'हर एसिड अटैक में प्रेम का एंगल नहीं होता'

  • 24 अगस्त 2016
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अनमोल रॉड्रीग्ज़हर कहती हैं कि लोगों को लगता है कि एसिड से अगर कोई लड़की जली है तो ज़रूर किसी सिरफिरे आशिक का काम होगा, लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ.

मुंबई की रहने वाली अनमोल रॉड्रीग्ज (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि उनके साथ उनके पिता ने ऐसा किया, जब वो सिर्फ़ कुछ महीनों की थीं.

उनके पिता ने लड़की होने के ग़ुस्से में उनकी माँ पर तब तेजाब फेंका था जब वो अनमोल को दूध पिला रही थीं.

अनमोल बताती हैं, "मेरे पिता इस बात से खुश नहीं थे कि मेरी मां ने एक बेटी को जन्म दिया है और इसलिए उन्होनें एक दोपहर मेरी माँ पर तेज़ाब फेंका. मेरी माँ ने मुझे ढंक लिया लेकिन वो खुद नहीं बच सकीं."

एक तरफ़ जहां आज पीवी सिंधू और साक्षी मलिक के मेडल जीतने के बाद देश की बेटियों को दुआएं दी जा रही हैं, वहीं अनमोल के लिए ज़िंदा रहना भी मुश्किल था.

वो कहती हैं, "मेरे पिता को जेल हो गई और मेरे ननिहाल के लोगों ने कुछ दिन मेरा ईलाज करवाने के बाद मुझे बोझ समझ कर छोड़ दिया. मुंबई के एक अनाथाश्रम में फिर मुझे जगह मिली लेकिन ये तो सिर्फ़ शुरूआत थी."

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अनमोल 22 साल की हैं और उन्होंने अपना नाम सोशल मीडिया पर बदल लिया है और वो किसी एक धर्म को नहीं मानती हैं.

वो बताती हैं, "मेरे साथ हुई घटना के बाद जैसे भगवान से मेरा भरोसा ही उठ गया था. मैं किसी एक धर्म में भरोसा नहीं रख पा रही थी, लेकिन फिर मुझे लोगों ने हौसला दिया, ज़िंदा रहने की आस दी, वो अलग अलग धर्म के लोग थे और ऐसे में मैंने भी सभी धर्मों को मानने का निर्णय लिया. मेरे दोस्त मुझे अनमोल बुलाते थे और इसलिए मैंने अनमोल नाम को ही रख लिया."

अनमोल इन दिनों अपनी नौकरी को लेकर ख़ासी परेशान हैं और वो इस बात को देखकर हैरान है कि लोग कैसे एसिड अटैक विक्टिम के साथ भेदभाव करते हैं.

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उनका कहना है, "एक साल पहले एल एंड टी कंपनी में अंकाउंट्स विभाग की नौकरी से मुझे कम अनुभव के आधार पर निकाल दिया गया और इसके बाद से मैं जहां भी नौकरी मांगने जाती हूं वहां अजीब बर्ताव किया जाता है. कोई बोलता नहीं लेकिन चेहरे के भाव से समझ आ जाता है कि वो मुझे देखकर घृणा महसूस करते हैं."

अनमोल मुंबई के जिस अनाथालय में रहती थी वहां 18 साल की उम्र के बाद बच्चों को रखने की व्यवस्था नहीं है.

ऐसे में अनमोल को काम तलाशना एक मजबूरी थी. वो कहती हैं, "एक आम आदमी हमारा दर्द नहीं समझ सकता, 22 साल पहले मैं जली थी, लेकिन आज भी मेरे चेहरे और आँखो से पानी आ जाता है."

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"धूप में जला हुआ हिस्सा बुरी तरह से जलता है, पसीना कई बार ख़राब आँख में चला जाता है तो मिर्च लगने जैसी जलन होती है. इस सबके लिए जो दवाएं और सर्जरी ज़रूरी है वो महंगी हैं और इसके लिए मेरे लिए पैसे कमाना ज़रूरी है."

एसिड अटैक विक्टिम्स के लिए तो कई तरह के कैंपेन चलाए जाते हैं, ऐसे में क्या वहां से अनमोल को कोई मदद नहीं मिली?

आगरा के मशहूर 'शीरोज़' कैफ़े को सिर्फ़ एसिड अटैक विक्टिम चलाती हैं. वहां काम कर चुकी अनमोल बताती हैं, "इन 'सोशल' चीज़ो का तरीक़ा बहुत अलग होता है. वहां मीडिया ज़्यादा आता है और ग्राहक कम, वहां आपको एक ठिकाना मिल सकता है लेकिन ज़िंदगी चलाने के लिए आसरा नहीं."

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अनमोल के साथ 1994 में एसिड अटैक की घटना हुई थी. वो कहती हैं कि आजकल सरकार की ओर से एसिड अटैक पीड़िताओं की मदद की जाती है लेकिन उनके साथ यह तब हुआ जब इन मामलों पर कोई आवाज़ नहीं उठती थी.

अनमोल बिना किसी का नाम लिए कहती हैं, "कुछ पीड़ितों को मीडिया सिलेब्रिटी बना दिया गया है लेकिन बाक़ी लड़कियों का क्या? हमें तो लोग देखना भी पसंद नहीं करते. आज मैं फ़िल्म भी अकेले देखने जाती हूं और भले ही एक दिन आप मेरे साथ चले जाएंगे, पर क्या आप मेरे साथ मेरा दर्द बाँट सकते हैं?"

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