अयोध्या भूल नहीं पायेगा बाबरी के इस मुद्दई को

  • 20 जुलाई 2016
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"मैं फ़ैसले का भी इंतज़ार कर रहा हूँ और मौत का भी...लेकिन यह चाहता हूँ मौत से पहले फ़ैसला देख लूँ."

यह बात बुज़ुर्ग हाशिम अंसारी ने 2010 में बीबीसी हिंदी के रामदत्त त्रिपाठी को दिए एक इंटरव्यू में कही थी. उस समय उनकी उम्र 90 साल थी.

छह दशकों से ज़्यादा समय तक बाबरी मस्जिद की क़ानूनी लड़ाई लड़ने वाले हाशिम अंसारी का बुधवार को अयोध्या में अपने घर पर निधन हो गया.

हाशिम अंसारी से 2010 में बीबीसी की मुलाकात:

हशिम अंसारी गज़ब के जीवट के आदमी थे. लेकिन उनके चेहरे पर झुर्रियों के साथ-साथ ऐसी मायूसी मैंने 20 सालों में पहली बार देखी थीं.

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कारण पूछने पर उन्होंने बताया था, "कुछ मायूसी है, हालात को देखते हुए. जो मुखालिफ़ पार्टियां चैलेंज कर रही हैं, उससे मायूसी है और हुकूमत कोई एक्शन नहीं लेती."

हाशिम अयोध्या के उन कुछ चुनिंदा बचे हुए लोगों में से थे जो दशकों तक अपने धर्म और बाबरी मस्जिद के लिए संविधान और क़ानून के दायरे में रहते हुए अदालती लड़ाई लड़ रहे थे.

स्थानीय हिंदू साधु-संतों से उनके रिश्ते कभी ख़राब नहीं हुए. मै जब भी उनके घर गया, हमेशा अड़ोस पड़ोस के हिंदू युवक चचा-चचा कहते हुए उनसे बतियाते हुए मिले.

हाशिम ने कहा था, "मैं सन 49 से मुक़दमे कि पैरवी कर रहा हूँ, लेकिन आज तक किसी हिंदू ने हमको एक लफ़्ज़ ग़लत नहीं कहा. हमारा उनसे भाईचारा है. वो हमको दावत देते हैं. मै उनके यहाँ सपरिवार दावत खाने जाता हूँ."

विवादित स्थल के दूसरे प्रमुख दावेदारों में निर्मोही अखाड़ा के राम केवल दास और दिगंबर अखाड़ा के राम चंद्र परमहंस से हाशिम की अंत तक गहरी दोस्ती रही.

विवादित स्थल के एक और मुख्य दावेदार: महंत भास्कर दास

परमहंस और हाशिम तो अक्सर एक ही रिक्शे या कार में बैठकर मुक़दमे की पैरवी के लिए अदालत जाते थे और साथ ही चाय-नाश्ता करते थे.

उनके ये दोनों दोस्त अब जीवित नहीं रहे. अयोध्या अवध की मिली जुली गंगा जमुनी तहजीब का केंद्र रहा है.

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हाशिम इसी संस्कृति में पले बढ़े थे, जहां मुहर्रम के जुलूस पर हिंदू फूल बरसाते हैं और नवरात्रि के जुलूस पर मुसलमान फूलों की बारिश करते हैं.

हाशिम 2009 में हज के लिए मक्का गए थे तो कई जगह उन्हें भाषण देने के लिए बुलाया गया. हाशिम ने वहाँ लोगों को बताया कि हिंदुस्तान में मुसलमानों को कितनी आज़ादी है और वे कई मुस्लिम मुल्कों से बेहतर हैं.

हाशिम का परिवार कई पीढ़ियों से अयोध्या में रह रहा है. वो 1921 में पैदा हुए थे, 11 साल की उम्र में सन् 1932 में उनके पिता का देहांत हो गया.

दर्जा दो तक पढाई की. फिर सिलाई यानी दर्जी का कम करने लगे. यहीं पड़ोस में फैजाबाद में उनकी शादी हुई. उनके बच्चे हैं. एक बेटा और एक बेटी. उनके परिवार की आमदनी का कोई खास ज़रिया नहीं है.

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छह दिसंबर, 1992 के बलवे में बाहर से आए दंगाइयों ने उनका घर जला दिया, पर अयोध्या के हिंदुओं ने उन्हें और उनके परिवार को बचाया.

जो कुछ मुआवज़ा मिला था उससे हाशिम ने अपने छोटे से घर को दोबारा बनवाया और एक पुरानी अम्बेसडर कार ख़रीदी थी.

मस्जिद तोड़े जाने ने समाज में दारार पैदा की: विश्लेषण

हाशिम एक बात बड़े गर्व से कहते थे, "हमने बाबरी मस्जिद की पैरवी ज़रूर की. लेकिन राजनीतिक फ़ायदा उठाने के लिए नहीं."

उनके एक साथी ने बताया था कि छह दिसंबर, 1992 के बाद एक बड़े नेता ने उनको दो करोड़ रुपए और पेट्रोल पंप देने की पेशकश की तो हाशिम ने उसे न केवल ठुकरा दिया बल्कि उस संदेशवाहक को दौड़ा दिया.

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हाशिम अंसारी और उनके परिवार का रहन-रहन नहीं बदला. उनके छोटे से कमरे में दो तखत पड़े रहते थे. वही उनका ड्राइंग रूम था और बेड रूम.

दीवार पर बाबरी मस्जिद की पुरानी तस्वीर टंगी है और घर के बाहर अंग्रेज़ी में बाबरी मस्जिद पुनर्निमाण समिति का बोर्ड.

जब मैं उनसे मिलने पहुंचा था तो हाशिम जांघिया पहने लेटे थे. जल्दी जल्दी लुंगी और कुरता पहना, सिर पर सफ़ेद टोपी लगाई और बातचीत के लिए तैयार हुए.

उनकी याददाश्त 90 साल की उम्र में भी दुरुस्त थी. वर्ष 1934 का बलवा भी उन्हें याद था, जब हिंदू वैरागी संन्यासियों ने बाबरी मस्जिद पर हमला बोला था.

उन्होंने बताया था कि ब्रिटिश हुकूमत ने सामूहिक जुर्माना लगाकर मस्जिद की मरम्मत कराई और जो लोग मारे गए उनके परिवारों को मुआवज़ा भी दिया था.

सन 1949 में जब विवादित मस्जिद के अंदर मूर्तियां रखी गईं, उस समय प्रशासन ने शांति व्यवस्था के लिए जिन लोगों को गिरफ़्तार किया, उनमें हाशिम भी शामिल थे.

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हाशिम ने कहा था, "चूँकि मै सोशल (मेलजोल रखने वाला) हूँ इसलिए लोगों ने मुझसे मुक़दमा करने को कहा और इस तरह मैं बाबरी मस्जिद का पैरोकार हो गया."

बाद में 1961 में जब सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने मुक़दमा किया तो उसमे भी हाशिम एक मुद्दई बने. पुलिस प्रशासन की सूची में नाम होने की वजह से 1975 की इमरजेंसी में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और आठ महीने तक बरेली सेंट्रल जेल में रखे गए.

यह भी एक वजह हो सकती है कि हाशिम ने कांग्रेस को कभी माफ़ नहीं किया. बाबरी मस्जिद मामले में हर क़दम पर वो कांग्रेस को दोषी मानते थे.

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हाशिम सभी पार्टियों के मुस्मिल नेताओं के भी आलोचक थे. बातचीत में वो बार-बार जोर देते थे, "हर हालत में हम अमन चाहते हैं, मस्जिद तो बाद की बात है."

हाशिम कहते थे, "अगर हम मुक़दमा जीत गए तो भी मस्जिद निर्माण तब तक नहीं शुरू करेंगे, जब तक कि हिंदू बहुसंख्यक हमारे साथ नहीं आ जाते."

हाशिम की सुरक्षा के लिेए स्थानीय पुलिस अफसरों ने उनके घर के बगल ही पुलिस पिकेट तैनात कर दी थी.

इसके बावजूद हाशिम के चेहरे पर चिंता के भाव दिखते थे. हाशिम पहले मुझे कभी इतने चिंतित नहीं दिखे थे. जब मैं उनके यहां से चलने लगा था, तो उन्होंने मुझसे बार-बार कहा था, "हाल ख़बर लेते रहिएगा."

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