सौर ऊर्जा से तैयार हो रहे हैं 'स्मार्ट गांव'

  • 13 जुलाई 2016
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भारत सरकार स्मार्ट सिटी योजना पर 98,000 करोड़ रुपए खर्च करने को लेकर प्रतिबद्ध है, लेकिन देश के पहले स्मार्ट गांव की अवधारणा रखने वाले अशोक दास को लगता है कि अभी इस ओर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा.

अशोक दास का मानना है कि शहरी लोगों को बिजली की कद्र नहीं है, लेकिन अंधेरे में रह रहे तकरीबन 20 करोड़ लोगों के लिए बिजली उनका अधिकार नहीं, बल्कि विशेष लाभ है.

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Image caption अशोक दास

दास कहते हैं, “बड़े शहरों में लोगों का बदलता व्यवहार बड़ी समस्या है. स्मार्ट शहर बनाने में कई साल लगेंगे, लेकिन इसी अवधि में मुझे हज़ारों स्मार्ट गांव मिल सकते हैं.”

अमरीका में सेमीकंडक्टर उद्योग में तक़रीबन एक दशक गुज़ारने के बाद, 2005 में दास भारत लौटे, जहाँ वो पर्यावरण के अनुकूल तकनीक के सलाहकार के रूप में काम कर रहे हैं.

लेकिन अक्षय ऊर्जा को लेकर बड़े-बड़े दिशानिर्देशों के बावजूद वो नहीं मानते कि ग्रामीण इलाक़ों में बिजली पहुँचाने पर बहुत ज़ोर दिया जा रहा है.

उनका मानना है कि ऐसा कुछ नहीं हो रहा है कि जिससे ग्रामीण क्षेत्र को फ़ायदा हो सके.

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साल 2010 में वो बिहार में अपने गृहनगर के पास के एक गांव में किसी काम से गए थे. दास कहते हैं, "मुझे याद है जब मैंने अपनी भतीजी से पूछा कि मैं तुम्हारे लिए क्या ला सकता हूँ तो उसने कहा, अंकल, मेरे पास सबकुछ है, बस मेरे लिए बिजली ले आइए."

दास कहते हैं कि भारत का स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र 'बेचो और भागो' की नीति पर चलता रहा है. महंगे उपकरण लगाए जाते हैं, लेकिन दूरदराज़ के गांवों में लगे सौर ऊर्जा उपकरणों की मरम्मत पर ध्यान नहीं देने का मतलब है ये जल्द ख़राब हो जाते हैं और फिर एक दिन ग़ायब हो जाते हैं.

इसलिए, दास ने स्मार्ट ग्रिड तकनीकी बनाई जिससे गांव के बिजली के ढाँचे की दूर से ही निगरानी की जा सकती है.

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जनवरी में, ओडिशा का छोटकी गांव भारत का पहला स्मार्ट गांव बना जो स्मार्ट नैनोग्रिड तकनीक से लैस है. इसे दास की कंपनी सनमोक्षा ने विकसित किया है.

बिजली 30 किलोवॉट के सौर संयंत्र से दी गई है और मीटर और सेंसर बिजली की खपत और सप्लाई प्रणाली के लिए आंकड़े जुटाते हैं.

इस जानकारी को सनमोक्षा की क्लाउड आधारित निगरानी प्रणाली को भेजा जाता है, जिसे कंपनी के कर्मचारी कहीं भी देख सकते हैं.

इससे बिजली की मांग वाले इलाकों में बिजली की आपूर्ति संभव हुई है. इससे खेतों की सिंचाई, पैकेजिंग उद्योग और कोल्ड ड्रिंक्स स्टोर का कारोबार बढ़ा है.

वाई-फ़ाई सुविधा से इस गांव के लोग एक मोबाइल ऐप के माध्यम से स्थानीय इंटरनेट के ज़रिए अपनी बिजली की खपत देख पाते हैं, बिल का भुगतान करते हैं और अपनी शिकायतें दर्ज कराते हैं.

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संयंत्र को लगाने का खर्च फिनलैंड की बिजली कंपनी वारसिला के कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सबिलिटी प्रोग्राम से मिला है, संयंत्र को चलाने का खर्च उपभोक्ता उठाते हैं.

सनमोक्षा की स्थानीय साझेदार ओडिशा रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी (ओआरईडीए) है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2015 में किए गए वादे के अनुसार ओआरईडीए दूरदराज़ के गांवों में बिजली पहुँचाने की ज़िम्मेदारी उठा रही है.

मोदी ने 2015 में 1000 दिनों में देश के सभी गांवों में बिजली पहुँचाने का वादा किया था.

उप निदेशक अशोक चौधरी का कहना है कि अधिकांश प्रोजेक्ट्स का उद्देश्य घरों को रोशन करने के लिए बिजली देना है. चौधरी कहते हैं, "जब आप गांववालों से पूछते हैं कि बिजली पाने के लिए उनकी प्राथमिकता क्या है तो वे हमेशा जीविका को प्राथमिकता देते हैं, फिर मनोरंजन और रोशनी को तीसरे स्थान पर रखते हैं."

चौधरी भविष्य के सभी माइक्रोग्रिड डेवलपमेंट में इस तकनीक को शामिल करना चाहते हैं.

अप्रैल में गांव में इस प्रोजेक्ट को देखने के बाद नए और अक्षय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव उपेंद्र त्रिपाठी ने भी 10 शुरुआती प्रोजेक्ट्स के लिए 30 प्रतिशत राशि देने पर सहमति जताई है.

पिछले महीने 2016 के स्मार्ट सिटी इंडिया अवार्ड में सनमोक्शा को ‘स्मार्ट विलेज’ कैटेगरी का अवार्ड जीता और अब वो ओडिशा के पहले स्मार्ट विलेज क्लस्टर एमएनआरई प्रोजेक्ट्स के लिए प्रस्ताव शामिल करने जा रहे हैं.

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रेलवे बोर्ड भी चाहता है कि आस-पास के घर रेलवे स्टेशनों को स्थानीय बिजली स्रोत के रूप में इस्तेमाल करें. इसी तरह कई खनन कंपनियां चाहती हैं कि इस तकनीकी का इस्तेमाल खनन के कारण विस्थापित लोगों तक बिजली उपलब्ध कराने में किया जाए.

जिस गांव में ये तकनीकी आज़माई जा रही है, वो ऐसे इलाके में है कि फिलहाल वहाँ सैटेलाइट डेटा कनेक्शन पर निर्भर रहना पड़ रहा है. इंटरनेट के इस्तेमाल के लिए ये काफ़ी महंगा है. लेकिन इस प्रणाली के तहत जो संचार नेटवर्क तैयार हुआ है वो भविष्य की ई-गवर्नेंस, टेलीमेडिसिन के लिए रीढ़ होगी.

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