गोवा की फेनीः देसी 'ठर्रा' ब्रांडेड लेबल

  • 17 अगस्त 2016
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गोवा की फेनी जाने सदियों से अपने चाहने वालों को ‘मस्त’ करती रही है पर इस बार चक्कर कुछ ऐसा चलाया है गोवा वालों ने कि फेनी का ‘भविष्य’ ही झूमता-झामता नजर आने लगा है.

राज्य सरकार की पुरजोर कोशिश ने कुछ समय पहले इस मादक देसी पेय को ‘जियोग्रैफ़िकल इंडिकेटर’ का तमगा पहना दिया था.

इस बार कोशिश यह है कि इस ‘ठर्रे’ को विरासत पेय यानी हैरिटेज ड्रिंक की पदवी से नवाज दिया जाय.

मेहरबान, कद्रदान यह ना समझें कि यह सब कसरत स्वदेशी की ताजपोशी के लिए की जा रही है!

हक़ीकत यह है कि इस ‘ताड़ी’ को बनाने बेचने वाले यार लोग इस बात को बखूबी बूझते हैं कि जब तक इस शराब के ऊपर देसी वाला ठप्पा लगा रहेगा तब तक इसे दूसरे राज्यों के ‘ठेकों’ पर बेचना असंभव है.

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जीआइ और हैरिटेज ड्रिंक की ढाल-तलवार बांध कर ही यह अपना जलवा देश विदेश में दिखला उन्हें मालालमाल करवा सकती है.

आखिर गोवा में पीने वाले पर्यटकों के भरोसे कोई कब तक मदहोश बैठा-लेटा रह सकता है?

जमाना ग्लोबलाइजेशन का है देशी को विदेशी के सामने कौन पूछता है? देसी की जगह है ठेका-अहाता और बिदेसी बोल वाली देसी मुर्गी-माफ कीजिए आइएमएल याने ‘भारत में बनी विदेशी शराब’ बिराजती है जगमगाती दुकानों में स्कॉच और वाइन के साथ!

खुला खेल यह है कि फेनी को लोकल से ग्लोबल बना दिया जाय. कहां गुड़ की डली और कहां विलायती मिठाई!

इसे कैसे भुला दें कि गोवा वालों पर अपनी फेनी के बनाने की प्रक्रिया का बखान करते करते ‘नीरो’ (नीरा), ‘टौडी’ (ताड़ी), अरक (अर्क) भट्टी पर चढ़ने के साथ भाप से निकली ‘डिस्टिल्ड’ शराब का ख़ुमार चढ़ने लगता है.

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जैसा नाम से ज़ाहिर होता है नारियल से बनाई फेनी का आविष्कार पुर्तगालियों के हिंदुस्तान पहुंचने के बहुत पहले हो चुका था.

फेन संस्कृत शब्द है और यह इशारा करता है कि जब मासूम नीर में खमीर चढने से हल्का नशीला अल्कहोल बनता है तो बुदबुदे उठते हैं.

बरतन हिलाने से आसानी से नज़र आते हैं यही फेनिल पेय फिरंगी जुबान पर चढ़ते फेनी बन गया.

हां, इस बात के लिए पुर्तगालियों की तारीफ की जा सकती है कि वह अपने साथ काजू लेते आए.

इस मेवे से बनने वाली फेनी गोरे शासकों कि लाडली होने से देशी नारियल की ताड़ी से बेहतर समझी जाने लगी गांठ के पूरों और अकल के अंधों के बीच.

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आज भी सागर किनारे किसी छप्पर छाई टैवर्ना में खाने-पीने के शौकीन लोकल जानते हैं कि कांच के चायनुमा गिलास में चार अंगुल नाप कर डाली नारियल की फेनी, तली मछली के साथ क्या रंग जमाती है, वो भी दस-बीस रुपए में ही.

उसे ना जीआइ चाहिए न हैरिटेज का ठप्पा.

ऐसा नहीं कि इस अभियान में सभी गोवा वासी एक राय हैं. कुछ को डर है कि यदि दार्जिलिंगी चाय और कोल्हापुरी चप्पल तथा अल्फांसो आम के साथ फेनी भी जीआइ बिरादरी में पहुंच गई तो आबकारी कानून के तिलिस्म को सेंध मारी से तोड़ पडोसी राज्यों के शराब उत्पादक माफिया, राज्य के कुठीर उद्योग की कमर तोड देंगे.

अब हम अपना दर्द किसे सुनाएं? आबकारी नीति को लेकर भारत भूमि में वैसा ही पाखंड है जैसा गोरक्षा को लेकर.

राज्य की आय का बड़ा हिस्सा शराब बेचने से होता है, पर नशाबंदी संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में शामिल है.

इसके ख़िलाफ़ मुंह खोलने वाला शराबी-कबाबी ही नहीं देशद्रोही करार दिया जा सकता है.

हम ठहरे फेनिल फेनी के मदमाते प्रेमी, गोवा से बाहर रहते हैं, प्यासे-लिए हाथ में खाली प्याला.

चाहत बरसों से बस इतराती फेनी के संग संग, सुलभ कराएं ठर्रा महुवा अपनी प्यारी मधुशाला!

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