकिया तौर पर कहा जाता था कि मोदी के सामने महाभारत की द्रौपदी जैसी चुनौती है, यानी पांच पतियों को ख़ुश रखने की चुनौती.

लेकिन इतने अहम विभागों को संभालने के बावजूद पटेल को कबीना मंत्री का दर्जा नहीं था. मेरे ख्याल से, मोदी इन मंत्रालयों में निर्णय लेने की प्रक्रिया पर पूरा नियंत्रण चाहते होंगे. यह भी सच है कि गुजरात के सभी मंत्री मोदी को रिपोर्ट किया करते थे, ठीक उसी तरह से जिस तरह दिल्ली में आज कर रहे हैं.

हालांकि तथ्य ये है कि कैबिनेट मंत्रालय का दर्जा नहीं देने से ही ये साफ़ है कि अहम फ़ैसले पर कैबिनेट मंजूरी लेने से पहले उस मंत्री को पहले मोदी के दफ़्तर से पूछना होगा.

ठीक इसी तरह, मोदी के साथ सालों तक गृह मंत्रालय का प्रभार देखने वाले अमित शाह को भी कबीना मंत्री का दर्जा नहीं मिला. अमित शाह अपनी नियुक्ति से लेकर विवादों के चलते मंत्रीपद छोड़ने तक राज्य मंत्री ही रहे. उनके पास पुलिस का विभाग भी था, ऐसे में इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि क्यों मोदी उस विभाग पर अपनी नज़र रखना चाहते थे.

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मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो मैंने अनुमान लगाया था कि वे इन सभी मंत्रालयों पर अपना नियंत्रण रखने के लिए केवल राज्य मंत्री ही बनाएंगे. यह काफ़ी हद तक सच साबित हुआ हालांकि गृह विभाग को लेकर मेरा अनुमान ग़लत रहा. क्योंकि राजनाथ सिंह गृह विभाग के कैबिनेट मंत्री हैं.

जब मैंने इस बारे में एक वरिष्ठ नौकरशाह से बात की, तो उन्होंने मुझे बताया कि केंद्र में गृह मंत्रालय की प्रकृति अलग है. इसके पास राज्यों की पुलिस की ज़िम्मेदारी नहीं होती, क्योंकि वह राज्य का मसला है. ऐसे में इस मंत्रालय की अहमियत थोड़ी कम हो जाती है, हालांकि इसे तीन सबसे अहम मंत्रालयों में गिना जाता है.

लेकिन ऊर्जा, खनन, पेट्रोलियम, कोयला एवं उद्योग मंत्रालय मोदी के विकास के मंत्र से सीधे जुड़े हुए हैं. पर्यावरण मंत्रालय भी अहम है क्योंकि एक्टिविस्ट मंत्री परियोजनाओं को रोक सकता है. मेरा मानना है कि मोदी चाहते हैं कि इन मंत्रालयों पर उनका कामकाजी नियंत्रण रहे और वे जो भी नीतिगत बदलाव चाहें वह बिना प्रतिरोध के लागू हो जाए.

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यही वजह है कि इन मंत्रालयों के मंत्री चाहे जितने भी प्रतिभाशाली हों, उन्हें कैबिनेट रैंक नहीं दिया गया है. दिलचस्प ये भी है कि मोदी के गुजरात छोड़ने के बाद ही सौरभ पटेल कैबिनेट मंत्री बन पाए, यानी अगर ऐसी स्थिति बनती, तभी इन विभागों के मंत्रियों को कैबिनेट दर्जा मिल पाएगा.

लेकिन फिलहाल यह स्पष्ट है कि मोदी दिल्ली में भी शासन के गुजरात मॉडल को ही अपना रहे हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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