'तुम तो हम से बढ़कर निकले, अब तक कहां छुपे थे भाई'

  • 18 जुलाई 2016
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मैं उन भाग्यशाली पाकिस्तानियों में से हूं, जिन्हें श्रीनगर देखने, घूमने और वहां कश्मीरियों से बात करने का मौका मिला. ये बात है 2009 के लोकसभा चुनाव की.

सोपोर के एक पोलिंग स्टेशन पर 70 साल से ज़्यादा उम्र के एक बड़े मियां से मैंने पूछा, “मैंने तो सुना है कि आपकी पीढ़ी चुनाव पर यक़ीन ही नहीं रखती, सीधी सीधी आज़ादी की बात करती है.”

तो बड़े मियां ने कहा, ''आप दुरुस्त फरमाते हैं बरखुर्दार, लेकिन आज़ादी तो जब मिलेगी, तब मिलेगी. इससे पहले पानी, बिजली और रोजी रोटी भी तो चाहिए."

मुझे उस वक्त ये जानकर बड़ा अचरज हुआ था कि पांच लाख की आबादी वाले इस शहर में सौ से ज़्यादा छोटे बड़े अख़बार और मैगज़ीन निकलते हैं.

मैंने एक बड़े पुलिसकर्मी से पूछा था कि इतनी आबादी के लिए इतने अख़बार और मैगज़ीन कुछ ज़्यादा नहीं हैं.

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तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था, “हमें भी मालूम है कि इनमें से काम के मैगज़ीन और अख़बार पांच-सात ही होंगे. मगर अच्छा ही तो है, बहुत से लड़कों का रोज़गार चल रहा है. कलम से लिख रहे हैं, बंदूक तो नहीं चला रहे.”

आज इस बात को सात साल बीत गए. लेकिन लग रहा है कि इन सात सालों में पेन भी क्लाश्निकोव हो गया है. वही पुलिसकर्मी जो श्रीनगर से इतने अख़बार और मैगज़ीन निकलने से कितने ख़ुश थे, अब उन्हीं जाने माने कश्मीरी अख़बारों और उनमें काम करने वालों को नहीं बख़्श रहे हैं.

हो सकता है इंटरनेट और मोबाइल फ़ोन किसी कश्मीरी के पास छोड़ना आजकल ख़तरनाक हो. लेकिन किसी पत्रकार को क़र्फ्यू पास भी नहीं देना और बतौर पत्रकार अपना परिचय कराने पर एक और डंडा जमा देना, अब उनकी समझ से बाहर है.

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हम ने तो ये सब और हर तरह की सेंसरशिप को चार बार लगने वाले मार्शल लॉ में भोगा है. लेकिन कश्मीर में क्या नौ जुलाई से मार्शल लॉ लग गया है?

क्या वहां लेफ्टिनेंट जेनरल महबूबा मुफ़्ती ने टेकओवर कर लिया है. जिस तरह की सूचनाएं मिल रही हैं, उससे तो यही लगता है कि इंदिरा गांधी वाली इमरजेंसी तो स्वर्ग थी.

पाकिस्तान की जानी मानी फहमिदा रियाज़ ने भारत में बढ़ती हुए घुटन पर कई वर्ष पहले एक तंज किया था, 'तुम भी हम जैसे निकले, अब तक कहां छुपे थे भाई?'

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लेकिन आज हालात शायद यहां तक पहुंच गए हैं कि तुम तो हम से बढ़कर निकले, अब तक कहां छुपे थे भाई?

और कितना अच्छा लगता है कि जब कलम को क़ैद करने वाले अफ़सर और नेता लोग शाम को सफेद कुर्ता पायजामा पहनकर अपने सरकारी घर के लॉन में बैठ कर बताते हैं, “मैं तो फ़ैज साहब की शायरी का आशिक हूं. ख़ासतौर पर आज बाज़ार में पाबजौला चलो..आह...कत्लगाहों से चुनकर हमारे अलम.... क्या बात है साहब फ़ैज साहब की...सुभान अल्ला...”

हां तो प्रोफेसर साहब मैं बता रहा था कि 'कश्मीर में जो आतंकवाद का चक्कर चला है उसके बाद से तो ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला....'

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