माओवाद प्रभावित बस्तर में फिर 'सलवा जुडूम'?

  • 17 जुलाई 2016
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छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित बस्तर में सलवा जुडूम और सामाजिक एकता मंच से जुड़े लोगों ने बस्तर में एक्शन ग्रुप ऑफ़ नेशनल इंटीग्रिटी यानी 'अग्नि' नाम का नया संगठन बनाने की घोषणा की है.

अग्नि के गठन के बाद सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने भी पीपुल्स एक्शन फ़ॉर नेशनल इंटीग्रेशन यानी 'पानी' नामक संगठन बनाने की घोषणा की है.

राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा है कि नक्सलियों के ख़िलाफ़ अगर लोग सामाजिक संगठन बना रहे हैं तो यह हिम्मत का काम है.

उन्होंने पत्रकारों से कहा, ''नक्सलियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वालों में हिम्मत है, तो आवाज़ उठाएँ. यह अच्छी बात है.''

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शनिवार को 'अग्नि' संस्था की ओर बयान दिया गया, '''अग्नि' संस्था ग़ैर राजनीतिक संगठन है, जिसका मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर नक्सलवाद और आतंकवाद के ख़िलाफ़ वैचारिक लड़ाई लड़ना और राष्ट्रीय स्तर पर पुरज़ोर तरीक़े से अपनी बात रखने के लिए इस मंच का गठन किया गया है.''

बयान में अखंड, शांत और उन्नत भारत के निर्माण में अपनी सहभागिता निभाने की बात भी कही गई है.

दूसरी ओर बस्तर में दो दशकों तक काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए अपने साथियों के साथ पीपुल्स एक्शन फ़ॉर नेशनल इंटीग्रेशन यानी 'पानी' नामक संगठन बनाने की घोषणा की है.

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बीबीसी से बातचीत में हिमांशु कुमार ने कहा, ''बस्तर में जिस तरह की अलोकतांत्रिक स्थितियां हैं, उसमें हमने गंभीरता से पीपुल्स एक्शन फ़ॉर नेशनल इंटीग्रेशन यानी पानी बनाने की बात कही है. हम हर तरह की अलोकतांत्रिक गतिविधि का शांतिपूर्ण विरोध करेंगे.''

वहीं मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल ने कहा है कि यह सलवा जुडूम और सामाजिक एकता मंच का ही बदला हुआ नाम है और इसकी आड़ में एक बार फिर बस्तर में जनविरोध को कुचलने की कोशिश की जाएगी.

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पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ इकाई के अध्यक्ष डॉक्टर लाखन सिंह ने कहा- ''शनिवार को पुलिस दमन के ख़िलाफ़ बस्तर के सातों ज़िलों में ऐतिहासिक बंद के बाद यह संगठन बनाया गया है और जो इस संगठन में शामिल लोगों ने ही इससे पहले सलवा जुडूम और सामाजिक एकता मंच बनाकर बस्तर में अशांति फैलाने का काम किया था.''

आरोप हैं कि 2005 में सलवा जुडूम को पुलिस संरक्षण में बस्तर में विस्तार मिला था, जिसमें पुलिस ने बस्तर के आदिवासियों को हथियार दे दिए थे.

सलवा जुड़ूम में शामिल लोगों पर आरोप है कि उन्होंने कम से कम 644 गांवों को माओवादियों के नाम पर खाली करवाया, जिसके बाद 50 हज़ार से अधिक आदिवासियों को सरकारी राहत शिविरों में रहने को मज़बूर होना पड़ा.

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10 साल बाद भी हज़ारों आदिवासी इन्हीं राहत शिविरों में हैं. 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने सलवा जुडूम को असंवैधानिक बताते हुए राज्य सरकार को तत्काल प्रभाव से इसे बंद करने का आदेश दिया था.

इसके बाद पिछले साल बस्तर में पुलिस संरक्षण में सामाजिक एकता मंच नामक संगठन बनाने की घोषणा की गई. दिलचस्प यह है कि इसमें ऐसे कई लोग शामिल थे, जिन पर कई गंभीर आपराधिक मामले रहे हैं और पुलिस ने इनका सार्वजनिक जुलूस भी निकाला है.

इस साल जनवरी में सामाजिक एकता मंच पहली बार तब चर्चा में आया, जब पुलिस संरक्षण में इस संस्था ने एक आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी जोड़े की शादी कराई.

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इसी दौरान बस्तर में आदिवासियों को क़ानूनी मदद देने वाली संस्था जगदलपुर लीगल एड ग्रुप की महिला वकीलों के ख़िलाफ़ सामाजिक एकता मंच ने कई जगह धरना प्रदर्शन किया. स्वतंत्र पत्रकार मालिनी सुब्रह्मण्यम के ख़िलाफ़ आंदोलन और कथित रूप से उनके घर पत्थरबाज़ी के आरोप भी इस संगठन पर लगे.

आरोप है कि पुलिस से कोई मदद न मिलने और सामाजिक एकता मंच के विरोध के कारण जगदलपुर लीगल एड ग्रुप संस्था की महिला वकीलों और मालिनी सुब्रह्मण्यम को बस्तर छोड़ने को बाध्य होना पड़ा.

इसके बाद माओवाद की समस्या की पड़ताल के लिए गठित विशेष कमेटी की सदस्य बेला भाटिया को भी सामाजिक एकता मंच के लोगों ने माओवादी बताकर निशाने पर लिया, मगर मंच के विवादों में आने के बाद इस साल अप्रैल में इस संगठन को भंग कर दिया गया.

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