...तो बहादुर शाह ज़फ़र का निशां भी मिट जाएगा

  • 30 जुलाई 2016
ज़फ़र महल

ज़फ़र महल अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र की गर्मी के दिनों में आरामगाह हुआ करती थी. 18वीं सदी में कुतुब मीनार के पास इस इमारत को मुग़ल बादशाह अक़बर ने निर्माण करवाया था.

लाल पत्थर का तीन मंजिला द्वार बहादुर शाह ज़फ़र ने निर्माण कराया था, जिसे 'हाथी दरवाज़ा' कहा जाता था. इसके ऊपर छज्जे बने हुए थे और सामने खिड़कियों में बंगाली वास्तुकला को भुनाया गया है.

यह तीन मंजिला इमारत थी लेकिन इमारत का बड़ा हिस्सा समय के साथ नष्ट हो गया है. ज़फ़र महल के कुछ भागों में पत्थर का भी इस्तेमाल हुआ है.

ये इमारत अरावली की पहाड़ियों से घिरी हुई हैं जहां बड़ी-बड़ी चट्टानों की भरमार थी.

ज़फ़र महल महरौली की घनी आबादी क्षेत्र में स्थित है उसके चारों ओर मकान बन चुके हैं.

ज़फ़र महल पुरातत्व विभाग की सुरक्षित ऐतिहासिक इमारत है, लेकिन अब यह अवैध निर्माण की चपेट में है. एक मकान की दीवार तो महल की दीवार पर ही उठाई गई है.

खुली जगह पर शाम के समय में बच्चे अक्सर क्रिकेट खेलते हैं. शासक बहादुर शाह ज़फ़र की तरह स्थानीय फ़कीर भी इसे आरामगाह के रूप में इस्तेमाल करते हैं.

खुली महराबों और ऊंची छतों की बदौलत गर्मियों में यह महल ठंडा रहता था. इमारत के ऊपरी भाग बेहद शांत और सुंदर हैं.

ज़फ़र महल से जुड़े संगमरमर की बनी हुई छोटी सी मोती मस्जिद भी बहुत सुंदर है और अभी तक अपेक्षाकृत अच्छी हालत में है.

यहां मुगल बादशाह अक़बर और मिर्जा जहांगीर की कब्र भी स्थित है. देखभाल न होने के कारण उन्हें नुक़सान पहुंचा है.

अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने भी यहीं दफ़न होने की इच्छा जताई थी लेकिन अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर रंगून भेज दिया और वहीं उनकी मृत्यु हुई.

ज़फ़र महल के चारों ओर अवैध रूप से बहु मंजिला इमारतें निर्माणाधीन हैं. कानून के अनुसार, किसी पुरातात्विक सुरक्षित इमारत से सौ मीटर के भीतर कोई इमारत नहीं बनाई जा सकती.

लेकिन ज़फ़र महल अब अवैध निर्माण की चपेट में है.

ये ऐतिहासिक इमारत अब चारों ओर से बहु मंजिला इमारतों से परेशान हो रही है. अब केवल द्वार ही बाहर से दिखाई देता है.

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