हाथियों का रास्ता रोकने से मची तबाही

  • 18 जुलाई 2016
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पश्चिम बंगाल की सरकार ने भारत-नेपाल अंतरराष्ट्रीय सीमा पर हाल ही में लगाई गई कांटेदार बाड़ पर सवाल खड़ा किया है. यह बाड़ 17 किलोमीटर लंबी हैं.

इस बाड़ को इसलिए लगाया गया है ताकि भारत से हाथियों के दल नेपाल ना जा पाए और वहां नुक़सान ना पहुंचाए.

लेकिन बाड़ लगाने के बाद से पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से में हाथियों के दल ने बवाल मचा रखा है. वे कहीं घर तोड़ रहे हैं तो कहीं लोगों की जान पर ख़तरा बन रहे हैं.

पश्चिम बंगाल के वन विभाग ने इस पर अपनी चिंता जताई है.

वन विभाग का कहना है कि भारत-नेपाल सीमा पर स्थित मेची नदी के किनारे-किनारे 17 किलोमीटर लंबी कांटेदार बाड़ लगाने से सदियों पुराना रास्ता बंद हो गया है. इस रास्ते से हाथियों का आना-जाना होता था जो कि अब बंद हो गया है.

ये असम से लेकर पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से से होकर नेपाल तक हाथियों का स्वभाविक कॉरिडोर रहा है. अब इस रास्ते के बंद हो जाने पर हाथियों ने बवाल मचा रखा है.

पश्चिम बंगाल के वन मंत्री विनय कृष्ण बर्मन का कहना है कि इस बाड़ के कारण हाथियों का स्वभाविक रास्ता बंद हो गया है. वो नेपाल नहीं जा पा रहे हैं और ख़फ़ा होकर उत्तरी पश्चिम बंगाल में तोड़-फोड़ कर रहे हैं. कहीं खेत की फ़सल बर्बाद कर रहे हैं तो कहीं घर तोड़ रहे हैं. लोगों को मार भी रहे हैं. इसलिए केंद्र सरकार को कहा गया है कि वे नेपाल सरकार से इस विषय पर बात करे.

भारत से सीमा पार करके हाथियों के नेपाल जाने को लेकर पहले भी दोनों देशों के बीच विवाद हो चुके हैं.

नेपाल के कुछ नागरिकों का यह आरोप है कि भारत से हाथियों के दल उनकी खेती-बाड़ी को बर्बाद कर देते हैं और उनको इस नुक़सान के बदले मुआवज़ा नहीं मिलता है जबकि भारत के किसानों को ऐसे मुआवज़े दिए जाते हैं.

हाथी के बारे में जानकारी रखने वाले राज बासु का कहना है कि अगर इस बाड़ के डेढ़ किलोमीटर इलाके को छोड़ दिया जाता और नेपाल की सीमा के अंदर एक कॉरिडॉर बनाया जाता जहां हाथियों को खाने के लिए खेत में मौजूद फसल मिल जाती तो फिर यह समस्या नहीं होती. नेपाल के उस इलाके के किसानों को मुआवज़ा भी दिया जा सकता है. आईयूसीएन, डब्लूडब्लूएफ जैसे संस्थान तो ऐसे प्रोजेक्ट की फंडिंग भी करते हैं.

बाड़ पर निगरानी रखने वाला टावर और दरवाज़ा तो है पर हाथियों के लिए आने-जाने का रास्ता नहीं है.

नेपाल सरकार के वन मंत्रालय का कहना है कि नई दिल्ली से इस बारे में उनको कुछ नहीं कहा गया है. वो तभी इस पर टिप्पणी करेंगे जब दिल्ली से उनको इस बारे में कोई खत मिलेगा.

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