क्या मदरसों की पढ़ाई में बदलाव की ज़रूरत है?

  • 10 जुलाई 2016
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भारत में एक इस्लामी प्रचारक डॉक्टर ज़ाकिर नाइक की गिरफ़्तारी की मांग ज़ोर पकड़ रही है.

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इस्लाम और दूसरे धर्मों के बारे में उनके विचारों पर अकसर सवाल उठते रहे हैं.

एक जुलाई को ढाका में हुए ख़ौफनाक़ हमले के बाद जब ऐसी ख़बरें आईं कि चरमपंथियों में से एक उनसे प्रभावित था, तब से भारत सरकार हरकत में आ गई है.

जानकारी के मुताबिक़ बांग्लादेश में डॉक्टर नाइक बहुत चर्चित हैं. बीते कुछ दिनों से ये मांग उठ रही है कि उन्हें धार्मिक आधार पर नफ़रत फैलाने और कट्टरपंथी धार्मिक सोच को बढ़ावा देने के आरोप में गिरफ़्तार किया जाए.

पूरी दुनिया में इस्लाम के नाम पर बढ़ती हुई चरमपंथी घटनाओं के मद्देनज़र मुसलमानों की धार्मिक शिक्षा, ख़ासकर इस्लामी मदरसों की शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया जाने लगा है.

भारत में देवबंद और नदवा जैसे सुन्नी मुसलमानों के कई बड़े मज़हबी संस्थान हैं जहां हज़ारों छात्र धार्मिक शिक्षा हासिल करते हैं.

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यहां शिक्षा हासिल करने वाले छात्र देशभर की लाखों मस्जिदों में इमामत करते हैं और हज़ारों छोटे-बड़े मदरसों में छात्रों को पढ़ाते हैं.

देवबंद, नदवा या दूसरे बड़े धार्मिक संस्थान वैचारिक तौर पर दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ रहे हैं और ख़ुदक़श हमलों और दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ फ़तवे भी जारी कर चुके हैं.

लेकिन इन मदरसों का पाठ्यक्रम मुख्यतः इस्लाम की पारपंरिक, पुरानी और प्राचीन व्याख्याओं पर आधारित है जो अक्सर समकालीन लोकतांत्रिक धारणाओं और भारत जैसे बहुधर्मीय समाज, तहज़ीब और सभ्यता से मेल नहीं खाता है.

ऐसे कई संस्थानों में बताया जाता है कि पश्चिमी संस्कृति और सभ्यता मुसलमानों के लिए किसी काम की नहीं है.

ये भी बताया जाता है कि उनका समाज, चरित्र और नैतिक मूल्यों से खाली है और उनकी कामयाबियां झूठी हैं.

वहां से अकसर शियाओं और क़ादियानी मुसलमानों के बारे में नफ़रत भरे फतवे जारी किए जाते हैं.

वहां शिक्षा हासिल कर रहे छात्र जब तक शिक्षा पूरी करते हैं, तब तक वो अपने पहनावे, हुलिए और बोलचाल से अलग हो चुके होते हैं.

शिक्षा के बाद वो अमरीका, यूरोप और बहुत हद तक हिंदुओं को भी मुसलमानों और इस्लाम का दुश्मन समझने लगते हैं. उनकी नज़र में हर कोई इस्लाम के ख़िलाफ़ साज़िश कर रहा होता है.

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लोकतंत्र उन्हें धोखाधड़ी लगता है.

वो देश के मुसलमानों के मन में पिछड़ेपन की एक सोच पैदा करते हैं. उनका नज़रिया धार्मिक मुसलमानों को लोकतंत्र और दूसरे मज़हबी फ़िरकों से मेलजोल करने से रोकता है.

दुनिया में इस्लाम के नाम पर बढ़ती हुई दहशतगर्दी के मद्देनज़र ये संस्थान भी सुरक्षा एजेंसियों और सरकार की नज़रों में रहे हैं.

सवाल बहुत अहम है कि क्या धार्मिक घृणा और कट्टरपंथी सोच पर क़ाबू पाने के लिए इन धार्मिक संस्थानों के पाठ्यक्रमों पर सरकार का नियंत्रण होना चाहिए?

ये बहुत पेचीदा सवाल है. लेकिन अगर भारत के बुद्धिजीवी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्र पसंद पर्यवेक्षक देश के धर्मनिरपेक्ष स्कूली पाठ्यक्रमों में धार्मिक शिक्षा की कथित मिलावट का विरोध कर रहे हैं तो क्या उन्हें देश के इन इस्लामी संस्थानों के शैक्षणिक पाठ्यक्रमों और धर्म की पुरानी व्याख्याओं का विरोध नहीं करना चाहिए.

अगर इन संस्थानों की विचारधारा लोकतंत्र, बहुधार्मिक सहिष्णुता और सद्भाव की जीवनशैली के साथ संघर्ष कर रही है, तो क्या उसे ही मूल रूप से बदलने की ज़रूरत है?

हो सकता है कि देश के बुद्धिजीवी और पर्यवेक्षक इससे सहमत नहीं हों. उनकी दलील ये होगी कि सरकार को धार्मिक मामलों में दख़ल नहीं देनी चाहिए.

लेकिन पूरी दुनिया में दहशतगर्दी एक खौफ़नाक़ शक्ल अख़्तियार कर रही है. इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, इस ख़तरनाक धार्मिक रुझान को रोकने के लिए सरकार को हर मुमकिन क़दम उठाने की ज़रूरत है.

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