अधूरी ज़िंदगी ही जी पाए नीलाभ..

  • 25 जुलाई 2016
इमेज कॉपीरइट Neelabh Ashk Facebook

कवि, अनुवादक और पत्रकार नीलाभ (जन्म 16 अगस्त 1945-निधन 23 जुलाई, 2016) 70 साल की ऐसी उम्र में दुनिया से चले गए जिसे रचनात्मक लोगों के लिए संवेदना और विवेक के नए आयामों की और जाने की उम्र माना जाता है.

नीलाभ खुद एक नयी रचनात्मक दिशा पाने की कोशिश में लगे थे, उनके दिमाग में बहुत सी योजनाएं थीं और वे निजी और रचनात्मक जीवन के ऐसे बिंदु पर थे जब कुछ पिछली निराशाओं और अगली उम्मीदों के साथ सफ़र शुरू होता है.

सन 1977 में जब मैं इलाहाबाद से नोर्दर्न इंडिया पत्रिका द्वारा प्रकाशित हिंदी दैनिक ‘अमृत प्रभात’ में काम करने आया तो ख़ुसरोबाग़ रोड पर अश्कजी और उनके बेटे नीलाभ के पड़ोस में कवि-मित्र वीरेन डंगवाल के साथ रहने का संयोग हुआ.

नीलाभ वीरेन के पुराने दोस्त थे. हमारे घरों की छतें बहुत पास-पास थीं और नीलाभ लगभग हर सुबह छत पर टहलने आते थे.

उन दिनों वे अपने पिता के प्रकाशन व्यवसाय से कुछ ऊब कर नौकरी की तलाश कर रहे थे. ‘अमृत प्रभात’ में उनके लिए कोशिश की गयी.

इमेज कॉपीरइट Amarjeet Chandan

लेकिन बात बनते–बनते रह गयी, हालांकि वे इस दैनिक में नियमित लिखने लगे थे. एक दिन मेरी नज़र किसी पुराने अखबार की कतरन पर पड़ी जिसमें बीबीसी हिंदी में नियुक्तियों के लिए एक विज्ञापन छपा था हालाँकि उसकी आख़िरी तारीख़ निकल चुकी थी.

अगली सुबह जब नीलाभ छत पर आये तो मैंने अख़बार की वह कतरन उनकी तरफ बढ़ाते हुए कहा कि तुम आवेदन कर दो.

नीलाभ ने उसे पढ़ा और कहा, ‘अरे, इसकी तारीख़ तो निकल चुकी है.’ मैंने मज़ाक में, आशीर्वचन की सी मुद्रा में कहा, ‘नीलाभ, मेरा वचन कभी खाली नहीं जाता. तुम्हारा हो जायेगा. बस अप्लाई कर दो.’

संयोग से नीलाभ ने आवेदन कर दिया और कुछ ही दिन में उन्हें इंटरव्यू का बुलावा आ गया.

नीलाभ का भाषा-ज्ञान, अनुवाद, उच्चारण और बोलने का लहजा, सब बहुत अच्छा था लिहाज़ा उन्हें आसानी से बीबीसी में नियुक्ति मिल गयी और लंदन जाकर उन्होंने एक योग्य पत्रकार-प्रसारक के तौर पर अपनी छाप भी छोड़ी.

इमेज कॉपीरइट facbook

नीलाभ कौशल्या अश्क के इकलौते और बेहद प्रिय पुत्र थे और उनकी गैर-मौजूदगी में नीलाभ प्रकाशन का काम भी नहीं चल पा रहा था, इसलिये घरेलू दबाव के कारण उन्होंने बीबीसी में दूसरी पारी स्वीकार नहीं की.

नीलाभ को पत्रकारिता का कोई ख़ास अनुभव नहीं था, लेकिन काफी पढ़े-लिखे और राजनीतिक –सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न होने के कारण वे बीबीसी में कामयाब रहे. जैज़ संगीत की यात्रा पर कई किस्तों में प्रसारित उनकी वार्ता दस्तावेजी महत्व की है.

उन्नीस सौ सत्तर के दशक में जब नीलाभ ने कविता लिखना शुरू किया तो दिल्ली और कोलकाता जैसे बड़े शहरों में ‘अकविता’ और ‘भूखी पीढ़ी’ के वैयक्तिक विद्रोह का बोलबाला था और इलाहाबाद जैसे छोटे शहर में ‘लघु मानव’ की बहस थी.

नीलाभ ने इन दोनों प्रवृत्तियों से हटकर कविता में अपनी राह बनायी. हिंदी में जिन कवियों की पहली ही कृतियाँ मह्त्वपूर्ण मानी गयीं उनमें नीलाभ का कविता संग्रह ‘संस्मरणारंभ’ भी था जिसकी कविताएँ नए मुहावरे, मिथाकीयता और रोमांचक भाषाई तेवरों से भरपूर थीं.

बाद के वर्षों में ‘अपने आप से एक लम्बी, बहुत लम्बी बातचीत’, ‘जंगल खामोश है’, ‘उत्तराधिकार’ और ‘चीज़ें उपस्थित हैं’ आदि संग्रहों से वे अपने दौर की एक प्रतिनिधि आवाज़ के रूप में जाने गए.

इमेज कॉपीरइट Neelabh Ashk Facebook

पिता उपेन्द्रनाथ अश्क हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक थे और घर में उनकी उपस्थिति एक बरगद की तरह थी जिसकी छाया में उगना-फैलना आसान नहीं था, लेकिन इसके बावजूद नीलाभ का विकास रुका नहीं.

अनुवादक के रूप में भी नीलाभ का काम इस माने में उल्लेख करने लायक है कि उन्होंने कठिन मानी जाने वाली कई कृतियों के सुन्दर अनुवाद किए.

अरुंधती रॉय के प्रसिद्ध उपन्यास ‘मामूली चीज़ों का देवता’ और कुछ निबंधों का अनुवाद ऐसा ही मुश्किल काम था.

हिंदी विद्वान फ्रंचेस्का ओर्सिनी की किताब ‘हिंदी लोकवृत्त’ और सलमान रुश्दी के उपन्यास ‘फ्लोरेंस की जादूगरनी’ के उनके अनुवाद भी बहुत अच्छे हैं. रंगमंच के क्षेत्र में भी उनका यादगार योगदान है.

जीवन के आखिरी दिनों में वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका ‘रंग प्रसंग‘ का संपादन कर रहे थे, लेकिन उससे पहले उन्होंने शेक्सपीयर के नाटक ‘किंग लीयर’ और बेर्टोल्ट ब्रेख्त के ‘मदर करेज’ के रूपांतर क्रमशः ‘पगला राजा‘ और ‘हिम्मत माई‘ के नाम से किए, जिनका मंचन बहुत सफल रहा.

वर्धा के महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के लिए उन्होंने ‘हिंदी साहित्य का मौखिक इतिहास’ भी लिखा.

बाद के वर्षों में नीलाभ के जीवन में कई उतार-चढ़ाव और भटकाव आये.

पहली पत्नी से अलगाव, फिर उनकी मृत्यु, फिर विवाह, दूसरी पत्नी की भी मृत्यु और फिर तीसरी बार विवाह ने उनके जीवन को कुछ जटिल और परेशानहाल कर दिया था.

इलाहाबाद के अपने पुश्तैनी घर को बेचने के बाद वे दिल्ली आकर बार-बार घर और गृहस्थी बसाने की कोशिश करते रहे, लेकिन ये कोशिशें विफल होती रहीं.

इमेज कॉपीरइट Neelabh Ashk Facebook

आखिरी दौर में उनकी छिटपुट आत्म-स्वीकृतियां जीवन की इन त्रासदियों का दस्तावेज़ कही जा सकती हैं और उनमें एक गहरी विरक्ति भी नज़र आती है. दरअसल नीलाभ के व्यक्तित्व में कवि की पारंपरिक रूमानी छवि, उसके साथ आनेवाली अराज़कता, अस्तित्ववादी आधुनिकता, मार्क्सवाद, जन-प्रतिबद्धता, पंजाबियत और मर्दाना स्वभाव का एक जटिल मिश्रण था और इन प्रवृत्तियों के अंतर्विरोधों को सुलझाने का काम भी अधूरा रहा.

आंतोन चेखव के एक नाटक ‘तीन बहनें’ में एक पात्र कहती है: ‘काश, एक बार जी जा चुकी ज़िंदगी, एक रफ़ ख़ाका होती और हम उसकी दूसरी और फाइनल प्रति बना पाते तो हम उसे कभी नहीं दोहराते.’

त्रासदी यह रही कि जब जीवन की अंतिम और सुधरी हुई प्रति बनाने का मौक़ा आया तब नीलाभ इस दुनिया से ही चले गए.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार