अपनी ही सेंसरशिप का हिस्सा बना मीडिया?

  • 18 जुलाई 2016

इमरजेंसी के व़क्त कहा गया था कि, “मीडिया को झुकने को कहा तो वो रेंगने लगा”, पर मोदी सरकार के दो सालों में तो झुकने को कहा भी नहीं गया फिर भी मीडिया रेंग रहा है.

आज ही के अख़बारों को उठा कर देख लें तो एक अंग्रेज़ी भाषा के अख़बार, के अलावा किसी अख़बार के पहले पन्ने पर कश्मीर में प्रेस सेंसरशिप की ख़बर तक नहीं है.

ये मीडिया के ढांचे की असफलता है, कि वो अपनी ही सेंसरशिप का भागीदार बन गया है. ये अपनी ही जड़ें काटने जैसा है.

मीडिया पर इस व़क्त उनके मालिकों का बड़ा नियंत्रण है और वो सरकार से डरता है. निजी स्तर पर भी संपादकों की आवाज़ नहीं बची है.

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एडिटर्स गिल्ड जैसे प्रेस के संगठनों की तरफ़ से इसकी निंदा की गई है जिसकी एक अहमियत है पर अगर संपादकीय और रिपोर्टिंग पर आधारित लेख बंद हो जाते हैं तो इस निंदा का कोई फ़ायदा नहीं.

कोई भी विवादास्पद मुद्दा हो, जैसे माओवादियों के वर्चस्व वाला बस्तर इलाका और वहां से पत्रकारों को निकाला जाना, प्रमुख अख़बार उसपर लिखने से बचते रहे हैं.

सोशल मीडिया या नए ज़माने के डिजिटल मीडिया ने ही वहां पत्रकारों पर हो रहे हमलों पर लिखा. बाकि मीडिया ने बहुत कम और काफ़ी देर बाद कुछ टिप्पणियां दी.

कश्मीर के मामले में ये चुप्पी और बढ़ जाती है क्योंकि राष्ट्रवाद के नाम पर एक सहमति सी बन जाती है.

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ईमानदारी से कही गई बात, जो देशभक्ति के हित में है, उसे ही राष्ट्र-विरोधी करार दिया जा रहा है.

प्रेस सेंसरशिप कभी जायज़ नहीं ठहराई जा सकती. ये तो संकेत है इस बात का कि सरकार ने हुकूमत करने का नैतिक अधिकार खो दिया है.

जिस प्रेस के सामने वार्ता कर ये बताया गया कि बुरहान वानी का एनकाउंटर हो गया है, उसी प्रेस से अब इतना डर ये दिखाता है कि वादी में बनती अलग सोच से निपटने की जगह उसकी जानकारी दबाने का रास्ता अपनाया जा रहा है.

कोई परेशानी है ही नहीं, ये दिखाने की कोशिश मसला सुलझाने की जगह और उलझाएगी.

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सरकार या प्रशासन का ये दावा कि अख़बार एक-तरफा ख़बरें छापते हैं जिससे लोग और उत्तेजित हो सकते हैं और इसलिए उन्हें बंद करना होगा, सवाल खड़ा करता है.

और जवाब ये कि ये हालात पिछले 30 साल की नीतियों का ही नतीजा हैं.

2009-2010 की गर्मियों में प्रदर्शनों पर नकेल कसने और युवाओं की मौत का नतीजा बुरहान वानी और ये नाराज़गी है.

अब ये दो-तीन दिनों की रोक और सरकार के रवैये से अगले 10-15 साल की नाराज़गी का इंतज़ाम हो गया है.

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आधी रात में अख़बार छापने की प्रेस बंद करने का फ़ैसला लेने वाले ये नहीं सोच रहे कि अख़बारों के अभाव में लोग जानकारी के लिए सोशल मीडिया पर निर्भर होंगे और अफ़वाहें फैलने का डर और बढ़ेगा.

बुरहान वानी के एनकाउंटर और उसके बाद के घटनाक्रम को जिस तरह से सरकार ने संभालने की कोशिश की वो उसकी सामरिक असफलता दिखाता है.

साफ़ है कि सरकार के सबसे ऊंचे ओहदों पर बैठे नुमाइंदों, यानि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवल, को कोई अंदाज़ा नहीं है कि कश्मीर में आगे कैसे बढ़ना है.

(बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य से बातचीत पर आधारित)

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