बुरहान वानी, जिसकी मौत के बाद उबला कश्मीर..

  • 12 जुलाई 2016
बुरहान वानी

भारत प्रशासित कश्मीर के दक्षिणी हिस्से में हिज़्बुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी की बीते शुक्रवार मुठभेड़ में मौत के बाद घाटी में हुई हिंसक झड़पों में 32 लोगों की मौत हुई है.

इसके साथ ही घाटी में उग्र विरोध प्रदर्शनों का एक नया दौर उभरकर सामने आया है और ये सवाल भी सामने आया है कि बुरहान वानी आख़िर कौन थे जिनकी मौत से कश्मीर इस तरह से उबल पड़ा है.

राजधानी श्रीनगर से लगभग 50 किलोमीटर दूर त्राल कस्बे से सटा एक गांव हैं शरीफ़ाबाद जिसे पहले अरीगाम के नाम से जाना जाता था.

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22 वर्षीय बुरहान वानी का ताल्लुक इसी अरीगाम से है और उन पर जमात-ए-इस्लामी का गहरा असर था.

बुरहान का परिवार जमात विचारधारा से काफी प्रभावित था और उन्होंने भी उस संस्था में तालीम हासिल की थी जिसका संचालन जमात समर्थकों के हाथ में था.

बुरहान पर एक तरफ़ जमात का मज़हबी असर था, वहीं दूसरी तरफ़ वो 21वीं सदी का युवक था जो सोशल मीडिया के असर से भली-भांति वाक़िफ़ था. इन दोनों प्रभावों ने बुरहान को हिज़्बुल का कमांडर बनने में मदद की जिसकी मौत पर पूरी घाटी ख़ासतौर पर युवा पीढ़ी शोक मना रही है.

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नए बदलावों को अपनाने के मामले में दक्षिण कश्मीर का एक लंबा इतिहास रहा है. फिर बात चाहे अहमदिया सम्प्रदाय की हो या जमात-ए-इस्लामी की, ये सभी मज़हबी आंदोलन दक्षिण कश्मीर से शुरू हुए. यहां तक की वामपंथी आंदोलन को भी कश्मीर के इसी हिस्से में जगह मिली.

हालिया इतिहास की बात करें तो नेशनल कॉन्फ्रेंस का विकल्प पेश करने वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी भी कश्मीर के इसी हिस्से में पैदा हुई.

इसी रुझान पर चलते हुए बुहरान वानी ने भी बदलाव को स्वीकार करते हुए सोशल मीडिया का सहारा लेकर मज़हब से प्रेरित अपनी राजनीतिक विचारधारा को बढ़ावा दिया.

इसके साथ ही बुरहान युवाओं की आंख का तारा बन गया. बुरहान सोशल मीडिया की ताक़त को पहचानता था और जानता था कि नई उम्र के अधिकतर कश्मीरी नौजवान सोशल मीडिया पर हैं.

इसी का बुरहान ने फायदा उठाया और बड़ी होशियारी के साथ सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हुए युवाओं के बीच ख़ासा प्रभावशाली बन गया.

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बुरहान कश्मीरी युवाओं को बड़ी संख्या में उग्रवाद की ओर लुभाने में भले ही क़ामयाब नहीं हो पाया हों, लेकिन उन्होंने इन युवाओं को इतना तो प्रभावित ज़रूर कर दिया था कि वे भारत और हर उस चीज़ से नफ़रत करने लगें जो भारतीय है.

बुरहान ने बंदूक़ के साथ ग्लैमर को जोड़ा, 'प्रतिरोध और शहादत' को भी ग्लैमर का चोला पहनाया. इसके साथ ही उनके 'चाहने वाले' बढ़ते चले गए.

अब इस मामले का एक दूसरा पहलू समझिए. दक्षिण कश्मीर में सुरक्षाबलों के साथ हिंसक झड़पों में शामिल होने वाले युवकों ने वर्ष 2014 में विधानसभा चुनाव के लिए जमकर मतदान किया. ये वो युवा थे जो उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली पिछली सरकार से नाराज़ थे.

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इन युवकों ने वर्ष 2010 का ख़ूनी प्रदर्शन देखा था जिसमें 100 से अधिक लोग मारे गए थे जिनमें अधिकतर युवा थे.

तब युवा शक्ति ने नेशनल कॉन्फ्रेंस को सत्ता से बेदख़ल करने का फ़ैसला किया. उनके पास पीडीपी की शक्ल में बस एक विकल्प था जिसने नरेंद्र मोदी की पार्टी बीजेपी के खिलाफ़ मोर्चा खोल रखा था. लेकिन चुनाव के बाद उन्होंने दोनों दलों को गले मिलते देखा.

उन्होंने उमर अब्दुल्ला को बेदख़ल करके पीडीपी का समर्थन किया, लेकिन बदले में उन्होंने ख़ुद को 'छला हुआ' महसूस किया क्योंकि पीडीपी ने उनके मुताबिक 'गुजरात में मुसलमानों पर ज़ुल्म करने वालों' के साथ गठजोड़ कर लिया था.

असंतुष्ट और गुमराह युवाओं से बुरहान ने यूट्यूब, ट्विटर और फेसबुक के ज़रिया सम्पर्क साधा और उन्हें एक अलग रास्ता बताया.

उस रास्ते में कोई चुनाव नहीं होता, मुख्यधारा का कोई नेता नहीं होता. ये उग्रवाद की एक अलग विचारधारा थी जहां बुरहान की शक्ल में, उनकी नजरों में, एक 'सफ़ल व्यक्ति' बाहें फैलाकर उनका स्वागत कर रहा था.

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