कश्मीर: 'हमें पीटा, पाक ज़िंदाबाद के नारे लगवाए'

  • 17 जुलाई 2016

भारत प्रशासित कश्मीर में जारी हिंसा और तनाव ने एक बार फिर से कई कश्मीरी पंडित परिवारों को बेघर कर दिया है.

पहले कश्मीरी पंडितों को 1990 के दशक में चरमपंथ के कारण अपना घर छोड़ना पड़ा था.

अब हिंसा की वजह से दर्जनों कश्मीरी पंडित एक बार फिर अपने पूर्वजों की ज़मीन को छोड़ कर वापस जम्मू का रुख कर रहे हैं.

जम्मू पहुँचने वाले कश्मीरी पंडित प्रशासन से मायूस भी हैं और नाराज़ भी.

वे इसका इज़हार जम्मू में राहत एवं पुनर्वास आयुक्त के दफ्तर में धरना करके और राज्य सरकार के खिलाफ नारे लगा कर कर रहे हैं.

Image caption आयुक्त आरके पंडिता इसे वक्ती समस्या मानते हैं.

आरके पंडिता जम्मू के राहत एवं पुनर्वास आयुक्त हैं. वो कहते हैं, "अब तक दोबारा बसाए गए 1600 पंडितों में से 300 से अधिक वादी से जम्मू पहुंचे हैं."

लौटने वाले लोग बताते हैं कि कश्मीर के कई शहरों में ट्रांजिट कैम्पों में रह रहे लोगों में भय है.

लौटने वाले पंडित कहते हैं कि वहां फंसे लोग जम्मू आने की कोशिश में लगे हैं लेकिन वाहन और प्रशासन से मदद न मिलने के कारण वो अपने कैम्पों में ही फंसे हुए हैं.

जम्मू पहुँची एक महिला ने भावुक हो कर कहा- ''ये कश्मीरी पंडितों का दूसरा पलायन है." लेकिन प्रशासन इसे एक जज़्बाती बयान मानता है.

आरके पंडिता कहते हैं, "माहौल ख़राब ज़रूर है लेकिन ये वक़्ती है, कुछ समय बाद सब सामान्य हो जाएगा और पंडित वापस कश्मीर जाने को राज़ी हो जाएंगे."

इसके उलट पंडितों का कुछ और ही कहना है. वे कहते हैं कि अब वे दोबारा किसी भी कीमत पर वापस नहीं लौटेंगे.

उनका आरोप है कि सरकार सुरक्षा पहुंचाने में नाकाम रही है. प्रधानमंत्री योजना के तहत राज्य सरकार 3000 नई नौकरियों के इश्तेहार निकालने वाली है.

अधिकारी आरके पंडिता कहते हैं कि कश्मीर में नए ट्रांजिट कैम्पों में 300 से अधिक नए घर बनाए जा रहे हैं. उन्हें उम्मीद है कि शान्ति होने के बाद कश्मीरी पंडित पहले से अधिक की संख्या में कश्मीर जाएंगे.

कश्मीरी पंडितों में से एक सतीश रैना जान पर खेल कर 90 पंडितों को लेकर शुक्रवार की रात जम्मू पहुँचे. उनका कहना है कि उन्होंने पहले और लोगों को घाटी से निकाला, फिर पांच साथियों के साथ किराए की इनोवा गाड़ी में बैठकर कुपवाड़ा से जम्मू की तरफ रवाना हुए. लेकिन रास्ते में चारों तरफ से घेर लिए गए.

उन्होंने बताया, "अचानक 100 के करीब लड़कों ने हमें घेर लिया. हमें गाड़ी से उतारा गया और पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाने को कहा गया. हमें नारे लगाने पड़े. इसके बाद भी हमें मारा पीटा गया."

उन्होंने आगे कहा, "कुछ ने अपने चेहरों को नक़ाब से ढक रखा था. जिनके चेहरे खुले हुए थे उन्हें हम पहचानते थे. वो पास के ही लोग थे."

Image caption ड्राइवर शब्बीर अहमद लोन

सतीश रैना का कहना है कि उन्होंने किसी तरह से अपनी जान बचाई और वहां से भागे.

उनकी गाड़ी के ड्राइवर शब्बीर अहमद लोन ने कहा कि उनकी भी खूब पिटाई हुई और अपनी कमीज उठा कर पीठ में लगे चोट के गहरे निशान भी दिखाए.

शब्बीर ने कहा, "उन लड़कों ने कहा कि पंडितों को वादी से निकालने में मदद करना मेरी ग़लती थी."

सतीश रैना की तरह कुपवाड़ा से जम्मू आने वालों कश्मीरी पंडितों के काफिले में रेणू भी शामिल थीं. उन्होंने बताया, "हमारे कैम्प में प्रदर्शनकारियों की एक बड़ी भीड़ जमा हो गयी. हमें अपना सब कुछ छोड़ कर आना पड़ा."

कहा जाता है कि 1990 के दशक में मिलिटेंसी के दौर में तीन लाख कश्मीरी पंडितों ने घाटी से पलायन करके जम्मू और दूसरे शहरों में पनाह ली थी.

सालों की कोशिश के बाद कुछ हज़ार पंडितों का आत्मविश्वास बहाल हुआ और वो प्रधानमंत्री की एक योजना के अंतर्गत घाटी जाने को तैयार हुए.

यूपीए सरकार के समय 2010 में प्रधानमंत्री पैकेज के अंतर्गत 5000 कश्मीरी पंडितों को घाटी में नौकरियां मिलनी थीं और उन्हें वहां दोबारा आबाद होना था.

इनमें से केवल 1600 कश्मीरी पंडित वापस गए. लगभग सभी स्कूल शिक्षक की सरकारी नौकरी लेकर वहां लौटे थे. उन्हें अलग-अलग शहरों में ट्रांजिट कैंपों में रखा गया था.

उनके वहां दोबारा बसने के बाद पहली बार कश्मीर में इतने बड़े पैमाने पर हिंसा हुई है. तीन दिन पहले कश्मीर से जम्मू आने वाली स्कूल टीचर बीना कॉल ने बताया कि अब तक ऐसा लग रहा था कि वादी में लौटने वाले कश्मीरी पंडित सुरक्षित हैं और वहां की मुस्लिम आबादी के साथ उनका दोबारा मिलना-जुलना भी शुरू हो गया था.

बीना के अनुसार इस बार की हिंसा के बाद उन्हें असुरक्षा का ज़बरदस्त एहसास हुआ है. उन्होंने कहा, "अब हम दोबारा वहां नहीं जाएंगे."

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