फ़सल बर्बाद पर मुआवज़ा महज़ एक रूपया

  • 2 अगस्त 2016
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छत्तीसगढ़ में जंगली हाथियों के ज़रिये फ़सल नुक़सान के मुआवज़् के तौर पर किसानों को एक और पांच रुपये का भुगतान किया जा रहा है.

किसान परेशान हैं, जबकि वन विभाग के आला अधिकारियों का कहना है कि पूरे मामले की जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो पायेगी.

राज्य के सरगुजा, जशपुर, कोरबा और रायगढ़ ज़िले में 375 से अधिक जंगली हाथी हैं, जो आये दिन फ़सलों को नुक़सान पहुंचाते रहते हैं.

घरों को तोड़ देना और लोगों को मार डालने की हर दिन होने वाली घटनाओं के कारण सैकड़ों ऐसे गांव हैं, जहां लोग रतजगा करने को मज़बूर हैं.

पिछले डेढ़ सालों में हाथियों ने 118 लोगों को मार डाला है, जबकि फ़सलों और मकानों के नुक़सान के 40 हज़ार से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं. लेकिन इस नुक़सान के बदले दी जाने वाली मुआवज़े की रक़म को लेकर अब सवाल खड़े होने लगे हैं.

राज्य के वन मंत्री महेश गागड़ा का दावा है कि पहले हाथियों के फ़सल नुक़सान पर छह हजार आठ सौ रुपए प्रति हेक्टेयर का मुआवज़ा दिया जाता था, जिसे बढ़ाकर साढ़े 22 हज़ार कर दिया गया है. लेकिन ज़मीनी हक़ीकत ऐसी नहीं है.

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रायगढ़ ज़िले के अमलीपाली गांव के रामप्रसाद को जहां फ़सल मुआवज़ा के नाम पर एक रुपये की रक़म जारी हुई, वहीं लिमगांव के पदुम केवट को दो रुपये का मुआवज़ा मिला. गांव के सुकालु यादव को भी एक रुपये का मुआवज़ा दिया गया है. आसपास के गांवों का भी यही हाल है.

रायगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता राजेश त्रिपाठी ने 2009 से अब तक मुआवज़े के कई दस्तावेज़ एकत्र किए हैं. राजेश का दावा है कि पिछले सप्ताह जिन लोगों को मुआवज़ा दिया गया है, उनको आवंटित रक़म हास्यास्पद है.

त्रिपाठी का दावा है कि अकेले सारंगढ़ इलाके में कम से कम 21 ग्रामीण ऐसे हैं, जिन्हें एक रुपये से बीस रुपये तक की रक़म दी गई है.

राजेश त्रिपाठी कहते हैं, “पिछले कई सालों से यह सिलसिला चल रहा है. ग्रामीणों को महीनों तक मुआवज़े की रक़म के लिए इंतजार करना पड़ता है और अंत में मुआवजे के रुप में जो रक़म किसान को दी जाती है, उससे किसी भी तरह से नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती.”

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लेकिन राज्य के प्रधान वन संरक्षक (वन्य प्राणी) बीएन द्विवेदी का कहना है कि वन्य प्राणियों द्वारा फ़सलों के नुकसान के लिए स्थानीय स्तर पर एक कमेटी बनाई जाती है और वही मौक़े का मुआयना करने के बाद मुआवज़े की रक़म निर्धारित करती है.

बीएन द्विवेदी कहते हैं, “मेरे लिये यह समझना मुश्किल है कि एक रुपये या पांच रुपये का मुआवज़ा कैसे निर्धारित किया गया. इसकी जांच-पड़ताल करवानी पड़ेगी, उसके बाद ही पता चल पायेगा कि आख़िर गड़बड़ी कहां हुई है.”

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